सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करने वाली राजनीति हो

 विवेक हिन्दी  31-Jul-2017

राष्ट्रपति पद के लिए श्री रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा होते ही उनके दलित होने का बार-बार जिक्र किया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस ने अपने मित्र दलों के साथ मिल कर अपना उम्मीदवार तय करते समय जन्म से दलित उम्मीदवार चुनने की भी राजनीतिक चाल चली। फलस्वरूप, देश में पहली बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के कर्तृत्च की चर्चा नहीं हुई, महज जाति की चर्चा हुई। इस तरह, इस अत्यंत महत्चपूर्ण चुनाव को भी ‘दलित विरुद्ध दलित’ का जातिगत स्वरूप प्राप्त हो गया।


 

भारतीय स्वाधीनता के बाद क्या भारत में कोई बदलाव नहीं हुए? पिछले ७० वर्षों में क्या हमारे राजनीतिक आकलन और सामाजिक यथार्थ में अनेक परिवर्तन हुए हैं? ऐसा मानते तो हैं; फिर क्यों देश के सर्वोच्च पद के चुनाव के लिए व्यक्ति की जाति का मुद्दा महत्वपूर्ण मान कर उसे उछाला गया? इस घटना से इस बात की पुष्टि होती है कि देश की राजनीति करने वाले नेता और देश के समाज के मन और दिमाग से जाति-पाति का विचार अभी उखड़ा नहीं है। लोकतंत्र में जातिपाति के भेद नष्ट हों, यह अपेक्षा है। लेकिन हो रहा है इसके बिलकुल विपरीत। लोकतंत्र के राष्ट्र जीवन में राजनीति का महत्व स्वीकार करना ही होगा, लेकिन महज राजनीति याने लोकतंत्र निश्चित रूप से नहीं है। इस ताजा घटना का ऊहापोह करते समय अखबार एवं टीवी चैनल इस निष्कर्ष पर पहुंचे दिखाई देते हैं कि जातिपाति का उल्लेख कर अपनी टीआरपी बढ़ाना जरूरी है और जातिपाति में उलझे रहना ही शायद इस देश की नियति है। फिलहाल, देश के राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों की यह पक्की राय बन गई लगती है कि, भारतीयों का जातिपाति में हुआ विभाजन अपने समाज का अटल सत्य है और उसे उखाड़ फेंकना असंभव भी है।

आश्चर्य इस बात का है कि जातिवाद का विरोध करने वाले सभी राजनीतिक दल चुनाव आते ही जातिपाति और दलित-सवर्ण के समायोजन में व्यस्त दिखाई देते हैं। इस तरह के समझौतों को राजनीति की अनिवार्य विकृति के रूप में स्वीकार करने से ही सबकुछ ठीक चलेगा, ऐसा उन्हें लगता है। भारतीय स्वाधीनता के ७० वर्षों में भी जातिभेद की विकृति खत्म होना तो दूर ही रहा, वह विकृति अब तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों तक पहुंच गयी है। यह विकृति लगातार बढ़ भी रही है। राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए समाज को विखंडित रखने में ही अपनी भलाई मानते हैं। जाति, वर्ण, भाषा, आर्थिक-सामाजिक स्तर में भेद कायम रखने, उनमें जातीयता बढ़ाने और झगड़ें लड़वाने के प्रयास इस तरह जारी रखे गए हैं कि भारत एक राष्ट्र है इस बारे में कभी-कभी सन्देह पैदा होने लगता है।

हमें केवल राजनीतिक लोकतंत्र में संतोष मान कर नहीं चलना चाहिए। हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को ‘सामाजिक लोकतंत्र’ में तब्दील करना होगा। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं होगा, जब तक उसके मूल में सामाजिक लोकतंत्र नहीं होगा। सामाजिक लोकतंत्र के क्या मायने हैं? उसका अर्थ है एक ऐसी जीवन शैली जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुभाव को जीवन का मूल सिद्धांत मानती हो। आज हम यदि संसद से लेकर ग्राम पंचायत के चुनाव तक नजर डालें तो हमें राजनीति के जाति आधारित दांवपेंच ही दिखाई देते हैं। सामाजिक लोकतंत्र का किंचित भी आभास नहीं होता। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने जातिभेद के उद्गम और उसके स्वरूप की खोज करते समय उसे जड़ से ही नष्ट करने का सपना देखा था। डॉ. बाबासाहब के जीवनभर के चिंतन का लक्ष्य जातिवाद को नष्ट करने के लिए भूमिका बनाना था। उन्होंने इस देश में वसिष्ट और वाल्मिकि परम्पराओं में संघर्ष पैदा नहीं किया। वे दोनों को एक-दूसरे में समाविष्ट करने का प्रयास करते रहे। डॉ. आंबेडकर का यह एक स्वच्छ दृष्टिकोण था। जातिभेद, वंशभेद, नक्सलवाद उन्हें अपेक्षित नहीं था। वे देश के हिंदुओं को छलकपट से आपस में लड़ाना नहीं चाहते थे और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की खातिर अपने ही देशबंधुओं को जातिभेद की भविष्य की गहरी खाई में ढकेलने की राजनीति भी उन्होंने कभी नहीं की।

डॉ. आंबेडकर के विचारों का हवाला देकर राजनीति करने वाले नेताओं और सभी दलों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि डॉ. आंबेडकर के विचार केवल दलितों के उत्थान के लिए ही नहीं, राष्ट्र के उत्थान के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति इतनी स्पर्धात्मक हो गई है कि जातीय अस्मिता को लेकर सभी राजनीतिक दल विस्फोटक भूमिका अपनाने में लगे हैं। यह सीमा अब राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार जाति के आधार पर तय करने तक पहुंचे, यह घटना ही मन को अस्वस्थ करने वाली है। इस तरह के राजनीतिक कोलाहल का मतलब यह नहीं है कि लोकतंत्र जिंदा है। जातिवाद भारत के सभी दलों को स्वर्णमृग की तरह लगता है। लेकिन इस स्वर्णमृग के मोह के कारण ही श्रीराम संकट में पड़े, यह सत्य है। उचित समय पर ही कुछ बातों का अनुमान लगा लेने में ही सयानापन है।

सन २०२२ में हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव अर्थात ७५वीं वर्षगांठ मनाने वाले हैं। क्या अमृत महोत्सवी वर्ष में भी हम अपने राष्ट्रजीवन को अंतर्विरोधाभासों में ही उलझाए रखने वाले हैं? मान भी लें कि राजनीति में लोकतंत्र होगा, समानता होगी; लेकिन सामाजिक जीवन में भी क्या हम असमानता से पिछड़े रहने वाले हैं? यदि ऐसा ही रहा तो वह राष्ट्रहित में नहीं होगा। लेकिन हमें यदि एक राष्ट्र के रूप में खड़ा होना होगा तो इस जातिभेद पर विजय पाना ही होगा। हमें अपने आप से प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या एक राष्ट्र के रूप में जिंदा रहने की हमारी आकांक्षा है? यदि ऐसी इच्छा हो तो ‘सामाजिक लोकतंत्र’ को स्थापित करने वाली राजनीति अपनाने के लिए राजनीतिक दलों को हमें प्रोत्साहित करना चाहिए।