विकास का संपोषक राष्ट्रवाद - नितिन गडकरी

 विवेक हिन्दी  31-Jul-2017

‘‘विवेक संवाद के द्वारा मुंबई में आयोजित संगोष्ठी में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जी ने बैंकिंग, फायनांस और सरकार के सम्बंध में अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किये। उन विचारों के कुछ अंश पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत किए गए हैं। ’’



हमें एक बात को विशेष रूप से समझना होगा कि अगर देश के प्रति सही नीति अपनानी है तो १९४७ से लेकर आज तक जो सामाजिक व आर्थिक चिंतन हमने स्वीकार किया है, हमें उसका ऑडिट करके, क्या सही है और क्या गलत है इसका अनुभव करके आगे जाने की आवश्यकता है। १९४७ में स्वतंत्रता के बाद आर्थिक दृष्टि से ३ विचारधाराएं मुख्यत: प्रभावित थीं। पहली समाजवादी व्यवस्था थी जिसके समर्थक बहुत ज्यादा थे। दूसरी कम्युनिस्ट विचारधारा थी और तीसरी थी पूंजीवाद।

१९४७ से लेकर आज तक जो जो नीतियां सरकारों ने हमारे लिए बनाईं, उन नीतियो के आधार पर इनका मूल्यांकन करना होगा कि किन परिस्थितियों के परिणाम देश के लिए कितने अच्छे निकले और कितने बुरे निकले हैं। उनका अध्ययन करने के बाद भविष्य की नीति तय करनी होगी।

इतनी प्रभावी कम्युनिस्ट विचारधारा की पूरी दुनिया में क्या हालत है, सभी जानते हैं। हंगरी के बुडापेस्ट शहर में लोगों ने मार्क्स, लेनिन जैसे विचारकों की मूर्तियां तोड़ डालीं; क्योंकि उनका उन सब से विश्वास उठ गया। कम्युनिस्ट विचारधारा के आधार पर चीन में जो एन आर सी थे, उन्होंने बड़े पैमाने पर इंवेस्ट किया। वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसे उदारवादी अर्थव्यवस्था के रूप में स्वीकार करके उन्होंने अपने प्रगति के कार्यक्रमों को बनाया था। रूस में भी हालात कुछ ऐसे ही हो गए हैं। १९६८ में कोलकाता में भारतीय मजदूर संघ का अधिवेशन हुआ था उसमें दत्तोपंत ठेंगडी जी ने उस समय भविष्यवाणी की थी कि, जिस भूमि पर कम्युनिस्ट विचारधारा की शुरूआत हुई है, उसी भूमि पर कम्युनिस्ट विचारधारा समाप्त होगी। तब देश में उसकी काफी चर्चा हुई थी; परंतु दत्तोपंत जी का कथन सिद्ध होता दिख रहा है।

दूसरी समाजवादी विचारधारा थी जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया ने प्रभावी ढंग से रखा। कुछ समाजवादी सरकारें आईं, उन्होंने समाजवादी नीतियां रखीं। जवाहर लाल नेहरू ने सामाजिक साम्यवाद अर्थात सोशोकम्युनिस्ट मॉडल को स्वीकार किया था और विशेष रूप से रूसी मॉडल उनके लिए प्रेरणा का मानक था। १९४७ के बाद से आज तक कांग्रेस ने जो-जो नीतियां स्वीकार कीं उसके कारण हमारा देश धनवान है पर जनता गरीब है। आज ऐसी स्थिति आ गई है कि सब कुछ होने के बावजूद हम प्रगति व विकास के मापदंड को पूरा नहीं कर सके हैं।

समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के मिश्रण की विचारधारा भी पूरी दुनिया में असफल हो चुकी है। अब स्वाभाविक रूप से पिछले ७० सालों में जो स्थितियां बनी हैं, उनके आधार पर प्रशासन, वित्तीय प्रबंधन, सामाजिक वित्तीय प्रणाली, प्रजातांत्रिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था आदि में जो भी दावेदार हैं उन सबके लगाव का ध्यान रखते हुए देश की भविष्य नीति क्या होगी, यह देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है।

मुझे इस बात का गर्व है कि हम जिस विचारधारा के आधार पर चलते हैं उसकी प्रमुख विशेषता है राष्ट्रवाद। यह हमारी आत्मा है। हमारे राष्ट्र का सर्वांगीण विकास और उन्नति हो, हमारा राष्ट्र प्रगतिशील, संपन्न, समृद्धशाली हो। भय, भूख, आंतक और भ्रष्टाचार से मुक्त हो। गांव, गरीब मजदूर का कल्याण हो। और इस प्रकार के एक समृद्ध, संपन्न और सुखी राष्ट्र के लिए हम काम कर रहे हैं, जिसको हम माता के समान मानते हैं। हम सुशासन और विकास में विश्वास करते हैं। सुशासन में कितने आयाम हैं और विकास की कितनी संकल्पनाएं हैं, मैं उसके विस्तार में नहीं जाना चाहता।

सदन में एक नोट आया था, जिसमें लिखा था कि आने वाले २० -२५ वर्षों में इलेक्ट्रानिक सामान, कंप्यूटर हार्डवेयर और हार्ड डिस्क में हमारा आयात कितना बढ़ेगा। इस पर एक नीति आई थी कि हम एक के बाद एक छूट देंगे। उस नोट को देख कर मैंने कहा कि मैं इस नोट से सहमत नहीं हूं। अगर२५ लाख करोड़ का आयात होगा और छूट १ लाख करोड़ की देंगे तो कौन सी इंडस्ट्री आएगी। प्रधानमंत्री जी भी इस बात से सहमत थे। हमने तय किया कि हमारी नीति ‘आयात आधारित’ होनी चाहिए।

मेरा दृष्टिकोण तो यह है कि हमारे देश में इस तरह के रिसर्च हों कि आयात की बजाय हमारा निर्यात कैसे बढ़ाया जाए और हमारे देश में कुछ भी आयातित न हो। रा.स्व.संघ के पूर्व सरसंघचालक सुदर्शन जी उस समय कहते थे तो लोगों ने समझा नहीं लेकिन अब बायोडीजल, एथनाल, सीएनजी, बायोगैस, मीथेनाल आदि सब कम खर्चीले और प्रदूषण विहीन समाधान हैं। मैं तो इस बात पर विश्वास रखता हूं कि इस देश में कोई जरूरत नहीं है, यह सब खाड़ी देशों से लाने की। संविधान के अनुसार जो विषय राज्य सरकार के अंतर्गत हैं वह राज्य सरकार करे। जो केंद्रीय विषय हैं वे भारत सरकार लाए। स्वाभाविक रूप से इससे देश की परिस्थिति में सुधार होगा।

आज जिसकी ओर सब से ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए वह है नॉलेज। विज्ञान, तकनीक, नव उत्पाद शोध, उद्यमिता, नीतियां; यह सूची और आगे बढ़ेगी। इस सूची में ज्ञान ही आने वाले भविष्य की पूंजी है। ‘ज्ञान का धन में रुपांतरण’ ही हमारे देश का भविष्य है। हमारे इंजीनियर्स, हमारे डॉक्टर्स, हमारे रिसर्च करने वाले लोग ये हमारी ताकत हैं। छोटी-छोटी बातों से लेकर बड़ी-बड़ी बातों तक देश के लिए, समाज के लिए, प्रगति और विकास के लिए क्या आवश्यकताएं हैं, इस पर शोध करवाने की आवश्यकता है। यह काम विश्वविद्यालयों और वित्तीय विद्यालयों और व्यासपीठों का काम है।

सैद्धांतिक रूप से जिनके पास विचार करने की क्षमता है, बुद्धिमत्ता है, जो भविष्य के बारे में सोच सकते हैं, जो भविष्य के स्वप्न को समझ रहे हैं, ऐसे लोग बैठ कर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जैसे कि उद्योग, कृषि, आर्थिक नीतियों का अध्ययन करके वे नियम बनाने में सरकारों के पूरक होते हैं तो यह देश के भविष्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

राष्ट्रवाद और सुशासन के साथ ही तीसरी बात जो सबसे जरूरी है, वह है अंत्योदय की, जो कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का सामाजिक आर्थिक चिंतन था। उसमें उन्होंने कहा है कि धन का बंटवारा कैसे होगा? नवीन तकनीक और शोध का जो ज्ञान है उसके आधार पर वहां की मजबूती और कमजोरियों को समझ कर हमारी नीतियां यदि उन राज्यों को मिलेंगी तो विकास का पथ प्रशस्त होगा। ये जो नई नीति होगी उसका केंद्रबिन्दु कौन होगा, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। हम लोग सोचते हैं कि इसका केंद्रबिन्दु दीनदयाल उपाध्याय जी ने जैसे कि कहा है जो दलित, पीड़ित, शोषित हैं, जो आखिरी पायदान पर खड़ा है ऐसे दरिद्र नारायण के विकास की संकल्पना हमारा मिशन है। जिनके पास रहने के लिए घर नहीं है, खाने के लिए रोटी नहीं है, पहनने के लिए कपड़ा नहीं है, उसको केंद्रबिन्दु मान कर, उसको भगवान मान कर हम नीतियां बनाएं कि हम उसको रोटी-कपड़ा-मकान कैसे दिला सकते हैं। उसके जीवन को संपोषणीय कैसे बना सकते हैं। भय, भूख, आतंक और भ्रष्टाचार से मुक्ति कैसे दे सकते हैं। सुखी, सम्पन्न और समृद्ध राष्ट्र इससे बनने वाला है। उसको केन्द्रबिन्दु मान कर नीतियां बनाना हमारी सब से बड़ी प्राथमिकता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से रोजगार निर्माण करने वाली व्यवस्था हमारी सब से बड़ी आवश्यकता है।

महाराष्ट्र के पास ४०-५० हजार करोड़ की संपत्ति प़ड़ी है। आंध्र प्रदेश के पास पड़ी है। पोलावरन एक बांध है जो ४० हजार करोड़ का है। हमारा बांध है गोसीखुर्द, जो पहले ४२० करोड़ का था अब उसका खर्च १८,००० करोड़ रु. हो गया है, फिर भी अधूरा पड़ा है। जबकि १२ हजार करोड़ की बेकार संपत्ति पड़ी हुई है। और पानी नहीं है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। जब मैंने अधिकारियों को बहुत समझाया तब जाकर यह फैसला हुआ कि पहली बार ८० हजार करोड़ प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में दिया जाएगा जो राज्य सरकार को कैनाल सिस्टम और प्रकल्प पूरा करने के लिए देंगे। जिसमें से महाराष्ट्र को अगले तीन वर्षों में ३६ हजार करोड़ रु. मिलने वाले हैं।

इस मामले में सब से सराहनीय कार्य तेलंगना के मुख्यमंत्री ने किया। उन्होंने सिंचाई का ७००० करोड़ का बजट तेईस हजार करोड़ कर दिया। इस प्रकार इन राज्यों में यदि ५० प्रतिशत की भी सिंचाई होगी तथा दूसरे साल २० से ३० प्रतिशत की भी सिंचाई होगी तो वह ७० प्रतिशत हो जाएगा। जिससे हमारी कृषि उत्पादकता दो से ढाई गुना ज्यादा बढ़ेगी। यदि यही एक काम भी हमने ठीक से किया तो एक भी किसान आत्महत्या नहीं करेगा। कोई भी मराठवाड़ा और विदर्भ से मुबंई और पुणे नहीं आएगा।

उज्ज्वला योजना से हम पांच करोड़ परिवारों को गैस सिलिंडर और चूल्हा मुफ्त दे रहे हैं। अभी तक हमने दो करोड़ परिवारों को दिया है। करोड़ों महिलाओं को लकड़ी और कोयले की वजह से होने वाली बीमारी से मुक्ति मिली है। पांच करोड़ गरीब परिवारों को गैस मिलेगा तो कितने करोड़ लोगों को फायदा होगा? जब हमारी सरकार आई तो साढ़े तीन करोड़ लोगों के बैंकों में खाते थे। आज २९ करोड़ अर्थात लगभग दस गुना लोगों के खाते हैं। और ६६ हजार करोड़ डिपॅेजिट किए गए। पहली बार बैंकिग व्यवस्था के साथ गरीब को जोड़ा गया। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना द्वारा उनको पैसा मिले और वे अपना रोजगार कैसे करें, यह हमारी प्राथमिकता है। मुझे लगता है कि देश के भविष्य का आर्थिक चिंतन सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के विविधीकरण की बहुत बड़ी आवश्यकता है। इससे कृषि विकास दर २० से ऊपर जाएगा। कॉटन क्राप, बीड्स क्राप, बांस वगैरह से ईंधन तैयार होगा, बिजली तैयार होगी। हम ७ लाख करोड़ का क्रूड आइल इंपोर्ट करते हैं, उसमें से ३ लाख करोड़ का आइल निर्यात करते हैं। बाकी के चार लाख करोड़ में से हमने अगर २ लाख करोड़ भी बचाए और उससे ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग लगाएंगे तो क्यों लोग यहां आएंगे और क्यों यहां समस्याएं खड़ी होंगी।
सबको अच्छी तरह से खाना मिलना चाहिए, घर मिलना चाहिए, यही हमारा विचार है और इसको लेकर हम काम करते हैं। इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि हमारी राष्ट्रवाद की विचारधारा के अंतर्गत सुशासन, विकास, अंत्योदय, ई-गवर्नेस और सामाजिक आर्थिक चिंतन के साथ भौतिक प्रगति के मॉडल पर हम काम कर रहे हैं।

आखिर में मैं एक ही बात कहूंगा कि भौतिक विकास तो हो गया, बंगला आया, मर्सडीज आई, परिवार आया, सब अच्छा हो गया, सब ब़ढिया चल रहा है। तो क्या खत्म हो गया सब कुछ? पर यह वास्तविक सफलता नहीं कही जाएगी। आज स्थिति ऐसी है कि जहां संपन्नता है वहां के प्रश्न ज्यादा हैं। ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने मुझ से एक प्रश्न पूछा, ‘‘आपके देश में सबसे बड़ी समस्या कौन सी है?’’ मैंने कहा कि ,‘‘गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है। ’’ मैंने भी पूछा, ‘‘आपके यहां क्या समस्या है?’’ उन्होंने कहा कि, ‘‘हमारे देश की सब से बड़ी समस्या यह है कि हमारी लड़कियां कुमारी माता बन जाती हैं क्योंकि परिवार व्यवस्था पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हुई है। पश्चिमी देशों में विकास हुआ है पर परिवार व्यवस्था टूट गई है। वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं। वृद्ध होने पर अच्छे-अच्छे लोगों की हालत देख कर दुख होता है।

मूल्याधिष्ठित शिक्षा, मूल्याधिष्ठित परिवार और मूल्याधिष्ठित जीवन प्रणाली हमारी सब से बड़ी ताकत है। यह ताकत कहां से आई ? यह संस्कारों से आई। धर्म कहें तो लोग उसे संकीर्ण कह देते हैं। हिंदुत्व बोलो तो जातिवादी बोल देते हैं। लोग अर्थ समझने के लिए तैयार नहीं हैं। धर्म का अर्थ कर्तव्य के साथ है, यह सुप्रीम कोर्ट ने परिभाषित किया है। हिंदू धर्म संकुचित नहीं है। यह भारतीयत्व के साथ जुड़ा हुआ है। हम इतिहास, विरासत और संस्कृति को लेकर चल रहे हैं। जो कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर की सोच है। डॉ.हेडगेवार की सोच है। संघ का विचार है। हम किसी के विरोध में नहीं हैं। हम जाति, भाषा, पंथ के आधार पर किसी भी बंटवारे को मान्य नहीं करते। हम प्रगतिवादीहैं। हम सामाजिक समानता की बात करते हैं। हम वित्तीय समानता की बात करते हैं। हम कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति जाति, भाषा, पंथ से बड़ा नहीं होता बल्कि अपने गुणों से बड़ा होता है। पर हमारी छवि है कि हम संकीर्ण और जातिवादी हैं। हमारे पास कोई आर्थिक चिंतन नहीं है।

प्रगतिवादी आर्थिक चिंतन, ज्ञान के साथ भविष्य का विचार और ज्ञान का वित्तीय रूपांतरण तथा उसके आधार पर समाज का निर्माण करते समय प्रगति और विकास के मापदंड को देखते हुए हम निर्यात को आगे बढाएंगे, आयात को घटाएंगे, मेक इन इंडिया’ ‘मेड इन इंडिया’ जैसी बातों को आगे बढ़ाएंगे। एक तरफ विकास होगा और दूसरी ओर मूल्याधिष्ठित परिवार व्यवस्था भी होगी। दोनों के समन्वय से समृद्ध और संपन्न राष्ट्र का निर्माण होगा, जो कि दुनिया के लिए आदर्श होगा।
जब मैंने कहा था कि समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद, तीनों से लोगों को निराशा है तो हमारी विचारधारा के आधार पर, हमारी संस्कृति और इतिहास के आधार पर पूरे विश्व को दिशा देने की ताकत हमारे पास है।

हम लोग विज्ञानवादी हैं। हम ज्ञान का वित्तीय रूपांतरण चााहते हैं। हम धर्म को मानते हैं। हिंदुत्व को मानते हैं तथा ज्ञान-विज्ञान को मानते हैं। आपने कभी बालासाहब देवरस जी को सुना होगा? उनके पूरे भाषणों में ज्ञान-विज्ञान तथा आधुनिक विचारधारा की बाते हैं। हम कोई पुराने और रुढ़िवादी विचार वाले नहीं हैं। हम समय के साथ देश के हित में बदलते विचार को लेकर आगे चल रहे हैं। आज की अनेक समस्याओं का उत्तर हमारी बातों में हैं। अगर इसे प्रभावशाली तरीके से दुनिया के सामने रखना है तो हमें आधुनिक सोच रखनी पड़ेगी। आधुनिकता और पश्चिमीकरण में अंतर है। हम पश्चिमीकरण के खिलाफ हैं, आधुनिकता के खिलाफ नहीं हैं। इसलिए आधुनिक चिंतन का आधार लेकर, ज्ञान -विज्ञान तथा यंत्र-विज्ञान का उपयोग करके, कृषि से लेकर उद्योग तक, बैकिंग से लेकर विदेशी निवेश तक वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते हुए हालात को देखते हुए, सबसे गरीब व्यक्ति को केंद्रबिन्दु मान कर हमारी नीतियों को लेकर आगे बढ़ें तो हम गरीबी उन्मूलन का सपना पूरा कर रोजगार का निर्माण भी करेंगे। हमारा निर्यात भी बढ़ेगा, उद्योग भी बढ़ेंगे। बैकिंग सिस्टम भी बढ़ेगा। देश भी शक्तिशाली होगा। पूरी दुनिया के लिए हम एक आदर्श के रूप में प्रतिस्थापित होंगे।
(केंद्रीय राजमार्ग, सड़क परिवहन व नौवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी के हाल में मुंबई में आयोजित विवेक संवाद की संगोष्ठी में हुए भाषण का संक्षिप्त रूप। )