हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण

 विवेक हिन्दी  31-Jul-2017


किसी समाज में भाषा अथवा बोली का प्रयोग शुरू होने के काफी समय बाद उसके व्याकरण की रचना होती है। भाषा मूलतः व्याकरण की आश्रित नहीं होती, किन्तु व्याकरण के माध्यम से संस्कारित होकर वह बोली और लिखी जाती है। व्याकरण में भाषा के इन्हीं नियमों को सिद्धांत रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किसी भाषा के व्याकरण में उस भाषा की संरचना पर प्रकाश डाला जाता है। व्याकरण के सही ज्ञान से भाषा के विशेष साहित्य का अर्थ आसानी से समझा जा सकता है। सार रूप में कहा जाए तो - किसी भी भाषा के आधार के रूप में उसके व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है। व्याकरण भाषा की वह नींव है, जिस पर उसका सुसज्ज भवन खड़ा होता है ।

इसी विचार को ध्यान में रख कर डॉ. दिनेश प्रताप सिंह ने ‘हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण’ ग्रंथ की रचना की है। इस विषय में उनका कहना है- यह बार-बार अनुभव होता है कि देश के विभिन्न भागों में हिन्दी के पढ़ने-लिखने के प्रति लोगों में इच्छाशक्ति बढ़ रही है। किन्तु उनके सामने अनेक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। सबसे प्रमुख है शुद्धता के प्रति उनकी झिझक। यह झिझक हिन्दी के व्याकरण के विषय में उनके ज्ञान को लेकर है। उन्हें सरल भाषा और व्यवहारिक रूप में हिन्दी के व्याकरण की जरूरत सदैव महसूस होती है। उनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए इस ग्रंथ की रचना की गई है।

हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण ग्रंथ में विषयवस्तु का निर्धारण विद्यार्थियों, नवलेखकों और पाठकों को ध्यान में रख कर किया गया है। शब्द भेद और शब्द संपदा पूरी तरह से विद्यार्थियों के लिए है। शब्द भेद के अंतर्गत विकारी शब्द-संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया तथा शब्द विकार के कारण- लिंग, वचन, कारक हैं, तो साथ में अविकारी शब्द अर्थात अव्यय भी शामिल हैं। शब्द संपदा में उपसर्ग, प्रत्यय, समास, सन्धि समाहित हैं। यह भाग चालीस पृष्ठों में है। आगे की विषयवस्तु- वाक्य, काल, अशुद्ध शोधन, वर्तनी विचार, विराम चिह्न, पर्यायों में अर्थभेद, पर्यायवाची, विलोम शब्द, लोकोक्तियां, मुहावरे, रस, छन्द, अलंकार, सार लेखन, भाव विस्तार, निबंध लेखन, पत्र लेखन विद्यार्थियों के साथ ही सामान्य पाठकों और लेखकों के लिए उपयोगी है। इन सबको इस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है कि गैर हिन्दी भाषी लेखक-पाठक भी हिन्दी को भली प्रकार से समझ, लिख और बोल सकें। अशुद्धियों की पहचान करने और उन्हें दूर करने हेतु विस्तृत मार्गदर्शन इस पुस्तक में किया गया है। इस तरह हिन्दी भाषा का अध्ययन करने वालों को व्याकरण के व्यावहारिक पक्ष को समझाने और आवश्यक सामग्री सुलभ कराने का पूरा प्रयास किया गया है।

डॉ.दिनेश प्रताप सिंह का हिन्दी के व्याकरण के क्षेत्र में किया गया यह प्रयास स्तुत्य है । यह ग्रंथ हर दृष्टि से पठनीय और संग्रहणीय है। इस ग्रंथ की उत्कृष्टता और उपयोगिता का आंकलन करके केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने इसके प्रकाशन हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान किया है, ताकि कम मूल्य में यह ग्रंथ सबको उपलब्ध हो सके।