परमाणु हथियारों का ‘नो फर्स्ट यूज’

 विवेक हिन्दी  31-Jul-2017

भारत के अमेरिका और इजराइल से घनिष्ठ होते सम्बंधों को देख कर पाकिस्तान और चीन भारत से खार खाए बैठे हैं। चूंकि वैश्विक दबाव के चलते खुले आम भारत पर हमला करना संभव नहीं होगा; अत: वे आत्मघाती मानवी परमाणु बम का उपयोग करने में भी नहीं हिचकिचाएंगे।



‘अ गर किसी देश के पास परमाणु हथियार न हों, तो यह सबसे अच्छा होगा। परंतु ऐसा नहीं है इसलिए हथियार रखने के मामले में अमेरिका को सबसे आगे रहना होगा। ’ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के बाद दिए एक साक्षात्कार में यह बात कही थी। इससे यह साफ जाहिर होता है कि परमाणु हथियारों के सम्बंध में आज भी अमेरिका की नीति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है।

अगस्त १९४५ में अमेरिका ने जापान के दो शहरों- हिरोशिमा और नागासाकी- पर परमाणु बमों से हमला किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका के सामने रूस और जापान, दो ही ऐसे देश थे जो उसे सीधी टक्कर दे सकते थे। अगर युद्ध कुछ दिन और चलता तो हो सकता था कि अमेरिका जीत जाता परंतु वह युद्ध को अधिक दिन तक खींचना नहीं चाहता था; क्योंकि आर्थिक दृष्टि से ऐसा करना अमेरिका के लिए लाभप्रद नहीं था। इसलिए युद्ध समाप्त करने के लिए उसने जापान के दो शहरों- हिरोशिमा और नागासाकी- पर क्रमश: ‘लिटिल बॉय’ और ’फैट मैन’ नामक दो परमाणु बम गिराए। परमाणु बमों से जापान को जो नुकसान हुआ उसका खामियाजा आज भी वहां की जनता भुगत रही है।

ट्रम्प की परमाणु नीतियों को कई लोग दोगली करार देते हैं, क्योंकि अगर अन्य कोई देश परमाणु हथियार बनाए तो अमेरिका उनके खिलाफ कड़े कदम उठाता है, परंतु खुद परमाणु हथियार रखने वाला सबसे बड़ा देश बनना चाहता है। वर्तमान में अमेरिका से ज्यादा परमाणु हथियार रखने वाला एक मात्र देश रूस है। स्पष्ट है कि महाशक्ति बनने की दौड़ में रूस को पछाड़ने के लिए परमाणु हथियार लंबी रेस का घोड़ा साबित होंगे। इसलिए ट्रम्प की अधिकतम परमाणु हथियार रखने की महत्वाकांक्षा रखना लाजमी है।

ऐसा नहीं है कि विश्व में केवल इन दो ही देशों के पास परमाणु हथियार हैं। कुल ९ देशों के मिलाकर लगभग १५००० परमाणु हथियार इस समय दुनिया में मौजूद हैं, जिनमेंं भारत, पाकिस्तान, इजराइल, उत्तर कोरिया आदि शामिल हैं।

स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (सिप्री) के हालिया आंकड़े कहते हैं कि भारत के पास ९० से ११० परमाणु हथियार हैं। दुनिया की बड़ी परमाणु शक्तियों की कतार में भारत एक अलग ही तरह का देश है। भारत ने न तो अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत किए हैं और न ही यह उन पांच परमाणु शक्तियों में से है जिसे यह संधि मान्यता देती है। एनपीटी का सदस्य न होते हुए भी भारत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से परमाणु तकनीकी और सामग्री खरीद सकता है। वह भी कानून के दायरे में रहते हुए और किसी भी तरह के प्रतिबंधों और रुकावट की चिंता किए बगैर। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी भारत से कोई तकलीफ नहीं है; क्योंकि वह जानता है कि उसका सामना किसी बेईमान देश से नहीं है।

उत्तर कोरिया, ईरान, इजराइल और पाकिस्तान जैसे गैर-एनपीटी परमाणु राष्ट्रों को भले ही संदेह से देखा जाता रहा है; लेकिन भारत के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कभी किसी तरह की गहरी चिंता नहीं जताई है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत के सैन्य परमाणु कार्यक्रमों को खत्म करने की कभी कोई मांग नहीं उठी है।

निरस्त्रीकरण के नज़रिए से देखा जाए तो भारत का विशाल परमाणु भंडार चिंता का विषय हो सकता है। लेकिन अगर इसकी सुरक्षा की बात करें तो भारत को पहले ही एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति का दर्जा दिया जा चुका है। भारत-अमेरिकी असैन्य परमाणु करार इसका प्रमाण है। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत से परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करने की बजाय उसके सैन्य और असैन्य परमाणु कार्यक्रमों पर भरोसा करता है और उन्हें स्वीकार्यता देता ही नज़र आता है।

इस मौन स्वीकार्यता का मुख्य कारण भारत की ‘नो फर्स्ट यूज़’ नीति है जिसका ऐलान पहली बार २००३ में हुआ था। सरल तरीके से समझें तो इस नीति के अनुसार भारत तब तक युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगा, जब तक उस पर हमला करने वाला कोई देश परमाणु हथियार का इस्तेमाल न करे।

क्षेत्रीय नज़रिए से देखा जाए तो भारत का परमाणु ताकत होना अप्रत्यक्ष तौर से एक वरदान साबित हुआ है।

१९७४ में जब भारत ने अपनी परमाणु शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन किया तो पाकिस्तान ने भी उसका अनुसरण किया और दक्षिण एशिया में हथियारों की एक होड़ शुरू हो गई। अगर यह होड़ न शुरू हुई होती या सिर्फ भारत के पास ही परमाणु बम होते, तो दो तरह के परिदृश्यों की कल्पना की जा सकती है। पहला, परमाणु हथियारों के न होने की स्थिति में भारत और पकिस्तान में अपनी चिर-परिचित आपसी दुश्मनी के चलते, ८० के दशक में, ईरान-इराक जैसी कुछ लड़ाइयां हुई होतीं। ऐसा होने पर निश्चित रूप से जन-धन की अपार हानि होती और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं लगभग बर्बाद हो जातीं। दूसरा, यदि सिर्फ भारत के पास ही परमाणु बम होता तो वह एकमात्र क्षेत्रीय सैन्य महाशक्ति बन जाता और पाकिस्तान को हमेशा के लिए उसके सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर होना पड़ता।

पाकिस्तान ने ‘नो फर्स्ट यूज’ जैसी कोई नीति नहीं अपनाई है। किसी भी अन्य राष्ट्र के द्वारा किए गए परमाणु हमले को सहन करने के बाद उसका जवाब देने के लिए जिन सैन्य क्षमताओं की आवश्यकता होती है उतनी पाकिस्तान के पास नहीं है। यही कारण है कि वह ‘नो फर्स्ट यूज’ की पॉलिसी नहीं अपनाता।

इस बात से तो सभी अवगत हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का उगम स्थान और उसका समर्थन करने वाला देश है। तालिबान, अलकायदा का जब जन्म हुआ तब अमेरिका का पाकिस्तान को समर्थन था; परंतु जैसे ही ये संगठन पाकिस्तान से बाहर निकले उसने अलकायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन के माध्यम से अमेरिका पर आक्रमण करवा दिया। अब अमेरिका खुद इस बात का समर्थन करता है कि पाकिस्तान ने परमाणु बम बनाने की तकनीक को सारे विश्व में स्मगल किया है। इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान न केवल आतंकवाद फैला रहा है बल्कि न्यूक्लियर पावर भी फैला रहा है।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान भले ही परमाणु बमों का उपयोग न करें, परंतु अगर ये परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ लग गए तो वे इसका इस्तेमाल कहां करेंगे यह पाकिस्तान भी नहीं जानता।
पाकिस्तान के साथ ही उत्तर कोरिया भी एक ऐसा देश है जो परमाणु बमों की धमकी आए दिन अमेरिका को देता रहता है। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि चीन का इन दोनों ही देशों को समर्थन है। जिन आतंकवादियों को सारा विश्व आतंकवादी मानता है चीन उसे आतंकवादी नहीं मानता। वह पाकिस्तान का समर्थन करता है और उत्तर कोरिया का भी। यह चीन संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का सदस्य है। उसके पास वीटो पावर है। यदि विश्व कोई देश कार्रवाई करना भी चाहे तो चीन अपने वीटो पावर से उसे रोक देता है। वैश्विक स्तर पर परमाणु बम से सम्बंधित सबसे बड़ा खतरा इन्हीं दो देशों से है।

परमाणु अस्त्रों का बडे पैमाने पर प्रयोग करने के लिए दो मुख्य बातों का होना आवश्यक होता है। पहला- परमाणु बम जो विस्फोट करते हैं और दूसरे उन्हें ले जाने वाले संवाहक। ये संवाहक तीन प्रकार के होते हैं- जल, थल और वायु में परमाणु बमों को ले जाने वाले। भारत की वायु सेना के पास सुखोई, मिग२५, मिराज और जगुआर जैसे हवाई जहाज परमाणु बमों को ले जाने में सक्षम हैं। उसी प्रकार जमीन से वार करने के लिए उपयोग की जाने वाली पृथ्वी तथा अग्नि४ मिसाइलें हैं जिनका परमाणु बम दागने में उपयोग किया जा सकता है। पहले इनकी रेंज कुछ कम थी जिसके कारण हम केवल तिब्बत तक ही वार कर सकते थे। परंतु अब अग्नि५ आ जाने के बाद से हमारी रेंज चीन तक हो चुकी है। वायु और थल के साथ ही जल से ब्रम्होस के द्वारा भी परमाणु हथियारों का प्रयोग किया जा सकता है।

भारत की तरह चीन तथा अन्य देशों के पास इस तरह के संवाहक उपलब्ध हैं परंतु पाकिस्तान के पास नहीं है और न ही किसी आतंकवादी संगठन के पास हो सकते हैं। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि इनके न होने से वे परमाणु हमला नहीं कर सकते। उनके लिए परमाणु हमले करने का सबसे सस्ता और सबसे खतरनाक हथियार है आत्मघाती मानव बम। जिस तरह भारत में राजीव गांधी की हत्या की गई थी उसी तरह आतंकवादी आत्मघाती परमाणु बम का प्रयोग कर सकते हैं।
जहां तक अन्य देशों का सवाल है वे भी यूनो में सर्वसम्मति से निर्धारित की गई ‘नो फर्स्ट यूज’ की नीति का ही पालन करते हैं, परंतु पाकिस्तान और आतंकवादियों पर कतई विश्वास नहीं किया जा सकता। वर्तमान में भारत, चीन और पाकिस्तान की सामरिक परिस्थितियों को देखते हुए इस खतरे को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि फिर कोई कसाब भारत के किसी महानगर पर हमले की तैयारी कर रहा हो।

भारत के अमेरिका और इजराइल से घनिष्ठ होते सम्बंधों को देख कर पाकिस्तान और चीन भारत से खार खाए बैठे हैं। निश्चित रूप से वे भारत का नुकसान करने की ताक में हैं। चूंकि वैश्विक दबाव के चलते खुले आम भारत पर हमला करना संभव नहीं होगा; अत: वे आत्मघाती मानवी बम का उपयोग करने में भी नहीं हिचकिचाएंगे।

अगर कोई देश जल, थल और वायु सेना के माध्यम से इनका प्रयोग करता है तो उसे तो बाद में दंडित भी किया जा सकता है। परंतु आत्मघाती हमले के बाद तो ऐसा कुछ नहीं किया सकता। अत: भारत की इंटिलिजेंंस ब्यूरो से लेकर आम नागरिक को भी सावधान रहने की आवश्यकता है।