प्राचीन ओडिशा

 विवेक हिन्दी  31-Jul-2017

ओडिशा राज्य धार्मिकता, पर्यटन और औद्योगिकरण का त्रिवेणी संगम है। हर भारतवासी को जीवन में एक बार ओडिशा अवश्य घूमना चाहिए।



ओडिशा राज्य का इतिहास कहता है कि ऐतिहासिक काल में इस राज्य पर कलिंग साम्राज्य का आधिपत्य था। ईसा पूर्व २६१ में सम्राट अशोक ने ओरछा राज्य यानी कलिंग साम्राज्य पर आक्रमण किया। सम्राट अशोक और कलिंग साम्राज्य के बीच हुआ यह युद्ध ही ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से प्रचलित हुआ।

भारत के कुल २९ राज्यों में से, बड़े राज्यों की श्रेणी में ओडिशा नौंवें क्रमांक का राज्य है। जनसंख्या के हिसाब से यह ११हवें क्रमांक पर है। भारत के पूर्वी छोर पर, बंगाल की खाड़ी पर यह राज्य बसा है। ओडिशा राज्य को कुल ४८५ कि.मी. समुद्र तट प्राप्त है। इस राज्य में ३० जिले हैं।
पर्यटन-क्षेत्र में ओडिशा ने एक विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। राज्य का समुद्र तट, यहां की पौराणिक कथाएं तथा किवदंतियां, मंदिर, विपुल मात्रा में पानी, जंगल, खनिज, विविध सरोवर इत्यादि विशेषताओं के कारण यह राज्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
यहां पर बोली जानेवाली उड़िया भाषा, यहां के भले तथा सहृदय लोग और यहां की आवभगत करने की संस्कृति के कारण यहां पर्यटन करने को मन लालायित रहता है।

ओडिशा का पर्यटन आप कैसे करेंगे?
यहां का पर्यटन छोटे-बडों को कई प्रकार से अपनी ओर आकर्षित करता है। ओडिशा पुरातन मंदिरों की भूमि है। यहां कई मंदिर हैं। प्रथम स्थान पर है ‘जगन्नाथ मंदिर’। भारत की पूर्व दिशा का धाम यानी ‘जगन्नाथ धाम’। ‘जगन्नाथ धाम’ श्रीविष्णु के अवतारों में से एक श्रीकृष्ण भगवान का मंदिर है। इस मंदिर की रथयात्रा विश्वप्रसिद्ध है। इस मंदिर के गर्भगृह में तीन मुख्य देवताएं हैं। एक है कृष्ण भगवान, उनके बड़े भाई श्री बलराम (बलभद्र) और उनकी भगिनी सुभद्रा। इन तीनों की मूर्तियों को अलग-अलग तीन रथों में बिठाकर, रथों को सजाकर भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है। ये तीनों मूर्तियां काष्ठ यानी लकड़ी की है।

इस मंदिर की रचना वक्ररेखा के आकार में है। मंदिर के गुम्बद पर आठ आरों वाला सुदर्शन चक्र है। उसे नीलचक्र कहा जाता है। अष्ट धातुओं से निर्मित यह सुदर्शन चक्र अत्यंत पवित्र माना जाता है। गर्भगृह में विद्यमान श्रीकृष्ण भगवान, श्री बलभद्र भगवान व सुभद्रा देवी की मूर्तियां रत्नजड़ित पाषाण के चबूतरे पर स्थापित हैं। इन मूर्तियों की पूजा-अर्चना यह मंदिर स्थापित होने से पहले से ही चली आ रही है।

मंदिर का मुख्य आकर्षण है वहां की ‘रसोई’। रसोई में श्रीकृष्ण भगवान को भोग लगाने हेतु ‘महाप्रसाद’ बनाया जाता है। महाप्रसाद बनाने के लिए ५०० रसोइये और उनके ३०० मददगार शुद्धतापूर्ण कठोर नियमों का पालन करते हुए कार्यरत रहते हैं। इस महाप्रसाद को ग्रहण करने के लिए लोग इतने आतुर रहते हैं कि यहां अब एक लोकोक्ति बन गई है कि ‘जगन्नाथ के भात को, जगत पसारे हाथ’।

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर है। भुवनेश्वर ओडिशा राज्य का सबसे बड़ा शहर है। ओडिशा की पूर्व दिशा में बसा यह शहर ओडिशा की आर्थिक, राजनीतिक तथा शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र है। यहां से २५ किमी. दूर कटक शहर है। भारत के प्रमुख जुड़वां शहरों में से यह प्रमुख शहर है। भुवनेश्वर को पूर्व दिशा की काशी कहा जाता है। भुवनेश्वर तथा उसके आसपास का परिसर बड़ा ही रम्य, आकर्षक तथा हराभरा है। यहां पर लिंगराजमंदिर तथा भुवनेश्वरी देवी का मंदिर है। बौद्ध सम्प्रदाय को मानने वाले लोगों के पावन स्थल भी यहां हैं। धौलागिरी का प्रसिद्ध स्तूप यहां है। उदयगिरि, रत्नगिरि, ललितगिरि जैसे बौद्ध विहार हैं। उदयागिरि और खंडगिरि की गुफाओं में जैन राजा खारवेल द्वारा तराशी हुई कलाकृतियां देखने लायक हैं। भुवनेश्वर के राजा-रानी मंदिर में शिव-पार्वती की भव्य-मूर्तियां हैं। इस मंदिर की कलाकारी खजुराहो गुफा की याद दिलाती है। कुल मिलाकर इस शहर में छोटे-बड़े ६०० मंदिर हैं। यहां से ६५ कि.मी. पर कोणार्क सूर्यमंदिर है। यह १३हवीं सदी का बना हिंदू मंदिर है। इसका निर्माण राजा नरसिंह देव ने ई.स.१२३६ से १२६४ के बीच करवाया है। युनेस्को द्वारा इस सूर्यमंदिर को वैश्विक धरोहर घोषित किया गया है। मंदिर में विशाल आकार के बारह पहिये हैं। सूर्य का रथ और उसे खींचने वाले बारह घोड़े, ऐसी मंदिर के स्थापत्य की संकल्पना है। सूर्य-मंदिर देखने के लिए गाईड की आवश्यकता होती है। करीब डेढ़-दो घंटे मंदिर देखने के लिए लगते हैं। अब इस कोणार्क सूर्य-मंदिर में भग्न अवशेष ज्यादा हैं।

ओडिशा राज्य का नंदनकानन अभयारण्य पशुप्रेमी और जंगलप्रेमियों को आकर्षित करता है। नंदनकानन अभयारण्य ४०० हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह अपने बोटॅनिकल गार्डन के लिए भी मशहूर है। इसका प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटन-प्रेमियों को बहुत लुभाता है। १२६ प्रजाति के विविध जानवर यहां देखने को मिलते हैं। यह अभयारण्य सफेद बाघों के लिए भी विख्यात है।

ओडिशा में पर्यटन के लिए रेल्वे तो है ही परंतु जिन्हें अपना समय बचाना है, वे भुवनेश्वर हवाई-अड्डे से ओडिशा पर्यटन की शुरुआत कर सकते हैं क्योंकि यहां काहवाई-अड्डा भारत के सारे प्रमुख हवाई अड्डों से जुड़ा है। ओडिशा के भुवनेश्वर-पुरी-कोणार्क क्षेत्र को गोल्डन ट्रैंगल कहा जाता है। बंगाल की खाड़ी नजदीक होने के कारण ओडिशा को सुंदर समुंदर किनारा प्राप्त है। यह किनारा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। ओडिशा के सबसे सुंदर समुद्रतट हैं चांदीपुर या गोपालपुर का समुद्र तट, कोणार्क का समुद्र तट और जगन्नाथ पुरी का समुद्र तट।

ओडिशा के संभलपुर जिले का हीराकुड बांध मिट्टी से बना दुनिया का सबसे बड़ा बांध है।
पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक और केंद्र है- चिलका सरोवर। ओडिशा राज्य का उथला परंतु सबसे बड़ा खारे पानी का सरोवर भुवनेश्वर से ८९ किमी की दूरी पर है। यह सरोवर पुरी और गंजाम जिले में फैला है। बारिश में इसकी चौडाई लगभग १,१६५ वर्ग कि.मी. और गर्मी में करीब ८९१ वर्ग कि.मी. होती है।
बंगाल की खाड़ी की एक जगह पर अत्यधिक रेत जमा होने के कारण चिलका का निर्माण हुआ है। इसके दक्षिण और पश्चिम में सुंदर पहाड़ हैं। उत्तर के समतल भाग से भार्गवी नदी और दया नदी इस सरोवर में आकर मिलती हैं। चिलका सरोवर और उसके आसपास का प्रदेश प्राकृतिक सौंदर्य से सुशोभित है। वनश्री भी मनोरमहै। यह सरोवर मछली तथा दलदल में रहने वाले पक्षियों के शिकार के लिए मशहूर है। उसी प्रकार सागरी जीव विज्ञान और मत्स्य संवर्धन के केंद्र यहां पर है। देश विदेश के पक्षी-प्रेमी पर्यटक यहां आते हैं। यहां बड़े पैमाने पर फ्लेमिंगो पक्षियों का आगमन भी होता है।
इस प्रकार ओडिशा राज्य के प्राकृतिक दृष्टि से चार विभाग होते हैं -१) उत्तर का समतल भूभाग जहां कई पर्वत श्रृंखलाएं हैं, जिसमें मलयगिरी, मानकणी और मेघसानी जैसे १,१०० से १,२०० मीटर की ऊंचाई के शिखर हैं। २) मध्य भाग में स्थित नदी और घाटियों का प्रदेश- जो उपजाऊ है। यहां पर महानदी, बाह्मणी और वैतरणी नदियां हैं। ३) पूर्व पहाड़ियों का भूभाग - यहां सर्वोच्च शिखर हैं- देवमाली, महेंद्रगिरि और तुरीआ कोंडा। ४) किनारों का समतल भूप्रदेश-इसमें बलसोर, कटक और पुरी जिलों का समावेश है।

ओडिशा राज्य धार्मिकता, पर्यटन और औद्योगिकरण का त्रिवेणी संगम है। हर भारतवासी को जीवन में एक बार ओडिशा अवश्य घूमना चाहिए।