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अगले ओलंपिक में खिलाड़ियों को कचरे से बने मैडल मिलेंगे। जी हां, यह जानकर शायद आपको हैरत हो कि 2020 में जापान में होने वाले ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों में खिलाड़ियों को जो भी मैडल मिलने वाले हैं, वे सभी ई-कचरे को रिसाइकिल करके बनाए जाएंगे।
लैपटाप, मोबाइल फोन जैसी तमाम उपकरण जिन्हें आज के जमाने में हम इस्तेमाल कर रहे हैं, उनमें तमाम कीमती धातुओं का इस्तेमाल किया गया है। इसमें सोना भी है, चांदी भी है और अन्य धातुएं भी। लेकिन, खराब होने के बाद आमतौर पर इन्हें कचरा मान लिया जाता है। भारत जैसे देश में जहां पर रीसाइकिल की बिलकुल भी सही व्यवस्था नहीं है, वहां यह ई-कचरा बेकदरी से गला दिया जाता है, जिससे बेहद हानिकारक गैसों का भी उत्सर्जन होता है जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होती हैं। इस तरह से दोहरा नुकसान होता है।

यूएन के एक आकलन के मुताबिक हर साल दुनिया भर में 40 मिलियन टन यानी चार करोड़ टन ई-वेस्ट निकलता है। लेकिन, इसमें से सिर्फ 15-20 फीसदी को ही रीसाइकिल किया जाता है। ई-कचरे में प्रयुक्त मूल्यवान धातुओं की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए जापान ओलंपिक और पैरालंपिक में खिलाड़ियों को ई-कचरे से बने मैडल दिए जाएंगे। इसके लिए 30.3 किलोग्राम सोना, 4100 किलोग्राम चांदी और 2700 किलोग्राम ताम्र (ब्रोंज) की जरूरत पड़ेगी।

इस जरूरत को देखते हुए जापान ने वर्ष 2017 में इस्तेमाल हुई डिवाइस को जमा कराने की योजना शुरू की थी। अब तक जितनी डिवाइसेस जमा कराई गई हैं, उनसे 90 फीसदी गोल्ड मैडल और 85 फीसदी सिल्वर मैडल का काम हो चुका है। एक टन ई-कचरे में लगभग 300 ग्राम मूल्यवान धातु निकलती है। योजना पर अभी तक हुई तरक्की से ऐसा लगता है कि जापान अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा और सभी मैडल कचरे को रीसाइकिल हुए वाले ही मिलेंगे। इससे पूर्व 2016 में रियो ओलंपिक के समय भी इसका प्रयास किया गया था। लेकिन उस समय केवल 30 फीसदी ही सिल्वर और ब्रोंज पदक ई-कचरे वाले प्रदान किए गए थे।

यूएन-वर्ल्ड इकोनामिक फोरम की ई-वेस्ट पर जारी रिपोर्ट कई चौंकाने वाले और रोचक खुलासे करती है। ई-वेस्ट यानी ई कचरा। यानी बेकार हुए कंप्यूटर, लैपटाप, पेन ड्राइव, मोबाइल फोन व अन्य उपकरणों के सर्किट। इसमें सोने, चांदी, कोबाल्ट, प्लेटिनम, दुर्लभ धातु निओडाइनियम, उच्च गुणवत्ता वाले एल्यूमिनियम और टनि का इस्तेमाल किया गया होता है। एक अनुमान के मुताबिक एक टन स्वर्ण अयस्क से ज्यादा सोना एक टन ई-कचरे में मौजूद है। 

इसके बावजूद इस ई-वेस्ट का महत्व अभी पूरी दुनिया में ही नहीं समझा जा सका है। एक तरफ तो सोने-चांदी जैसी धातु के खनन में दुनिया अपनी ऊर्जा खर्च कर रही है। दूसरी तरफ उसे कचरे में डाला जा रहा है। जबकि, यह माना जाता है कि ई-वेस्ट से दोबारा कीमती धातु प्राप्त करना उसका खनन करने की तुलना में बेहद कम खर्चीला है। लेकिन, आमतौर पर पूरी दुनिया में ही यह काम निचले स्तर पर हो रहा है। भारत जैसे देश में बेहद आदिम तरीके से बेकार मोबाइल को गलाकर धातु निकालने की कोशिश होती है, जिससे कि धातुएं नष्ट भी होती हैं और स्वास्थ्य और पर्यावरण को भी नुकसान होता है।

चीन ने इसके महत्व को कुछ हद तक समझा है। वहां पर एक रीसाइकलर ने ई-वेस्ट को रीसाइकिल करके इतने कोबाल्ट का उत्पादन कर लिया जितना कोबाल्ट खनन करके नहीं उत्पादित किया जा सका है। 

अब सुझाया यह जा रहा है कि सभी इलेक्ट्रानिक उपकरण कंपनियों को इस तरह के ऑफर निकालने चाहिए, जिससे उपभोक्ता खराब पड़े उपकरणों को वापस करे। इसके लिए उन्हें अच्छी कीमत की पेशकश की जानी चाहिए।
तो, अपना ई-वेस्ट संभालकर रख लीजिए। इसमें बहुत सारी कीमती चीजें हैं। जल्द ही वक्त आने वाला है, जब इसकी अच्छी कीमत मिलेगी।

 

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