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अपनी बुद्धि, श्रम से अर्जित संपत्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए दीप जलाए जाते हैं। यह दीप केवल बाहर प्रकाश के लिए ही नहीं बल्कि अपने अर्ंतमन को प्रकाशित करने के लिए अर्पित किए जाते हैं। इनको बिजली के बल्बों की लड़ियों से नहीं बदला जा सकता है, अतएव दीपावली घरों में तेल के दिए जला कर प्रकृति और परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।
 
 
हमरे सनातन वैदिक ऋषियों ने मानवता का आह्वान करते हुए कहा, ‘‘आरोह तमसो ज्योति’’- अंधकार से प्रकाश की ओर चलो- अंधकार से प्रकाश की ओर गमन, यही भारत का मन है- क्योंकि भारत का अर्थ ही है ‘भा’ अर्थात प्रकाश, रत माने उसको प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील। जो सनातन संस्कृति सतत अंधकार, अज्ञान, आसुरी चिंतन, अत्याचार का प्रतिकार करते हुए प्रकाश, प्रज्ञा, सदाचार की प्रभा की ओर ले चलने का उत्साह और ऊर्जा पैदा करती है, उस उत्साह और ऊर्जा के प्रकटीकरण का पर्व- भारतीय परंपरा में दीपावली है। इस पर्व की फलश्रुति है- प्रेम और स्नेह का उजास, परस्पर आत्मीयता का एहसास तथा समाज में समृद्धि एवं संपन्नता की प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयत्न और श्रम से उत्पन्न संपत्ति का सम्यक उपभोग करते हुए सद्भावपूर्ण सहवास। ऐसे दीप पर्व को कविवर श्री गोपाल दास ‘नीरज’ ने इन शब्दों में व्याख्यायित किया है-
 
जलाओ दीप पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी
निशा की गली में तिमिर राह भूले
कार्तिक अमावस्या की घोर निशा में भारत के हर घर आंगन-प्रांगण में टिमटिमाते दीप की मालाएं यही तो संदेश देती हैं कि सर्वत्र समृद्धि का साम्राज्य हो, हम सब मन, बुद्धि और चित्त के स्तर पर इतने परिपक्व हों कि कहीं भी किसी प्रकार का अन्याय, अत्याचार और आतंक का अंधकार न पसरे -सर्वत्र ज्ञान- विज्ञान – अभिज्ञान के प्रकाश से हम आलोकित होते रहें। वैदिक ऋषि यही तो प्रार्थना करता है- प्रकृति के तत्वों से जो उसे सुखमय जीवन जीने के सारे पदार्थ देते हैं, जिसे मानव अपने पुरूषार्थ से प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
 
वर्चसो द्यावा पृथ्वी संग्रहणी बभूवथु।
वर्चो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम॥
यशसं गावो गोपतिमुप तिष्ठन्त्यायती।
र्यशो गृहीत्वा पृथिवीमनु: सं चरेम॥
हे पृथ्वी एवं द्यो (आकाश), हम आपके वर्च का अर्थात उत्कृष्टता अर्थात श्रेष्ठ गुणों को ही धारण करें, न कि अंधेरों को या अवगुणों को, ज्ञान सूर्य की किरणें मुझे पुष्टि दें, कीर्ति दें। हम ज्ञान की किरणों तथा उससे प्राप्त यश से सर्वत्र विचरण करें।
ज्ञान सूर्य से प्रमोदित होकर मानव मन वही ग्रहण करेगा, वही स्वीकार करेगा जो सत्य है और सुंदर है, किन्तु उसके लिए जिन जीवन मूल्यों का अनुसरण करना पड़ेगा, उसकी व्याख्या महाभारत महर्षि वेद व्यास ने की है।
सत्याधार: तपस्तैल: दयावर्ति:क्षमा शिखा।
अंधकार प्रविष्टव्यै दीपो यत्नेन वार्याताम॥
जीवन वही सार्थक है, उसी का जीवन दीपावली है, जिसका आधार पीठ सत्य है, जिसमें तपस्या का तेल है, दयाभाव जिसकी बाती है, क्षमा जिस वर्तिका की ज्योति है, ऐसा यत्नपूर्वक जीवन जीने वाला व्यक्ति ही अंधकार को समाप्त करने का सामर्थ्य रखता है। और जब अंधकार मिटता है, वास्तविक दीपावली तो तभी मनती है।
महात्मा तुलसीदास ने राम नाम के दीये से अपने अंतर और बाहर को अलोकित करने की बात कही है-
 
राम नाम मणि दीप घर जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहु जो चाहे उजियार॥
 
मानस में तुलसी ने कहा कि यदि बाहर और भीतर अर्थात अपने अर्ंतगत तथा बाह्य जगत को प्रकाशित रखना चाहते हो तो अपने चित्त की देहरी पर राम नाम की मणि का दीपक रख लो- सर्वत्र आनंद और उल्लास का प्रकाश तुम्हारे जीवन को आलोकित करेगा। वास्तव में दीपावली स्वयं को अज्ञान के अंधकार से मुक्त करके ज्ञान के प्रकाश से प्रदीप्त करने का पर्व है, तभी तो भगवान बुद्ध ने अपने अंतिम संदेश में कहा, ‘‘अप्प दीपो भव’’ अर्थात स्वयं दीपक बनो, स्वयं दुःख सह कर प्राणों में पीड़ा को सहते हुए, अपने अंग-प्रत्यंग को त्याग की अग्नि में लपेटे समाज को अपने सुकर्म सेे प्रकाशित करो। यह प्रकाश ही समाज, परिवार, व्यक्ति को संपन्न और समृद्ध बनाता है और जीवन सुखमय और शांतिमय बनता है।
 
दीपावली के दिन अर्थात कार्तिक अमावस्या की घोर- अघोर निशा में भारत का मन दीप शिखा का स्वरूप ग्रहण करता है। सुप्रसिद्ध विचारक श्री हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं कि दीपावली की रात भारत का मन पुलकमय और वातायन मधुमय हो जाता है। ऐसे पुलकित सुरभित वातावरण में भगवती लक्ष्मी का आगमन होता है।
दीपावली पर्वों का पंचामृत है, कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी से इस पर्व का शुभारंभ होता है- धन त्रयोदशी अर्थात धन्वन्तरि त्रयोदशी (धनतेरस) से। इस संबंध में कथा है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो इसी दिन भगवान धन्वन्तरि समस्त मानवता के कल्याण के लिए अमृत लेकर प्रकट हुए थे। धन्वन्तरि अमृतत्व के देवता हैं, वे आरोग्य प्रदान करते हैं। शरीर स्वस्थ रहे, हृष्ट-पुष्ट और रोग मुक्त रहे, क्योंकि शरीर से ही सभी धर्म का साधन है- शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्। अतएव, आरोग्यता की कामना से दीपावली के पर्व का प्रारंभ होता है। इसके अतिरिक्त इसे धन प्राप्त करने की भावना से भी जोड़ा गया। इसी दिन धन, आभूषण, पात्र, बर्तन की खरीद के शुभ मुहुर्त के रूप में भी देखा जाने लगा। सामान्यतया प्रत्येक परिवार में नए बर्तन अथवा पात्र को खरीद कर उसका पूजन किया जाता है जिसका संदेश है कि इस पात्र में जो भी अन्न पकाया जाए वह शरीर को अमृत की तरह पुष्ट करे। दीपावली का दूसरा उत्सव नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली के रूप में मनाया जाता है। इसकी भी बड़ी प्रसिद्ध कथा है कि नरकासुर बड़ा ही प्रतापी राजा था। किन्तु वह उतना ही क्रूर, विलासी और अत्याचारी भी था। उसने अपनी वासना की पूर्ति के लिए विभिन्न राज्यों की १६००० कन्यायों का अपहरण करके उन्हें अपनी कैद में रखा था। श्री कृष्ण ने इसी दिन नरकासुर का वध करके १६००० कन्याओं को स्वतंत्र किया था और महिलाओं के सम्मान की रक्षा की थी। समाज ने इस खुशी में अपने घर में दिए जलाए थे।
नरक चतुर्दशी के दिन दक्षिण भारत में अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है। प्रात:काल ब्रह्ममुहुर्त में लोग उठ कर पहले अभ्यंग (तेल) से स्नान कर, पवित्र होकर भगवान का पूजन करते हैं। इसी के साथ-साथ उत्तर भारत में विशेष रूप से इसे श्री हनुमानजी के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है। अगस्त्य संहिता में श्री हनुमान जी के जन्म का स्पष्ट वर्णन है-
 
ऊर्जे कृष्णचतुर्दश्यां भौमे स्वत्यां कपीश्वर:।
मेष लग्नेऽजंनागर्भात प्रादुर्भूत: स्वयं शिव:॥
 
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, मंगलवार, स्वाति नक्षत्र, मेष लग्न में माता अंजनी के गर्भ से स्वयं भगवान शंकर श्री हनुमान के रूप में अवतीर्ण हुए। अत: छोटी दिवाली से एक साथ कई प्रसंग जुड़े हुए हैं। तथापि, हिन्दू घरों में इस दिन खूब साफ सफाई की जाती है, घर से नरक (गंदगी) निकाली जाती है। घर को स्वच्छ, निर्मल करके उसे लक्ष्मी के स्वागत योग्य बनाया जाता है।
कार्तिक अमावस्या दीपावली का मुख्य त्योहार है। इसी दिन श्री राम लंका में रावण का वध करके अयोध्या में पधारे थे और अवधवासियों ने उनके आगमन की प्रसन्नता को व्यक्त करने के लिए अपने-अपने घरों को सुंदर दीपों से सजाया था। दूसरा पक्ष यह है कि यह देश कृषि संस्कृति का उपासक है और कार्तिक मास में धान की नई फसल का आगमन होता है, उसके आनंद की अभिव्यक्ति दीयों को जला कर की जाती है। यह समृद्धि के स्वागत का पर्व है। एक और भी है, गणेश-लक्ष्मी का पूजन। गणेश हमारे विवेक देवता हैं, भगवती लक्ष्मी समृद्धि प्रदायनी देवी हैं। विवेक सम्मत लक्ष्मी का अर्जन हमारी संस्कृति का अभीष्टन है। भारत की मनीषा कहती है कि विवेक बुद्धि का उपयोग करके कर्म करते हुए लक्ष्मी को प्राप्त करना मनुष्य का धर्म है। अपनी बुद्धि, श्रम से अर्जित संपत्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए दीप जलाए जाते हैं। यह दीप केवल बाहर प्रकाश के लिए ही नहीं बल्कि अपने अर्ंतमन को प्रकाशित करने के लिए अर्पित किए जाते हैं। इनको बिजली के बल्बों की लड़ियों से नहीं बदला जा सकता है, अतएव दीपावली घरों में तेल के दिए जला कर प्रकृति और परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा गुजरात का नव वर्ष अन्नकूट का पूजन, जो धान आती है, उसे पका कर उसका कूट बना कर उसकी पूजा की जाती है। अन्न का पूजन, भारतीय संस्कार की विशेषता है। गोेवर्धन पूजन उसी संस्कार का प्रतीक है। ब्रज मण्डल में इसका विशेष महत्व है। पूरे ब्रज मण्डल में विशेषतया पूरे देश भर में भगवान को छप्पन भोग लगाया जाता है। यह भोग गोवर्धन के रूप में प्रकट हुए भगवान को लगा कर अन्न के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। इस पंचोत्सव का पांचवां और अंतिम पड़ाव भैया दूज होता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया भाई बहन के सम्बंधों की मधुरतम और भव्यतम अभिव्यक्ति है। इस दिन ब्रज मंडल में भाई बहन द्वारा साथ-साथ यमुना स्नान करने की परंपरा है। इसके बाद बहन भाई के भाल पर रोली, चंदन, अक्षत एवं हल्दी से तिलक करके उसके आरोग्यमय और सुखमय जीवन की मनोकामना करती है। बदले में भाई अपनी बहन को कुछ उपहार प्रदान कर उसके प्रति अपना आदर-स्नेह व्यक्त करता है।
 
स्वास्थ्य, सामाजिक सद्भाव, संपन्नता, स्नेह संबंध की अभिवृद्धि करने की कामना से, उल्लास और उमंग के साथ मनाया जाने वाला दीपावली का महापर्व भारतीय मन और जन के संस्कारशील चित्त और समृद्ध चेतना का रेखाकंन है। स्वाति नक्षत्र पक्षी के लिए अमृत बरसाता है, चंद्रमा चकोर को शीतलता प्रदान करता है और कार्तिक मास में ही दीपावली के पांच उत्सव हिन्दू समाज को अमृत तत्व प्रदान कर उसे समृद्धि और संपन्नता का अवदान देते हैं- तमसो मा ज्योतिर्गमय।

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