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भीड़भाड़ से आम तौर पर लगभग हर किसी को परेशानी होती है, लेकिन अगर भीड़ देखते ही किसी व्यक्ति के पसीने छूटने लगे और उसके हाथ-पैर सुन्न हो जायें, तो इसे एगोराफोबिया या जनातंक कहते हैं. एगोराफोबिया दरअसल भीड़ का डर है. इससे पीड़ित लोगों को ऐसा लगता है कि अगर वे किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर जायेंगे, तो उन पर कोई हमला कर सकता है. इसी वजह से ऐसे लोग अक्सर सामाजिक अवसरों या सार्वजनिक स्‍थानों आदि पर जाने से बचते हैं. यह एक तरह का सोशल फोबिया है, जो तनाव और चिंता से जुड़ा है.

क्या है कारण ?

एगोराफोबिया का सटीक कारण अभी तक पता नही चला है. कुछ चिकित्सकीय अध्ययनों के आधार पर आत्‍मविश्वास की कमी, भीड़ से जुड़ा बचपन का कोई बुरा अनुभव और नकारात्‍मक विचार आदि को इस मनोरोग के लिए जिम्‍मेदार माना गया है. इसके अलावा, मस्तिष्‍क के न्‍यूरोट्रांसमीटर में बदलाव आने अथवा अनुवांशिकता की वजह से भी व्‍यक्ति को एगोराफोबिया की समस्‍या हो सकती है. कुछ लोगों में लंबे समय तक नींद की गोलियों का उपयोग करने की वजह से भी एगोराफोबिया के लक्षण पाये गये.

एगोराफोबिया प्राय: भय अथवा चिंता व्याधि के आगे भी मानसिक स्थिति के रूप में देखने को मिलता है. अमेरिकी मनोचिकित्सा संगठन, 1998 के अनुसार, एगोराफोबिया को हर बार डरावनी परिस्थितियों के प्रतिकूल व्यवहारिक परिणाम के रूप में बेहतर समझा जा सकता है. इन परिस्थितियों का सामना करने के बाद उत्पन्न चिंता और पूर्वव्यस्तता के कारण ग्रसित व्यक्ति वैसी परिस्थितियों से बचने की कोशिश करता हैं.

कैसे करें पहचान ?

एगोराफोबिया की समस्‍या से पीड़ित लोग अपने आसपास के वातावरण से जुड़ी किसी भी सामाजिक स्थिति का सामना करने में घबराते है. वे भीड़-भाड़ वाली जगहों जैसे शॉपिंग मॉल, पार्टी, सिनेमा हॉल, रेलवे स्‍टेशन आदि में जाने से बेहद घबराते हैं. ऐसी परिस्थितियों का सामना होने पर उनमें गला सूखना, दिल की धड़कन और सांसों की गति का बढ़ना, ज्‍यादा पसीना निकलना, हाथ-पैर ठंडे पड़ना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं. इन्हीं सारे कारणों से वे ज्यादातर समय वे खुद को घर में कैद रखते हैं या फिर अपने करीबी लोगों या आसपास के वातावरण को ही अपना सुरक्षा कवच बना लेते है और किसी भी हाल में उससे बाहर निकलने को तैयार नहीं होते.

कौन लोग होते हैं अधिक प्रभावित

आमतौर से 20-24 आयु वर्ग के लोगों में इसके लक्षण देखने को मिलते हैं. इसके अलावा, महिलाएं एगोराफोबिया से अधिक प्रभावित होती हैं. हालांकि विभिन्न अनुसंधानों और शोध परिणामों में इस संबंध में एकरूपता का अभाव देखने को मिलता है.

संभव है उपचार

एगोराफोबिया के लक्षणों को पहचान कर अगर सही समय पर इसका उपचार कराया जाये, तो यह समस्‍या आसानी से हल हो सकती है. इसके इलाज में दवाओं के साथ-साथ बिहेवियर थेरेपी और काउंसलिंग के जरिये मरीज का बेहतर उपचार किया जा सकता है. आमतौर पर छह माह से एक साल के भीतर व्‍यक्ति की मानसिक अवस्‍था सामान्‍य हो जाती है. इस दौरान मरीज के परिजनों को निरंतर उसका मनोबल बढ़ाते रहना चाहिए.

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