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आग वह पहली चीज थी जिसने हम इनसानों को जीवजगत के अन्य प्राणियों से अलग कर दिया। आग के फायदे तो कुछ अन्य प्राणियों को भी पता थे। लेकिन, यह हम थे जिन्होंने पहली बार आग को काबू में करना सीखा।

आग जलाना और उसे बुझाना। अपनी इच्छा अनुसार उसे तेज करना। धीमा करना। अपनी मर्जी से छोटी आग और बड़ी आग पैदा करना। आग ने ही इंसान को इंसान बनाया है। अगर हमने आग को अपने नियंत्रण में नहीं लिया होता तो हम शायद हम नहीं होते। इंसान ने आग जलाना सीखा उससे पहले से भी प्रकृति में आग जलती रही है। कभी पत्थरों की टकराहट से आग लग जाती और जंगल जल जाते थे। कभी आकाशीय बिजली के चलते आग लग जाती थी। इनसान इस आग को अपने पास सहेज कर रख लेता था। उसे बुझने नहीं देता था। कभी किसी की आग बुझ जाती तो वह दूसरे किसी कबीले से मांगने चला जाता। कबीला दुश्मनों का हो तो आग चुराने की कवायद होती या फिर उसे लड़कर दुश्मनों से छीन लेने की। आग मांगने, चुराने और लड़कर छीनने के भी तमाम आख्यान पुरानी कहानियों में भरी पड़ी हैं। वे सब मानवता की साझा स्मृतियां हैं।

लेकिन, इस सबक के बावजूद अक्सर ही आग बुझ जाती थी। इनसान की दुनिया फिर से जानवरों जैसी ही हो जाती थी। आग बुझ जाने के बाद इनसान को कई सालों तक दोबारा आग लगने का इंतजार करना पड़ता था। फिर किसी प्राकृतिक घटना से आग लगती और इंसान उसे सहेज कर रख लेता। फिर वह दिन भी आया जब इनसान ने खुद आग जलाना सीख लिया।
आज भी हमारे जीवन कार्य-विधि का ज्यादातर हिस्सा इसी पर निर्भर है। कुछ जलता है तभी हमें कुछ मिलता है। आग जलाकर हम बिजली बनाते हैं। ईंधन जलाकर हम गाड़ी चलाते हैं। हवाई जहाज उड़ते हैं। आग जलाकर ही हम अपना खाना पकाते हैं। आग पर हमारा जीवन निर्भर करता है।

लेकिन, इसका एक खामियाजा भी है जिसे भुगतने के लिए अब पूरी इंसानियत को तैयार हो जाना चाहिए। जब हम कुछ जलाते हैं तो उससे कार्बन उत्सर्जित होता है। आग से गर्मी निकलती है। पृथ्वी पर पहले कभी इतनी ज्यादा आग लगाई नहीं जाती थी और न ही इतना ज्यादा उत्सर्जन कभी होता था। पिछले दो सौ सालों में ही यह कई हजार गुना ज्यादा बढ़ गया है। इसके चलते कार्बन उत्सर्जन भी बहुत ज्यादा हो गया। इतना कि हमारी पूरी पृथ्वी ही गरम होती जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग कोई एक शब्द नहीं है। यह एक ऐसी हकीकत है, जिसे झुठलाने की कोशिशें तमाम की जाती रही हैं।

अब हालत यहां पर पहुंच चुकी है कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने यानी आग जलाने को कम से कम करने पर जोर दिया जा रहा है। ऊर्जा के अन्य विकल्पों की तलाश की जा रही है। समय आ गया है कि इस बर्निंग टेक्नोलॉजी से छुटकारा पा लिया जाए। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। विज्ञान ने रास्ता सुझा दिया है, लेकिन कारपोरेट कंपनियों का मुनाफा इस दिशा में तेजी से बढ़ने से रोक रहा है। क्योंकि, पहले से ही बर्निंग टेक्नोलाजी के जरिए मुनाफा कमा रही कंपनियां अभी पूरी तरह से निश्चित नहीं हैं कि उनका मुनाफा आगे भी बना रहेगा और ज्यादा बढ़ता रहेगा।

लेकिन, अगर हमेशा कुछ न कुछ जलाने वाली इस तकनीक से अगर छुटकारा नहीं पाया गया या उसका उपयोग सीमित नहीं किया गया तो तो हमारा नाश होने जा रहा है। सोचिए, जरा कि जिस आग ने हम इनसानों को इनसान बनाया, उसी की अधिकता से हमारा विनाश होने जा रहा है।

मजे की बात यह है कि इनसान इसे सदियों से जानता भी रहा है। कहा भी करता रहा है कि आग से मत खेलो।
पर आज इनसानियत आग से ही खेल रही है।

 

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