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वैसे साहित्यिक चोरी करने वाले इस तरह के कृत्य को कोई चोरी नहीं मानते, कोई अपराध नहीं मानते, कोई गलत काम नहीं मानते। इसकी बजाय वे गर्व से कहते हैं कि वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति यानी साहित्य की चोरी चोरी नहीं कही जाती और वे बड़े गर्व के साथ दूसरी पुस्तकों व पत्रिकाओं से अध्याय के अध्याय मारते रहते हैं।
 
वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति, यानी साहित्य की चोरी चोरी नहीं कही जाती। प्रस्तुत बंदा तो संस्कृति की इस उक्ति की ज्वलंत मिसाल है, ध्वजवाहक है, अनुभवी तो इतना है कि इस क्षेत्र या इलाके यानी वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति का एक दो नहीं पूरे २६-२७ साल का विशेषज्ञ है। मेरी साहित्यिक हाथ की सफाई की सब से बड़ी खूबी तो यह है कि आज तक कभी पकड़ा नहीं गया। कोई माई का लाल मुझे पकड़ नहीं पाया। किसी पिता के पूत में इतनी हिम्मत नहीं कि वह कहे कि महोदय आपने लेख का वह अंश या पूरा लेख फलां अखबार, पत्रिका, पोर्टल, ब्लॉग, पुस्तक से मारा है उर्फ आयात किया है। किसी को पता ही नहीं चलता।
वैसे तो देह व्यापार को दुनिया का सब से पुराना पेशा माना जाता है पर समय बदलने के साथ परिवार तथा समाज की शर्तें भी बदलती हैं इसलिए नए युग में साहित्य में मिलावट और प्लेजियरिज़्म, साहित्यिक चोरी, विचारों की नकल या आइडिया की चोरी को भी स्वीकार्य पेशा माना जाने लगा है। वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।
चेतन भगत की जय हो। हमारी अपनी ही बिरादरी के हैं चेतन साहब। पर हम से इस मामले में कमजोर। तभी तो धर लिए गए। वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति के ज्वलंत उदाहरण। एक राइटर ने चेतन भगत पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा दिया। राइटर व रिसर्चर अन्विता वाजपेयी ने कोर्ट के जरिए चेतन भगत की बुक ‘वन इंडियन गर्ल’ की सेल पर अस्थाई रोक लगवाई दी। वाजपेयी का आरोप है कि अक्टूबर २०१६ में रिलीज भगत के उपन्यास और उनकी शॉर्ट स्टोरी में काफी समानताएं हैं। २०१४ में उनकी किताब ‘लाइफ, ऑड्स एण्ड एंड्स’ प्रकाशित हुई थी। यह किताब राधिका नाम की एक लड़की और उसकी जिंदगी, परिवार, बॉयफ्रेंड्स आदि पर आधारित थी। वाजपेयी ने कहा कि ‘‘उन्होंने (चेतन भगत) कुछ चीजें जोड़ीं, कुछ बदलाव किए और एक इंटेलिजेंट कॉपी तैयार की। हालांकि, दोनों की आत्मा एक ही है।’’
मेरा लेखिका से कहना है कि मित्र क्षुद्रता से ऊपर उठो। अपने देश की सोचो। हर्जाना वगैरह भूल जाओ। अपने समाज की सोचो। साहित्य सृजन मांग रहा है। जल्दी से जल्दी सृजन करो। कुछ नया लिखो कि मजा आ जाए। लफड़ा नको। पाठक को नए साहित्य की प्रतीक्षा है। साहित्यकार का कर्तव्य है कि वह साहित्य रचे। रचता जाए। मौलिकता के चक्कर में न पड़े। प्रेरणा का दामन थामे।
चेतन भगत ने प्रेरणा ली होगी। प्रेरणा का तो ऐसा है जहां से प्राप्त हो, वहीं से ग्रहण करने में चूक नहीं करनी चाहिए। किसी लेखक को अगर किसी कृति, ग्रंथ, प्राचीन पुस्तक, पांडुलिपि, पत्रिका, जर्नल, अखबार, पोर्टल आदि में कोई काम की चीज मिले तो तत्काल उसे उठा लें। देर न करें। जल्दी उठाए। काल करै सो आज कर। कल तो देर हो जाएगी। कोई दूसरा उस प्रेरणा को ग्रहण कर लेगा तो आप क्या करोगे? वह चीज वहां व्यर्थ पड़ी थी। पर यहां आकर उसका रूप निखर गया। एक नया जन्म मिल गया। वह वहां बोर हो रही थी। कोई पूछने वाला नहीं था पर इधर पहुंच कर नई नवेली हो गई। इसके लिए मानना चाहिए आभार। उद्धारकर्ता को शुक्रिया कहना चाहिए। उसकी चरण वंदना करनी चाहिए। उसकी तारीफ करनी चाहिए। पर क्षुद्र बुद्धि के लोग उस पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा देते हैं।
कुछ महीने पहले भी ऐसा ही हुआ। तब पता चला कि अमेरिका के राष्ट्रपति की शीर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा संचार सलाहकार मोनिका क्रोले ने वर्ष २०१२ में प्रकाशित अपनी किताब का बड़ा हिस्सा किसी दूसरी जगह से नकल किया था। इस किताब में राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन की आलोचना की गई थी।
क्रोले की किताब ‘व्हॉट दी (ब्लीप) जस्ट हैपेन्ड’ की समीक्षा में अनेक स्रोतों मसलन समाचार लेखों, अन्य स्तंभों, थिंक टैंक और विकीपीडिया से साहित्यिक चोरी के मात्र ५० उदाहरण मिले हैं। वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति को क्रोले ने अपने जीवन में पूरी तरह से उतार लिया है। क्रोले साहित्यिक चोरी के सम्मानजनक क्षेत्र की पुरानी खिलाड़ी हैं। दिग्गज और धुरंधर भी। एकदम अग्रणी खिलाड़ी। उन पर इस तरह के आरोप पहले भी लगे हैं्। पर क्रोले ने पहले की तरह इस बार भी आरोपों से साफ इनकार किया है। अब हर कोई तो खुल कर वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति का समर्थन कर नहीं सकता। इसके लिए काफी मात्रा में हिम्मत की दरकार होती है। और उस हिम्मत में बेशर्मी की भी तो मात्रा होनी चाहिए।
ब्रॉडसाइड बुक्स द्वारा प्रकाशित और न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा बेस्टसेलर मानी गई क्रोले की किताब में सामग्री के स्रोत का जिक्र कहीं नहीं है। शायद यह क्रोले के साहस की इंतिहा है, इसके लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं। पर साहित्य की प्रगति के दुश्मन कहते हैं कि क्रोले ने चोरी के साथ सीनाजोरी भी की है। उन्होंने एसोसिएटेड प्रेस, द न्यूयॉर्क टाइम्स, पोलिटिको, द वॉल स्ट्रीट जर्नल, द न्यूयॉर्क पोस्ट, द बीबीसी और याहू न्यूज से मुहावरों को जस का तस उठाया है। अब ये दिलजले ये भी तो कह सकते थे कि क्रोले ने एसोसिएटेड प्रेस, द न्यूयॉर्क टाइम्स, पोलिटिको, द वॉल स्ट्रीट जर्नल, द न्यूयॉर्क पोस्ट, द बीबीसी और याहू न्यूज में प्रकाशित मुहावरों का प्रचार प्रसार किया है। उन्हें और ज्यादा लोगों तक पहुंचने का काम किया है। उनकी पाठक संख्या में वृद्धि की है। पर साहित्य के ये दुश्मन तो सकारात्मक बात कहना ही नहीं जानते। डरते हैं कि कहीं उनकी दुकान न बंद हो जाए।
जिसे मूढ़ बिरादरी साहित्यिक चोरी कहती है वह तो वास्तव में न कोई चोरी है और नहीं कोई अपराध है। यह एक कला है, एक आर्ट है, एक विज्ञान है। जो लोग इस विज्ञान को बढ़ावा दे रहे हैं वे अभिनंदनीय हैं। कुछ मामलों में लेखक पर लगाए गए साहित्यिक चोरी के आरोप भी वापस ले लिए जाते हैं। इसे कहते हैं सद्बुद्धि। कुछ साल पहले चैनल सीएनएन और टाइम पत्रिका ने हिंदुस्थानी मूल के जाने माने अमेरिकी पत्रकार और लेखक फरीद जकारिया को साहित्यिक चोरी के मामले में अपने-अपने संस्थान से निलंबित कर दिया था। उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने टाइम पत्रिका में लिखे अपने एक लेख में न्यू यार्कर में छपे लेख का एक पैरा हूबहू ले लिया था। तत्कालीन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जकारिया के इस कारनामे के खुलासे के बाद जकारिया ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी। इस माफी के बाद भी उन्हें सीएनएन और टाइम से निलंबित कर दिया गया। बाद में दोनों ने उनका निलंबन वापस ले लिया था।
हिन्दुस्थान में वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति का भरपूर पालन होता है। यहां तो हर रोज इस तरह से हजारों पन्नों की चोरी होती है। टनों माल इधर का उधर होता है। लेखक का नाम धड़ल्ले से बदलता रहता है। पर कुछ नहीं होता, कोई चर्चा तक नहीं करता। क्योंकि इसे अब प्रेरणा का दर्जा मिल गया है। यह प्रेरित होना कहा जाने लगा है। साहित्य के साथ यह शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी व्याप्त हो गया है। लोग पूरे के पूरे अध्याय, पूरी की पूरी थीसिस तक उड़ा लेते हैं, फिर भी उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। और आए क्यों? वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति। देश की राजधानी दिल्ली के साथ उत्तर प्रदेश के मेरठ में आपको ऐसी कई गलियां मिल जाएंगी, जहां आपको बनी-बनाई थीसिस मिल जाती हैं। ऐसे गुरुजन भी उपलब्ध हैं, जो २० हजार से ५० हजार रुपये में थीसिस लिख देते हैं।
एक बार तो प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार सीएनआर राव पर भी आरोप लगा था कि उनके सह-लेखन में प्रकाशित शोध पत्र में चोरी की सामग्री है। २००७ में सीएसआईआर के महानिदेशक माशेलकर ने स्वीकार किया कि उनके नाम से छपे शोध पत्र में उनके सहयोगी शोधार्थियों ने चोरी के आंकड़े दिए थे। चंडीगढ़ के विश्वजीत गुप्ता, कुमाऊं के बीएस राजपूत, पुणे के गोपाल कुंडू, वेंकटेश्वर केपी चिरंजीवी जैसे वैज्ञानिकों-विचारकों को हम में से ज्यादा लोग अभी नहीं भूले होंगे, जिन्होंने न सिर्फ शोध में चोरी के तथ्य पेश किए, बल्कि पोल न खुलने तक उसका श्रेय लेते हुए उसकी वाहवाही भी लूटी। जय हो।
साहित्यिक चोरी बड़े स्तर पर भी हो सकती है और व्यक्तिगत भी। वैसे साहित्यिक चोरी करने वाले यानी हमारी आपकी जबान में मारोलॉजिस्ट इस तरह के कृत्य को कोई चोरी नहीं मानते, कोई अपराध नहीं मानते, कोई गलत काम नहीं मानते। इसकी बजाय वे गर्व से कहते हैं कि वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति यानी साहित्य की चोरी चोरी नहीं कही जाती और वे बड़े गर्व के साथ दूसरी पुस्तकों व पत्रिकाओं से अध्याय के अध्याय मारते रहे। इस तरह के एक और मामले में कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली पर भी आरोप लग चुका है कि उन्होंने एक समाचार पत्र से पूरा लेख ही चोरी कर लिया है।
जय हो। धन्यवाद खाकसार का। आभार चेतन भगत का। मेरे, उनके सौजन्य से यह कला फिर से सुर्खियों में आ गई है।

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