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हस्तीमल ‘हस्ती’ के रचनात्मक योगदान के जिक्र के बगैर पिछले चार दशक के हिन्दी गज़ल के विकास को पूरी तरह रेखांकित नहीं किया जा सकता। हस्तीजी ऐसे शायर हैं, जो सच्चाई को गुनगुनाते हैं, समय को पहचानते हैं, वर्तमान, भूत और भविष्य के आर-पार खड़े हैं।
खुद चिराग बन के जल वक्त के अंधेरे में,
भीख के उजालों से रोशनी नहीं होती।
 
उपरोक्त पंक्तियां ही बयां कर देती हैं, गज़लकार के इरादे। इरादे इतने बुलंद हैं, तभी तो हरे राम समीप अपने आलेख ‘परम्परा और आधुनिकता के सेतु गज़लकार’ में लिखते हैं कि हस्तीमल हस्ती के रचनात्मक योगदान के जिक्र के बगैर पिछले चार दशक के हिन्दी गज़ल के विकास को पूरी तरह रेखांकित नहीं किया जा सकता।
 
हस्ती जी के अब तक प्रकाशित तीन गज़ल संग्रह ‘क्या कहें, किससे कहें’, ‘कुछ और तरह से भी’, ‘ना बादल न दरिया जानें’ महाराष्ट्र राज्य हिन्दी-साहित्य अकादमी व अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मान से नवाजे गए हैं।
 
कुछ तो बात है, जमीन से जुड़े, सादगी पूर्ण व्यक्तित्व वाले इस दोहाकार और गज़लकार में, कि लोग उन्हें लगातार सुनना चाहते हैं। मुंबई वि.वि. के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष रतन कुमार पाण्डे ‘अनभै’ का पूरा अंक उन पर केन्द्रित करते हुए संपादकीय में कहते हैं, हस्ती जी में प्रतिभा और अभ्यास का मणिकांचन संयोग है। एक और संयोग यह कि कुदरत ने ‘कंचन’ वाले परिवार में जन्म दिया। यानी सोने चांदी का काम करते हैं, पर ‘अशआरों की मणियां उन्होंने प्रतिभा के बल पर हासिल कीं।’ हस्ती जी पर केन्द्रित अंक की संपादकीय को रतन पाण्डे शीर्षक उन्हीं की पंक्ति का देते हैं, ‘बांस की हर टहनी, बांसुरी नहीं होती।’
इस अंक के सारे आलेख पठनीय और हस्ती जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के तमाम आयामों से रूबरू करा रहे हैं। दामोदर खड़से भी कहते हैं कि ‘‘सादगी भरे व्यक्तित्व की अंगुलियों में प्रखरता की कलम’’ याने हस्तीजी ऐसे शायर हैं, जो सच्चाई को गुनगुनाते हैं, समय को पहचानते हैं, वर्तमान, भूत और भविष्य के आर-पार खड़े हैं। बड़े-बड़े हादसे, विसंगतियां, बुराइयां और संघर्ष बचे नहीं, उनकी कलम की मार से-
‘कैसे चुपचाप देखा करें हादसे
रास्ता रोकती है कलम द्वार पर’
 
दुष्यंत कुमार के बाद हस्ती जी हिन्दी के बडे गज़लकार हैं। उनकी गज़लों की बानगी देखने लायक है-
हमसे तो कुछ यूं निभाई वक्त ने
घर दिखा कर घर का रास्ता ले गया।
 
‘कौन ना मर जाए, ऐसी सादगी पर ऐ खुदा।’ तभी तो ज्ञानप्रकाश विवेक लिखते हैं, बड़बोलेपन को ख़ारिज करते हुए हस्ती जी अपनी गज़लों में विनम्रता भरी गूंज पैदा करते हैं। ‘हस्ती बाखबर हैं कि गज़ल एक पेचीदा सिन्फ है, जहां उतावलेपन की कोई जगह नहीं है।’ उनके लिए दो मिसरों के संगम से एक शेर का बन जाना, बेहद आत्मीय घटना की तरह है। उनकी गज़लों की भाषा के बारे में ज्ञान कहते हैं, उनकी गज़लें एक तरह से हिन्दुस्तानी गज़लें हैं। कितने रंग हैं उनकी गज़ल में, जबान की सादगी, कल्पना, नुकीले यथार्थ का बेधन, अध्यात्म और सूफियाना सोच।
मकां तक आ गई है आग लेकिन
मकीनों को कोई चिंता नहीं।
उनकी दो-दो पंक्तियां भी बड़े-बड़े जीवन दर्शन दे देती हैं-
आने को दोनों आते हैं। इस जीवन के आंगन में,
दु:ख अरसे तक बैठे रहते, सुख जल्दी उठ जाते हैं।
 
और ये पंक्तियां उनके श्रोता उनसे बार-बार सुनना चाहते हैं-
हमारे ही कदम छोटे थे वरना
वहां पर्वत कोई ऊंचा नहीं था।
 
श्रोताओं से लगातार संवाद बनाए रखने में अगर हस्ती माहिर हैं, वो इसलिए कि उन्होंने अपनी हस्ती को बनाने के लिए संघर्ष किया, उनके संघर्षशील व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए शिव ओम अम्बर लिखते हैं, हस्ती जी ने विपरीत परिस्थितियों में भी अंधकार और अनय के सामने अपने संकल्प के आलोक वलय को बनाए रखा। तभी तो डंके की चोट पर कहते हैं हस्ती-
चराग़ हो कि न हो, दिल जला के रखते हैं,
हम आंधियों में भी तेवर बला के रखते हैं॥
 
ये तेवर रखने वाले हस्ती जी यारों के यार हैं। सांताक्रूज में उनके ज्वैलरी एम्पोरियम के पीछे, उनकी खोली कितनों के लिए ठिकाना बनती रही। रिश्ते हमेशा उनके लिए सर्वोपरि रहे, तभी तो अपने पुराने घर के लिए भी वे वहां बैठ कर उन दरोदीवारों के लिए घंटों रोए। कभी दोस्ती में अहसान नहीं किए उनके भाव उनके अशआरों में-
दोस्तों पे करम करना, और हिसाब भी रखना,
कारोबार होता है, दोस्ती नहीं होती।
 
हस्ती जी रिश्तों को कितनी खूबसूरती से पिरोते हैं अपनी गज़लों में-
आग पीकर भी रोशनी देता
मां के जैसा है, ये दिया कुछ कुछ
 
इसलिए शिव उनकी गज़लों को ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ का अमृत उद्घोष मानते हैं। इसी कारण से अशोक रावत हस्ती जी को गज़ल का सब से मजबूत स्तंभ मानते हुए यह भी कहते हैं, कि ‘किसी पत्रिका में ५० रचनाकारों की गज़लों में भी हस्ती जी की गज़ल ही बहुत देर तक दिल और दिमाग में हलचल मचाती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि हिन्दी भाषा में भी गज़ल कितनी खूबसूरत लगती है। उनकी गज़लें कहन और भाषा के मुहावरे के साथ कथ्य के स्तर पर भी आकर्षित करती हैं। अपने ३० साल के गज़ल सफर में वे गज़ल की बहर को लेकर लगातार जागरूक रहे। यह कदम-कदम पर सिद्द होता रहा। बानगी देखें-
रास्ते उस तरफ भी जाते हैं,
जिस तरफ मंज़िले नहीं होतीं।
सच कहूं तो हजार तकलीफें
झूठू बोलूं, तो आदमी भी क्या।
चाहे जिससे भी वास्ता रखना
चल सको, उतना फासला रखना।
 
इतनी सादगी से जिंदगी के इतने बड़े-बड़े फल्सफे देने वाले हस्ती जी के लिए लिखते हैं, विज्ञानव्रत ‘‘भाई हस्ती जी आत्मकेन्द्रित या आत्ममुग्ध व्यक्ति नहीं, बल्कि यारबाज, सादगीपसंद और मृदुभाषी हैं’’ जो आडंबर और दिखावे से परे हैं। शायर की यही सादगी उनकी शायरी में शब्दों का लिबास पहन कर हमसे रूबरू होती है-
सबसे अच्छी प्यार की बातें
बाकी सब बेकार की बातें॥
 
और ऐसा नहीं कि इस शायर ने सिर्फ दुनियादरी की या अध्यात्म की बातें ही की हैं। रोमानियत भी बड़े मासूम अंदाज में चिलमन से झांकती है। आगे वे कहते हैं ऐसा संभव ही नहीं, कि व्यक्ति शायर हो, संवेदनशील हो और रोमानी ना हो। रोमानी रंग की हस्ती जी की शायरी-
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है,
नए परिदों को उड़ने में वक्त तो लगता है।
ज़िस्म की बात नहीं थी, उनके दिल तक जाना था
लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है॥
 
पर हस्ती जी की गज़ल, दोहे सीधे दिल तक पहुंचते हैं बिना वक्त लगाए। विजेन्द्र शर्मा, अशोक अंजुम, डॉ. सरदार मुजावर, अब्दुल अहद साज़, सोनी गुप्ता, विनय मिर्जा, रीटा दास सभी इस प्रतिभा के मुरीद हैं।
‘‘अनभै’’ का यह अंक संग्रहणीय है, महत्वपूर्ण है, गज़ल में रुचि रखने वालों के लिए, पीएच.डी. में हस्ती जी पर काम करने वालों के लिए और मार्गदर्शक है। उन लोगों के लिए जो समझते हैं, गज़ल याने फारसी के भारी भरकम शब्द।
 
हस्ती जी के कृतित्व के साथ ही उनके जीवन पर भी यह अंक प्रकाश डालता है और हस्ती जी के व्यक्तित्व को एक खूबसूरत पेंटिग की तरह हमारे रूबरू खड़ा करता है। काव्या और लक्ष्मण दुबेजी का जिक्र ना हो तो अंक पर चर्चा अधूरी रह जाएगी। लगातार कई वर्षों तक प्रकाशन हुआ जिसमें गीत, दोहे, नवगीत, कविताओं का प्रकाशन तो हुआ ही, साथ ही तीन स्थायी स्तंभ ‘हमारी पसंद’, ‘वक्त की किताब से’ और ‘धरोहर’ हस्ती जी संपादकीय सूझ-बूझ और जीवन में गहरी दृष्टि को परिभाषित करते हैं। हस्ती जी की शिक्षा ज्यादा नहीं, पर उन्होंने जिंदगी को ग़हराई से पढ़ा, जैसे कहानीकार मनोज रूपड़ा के लिए अकेडमिक शिक्षा कम रहना लेखन में कहीं रोड़ा नहीं बनती।
‘काव्या’ का प्रकाशन १९९५ में, हस्ती जी के शोरूम में चोरी होने के बाद एक बार आर्थिक अभाव के कारण रुका, पर लक्ष्मण दुबे जैसे समर्पित गज़लकार राम के लक्ष्मण बनकर आए, ‘काव्या’ के संपादन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। और मेरे अल्पज्ञान के अनुसार डॉ. हूबनाथ पाण्डे का भी ‘युगीन काव्या’ के संपादन में हमेशा सहयोग रहा।
हस्ती जी की ईमानदारी ने ही ऐसे लोगों को जोड़ा, ‘काव्या’ फिर निकलेगी, हस्ती जी के ही शब्दों में-
किस जगह रास्ता नहीं होता
सिर्फ हमको पता नहीं होता।
अब और लिखने का मोह संवरण करते हुए हस्ती जी की ही इन पंक्तियों के साथ विदा-
तुम हवाएं लेके आओ मैं जलाता हूं, चिराग़,
किसमें कितना है दम, यारों फैसला हो जाएगा।
खुद-ब-खुद हमलावर हर इक रास्ता हो जाएगा,
मुश्किलों के रू-ब-रू, जब हौसला हो जाएगा

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