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गांव को कि या शहर, दिया जले हर एक घर
दिया जले नगर नगर दिया जले डगर डगर
जात हो न पात हो, दिल से दिल की बात हो
प्यार की सौगात हो जुल्म की न रात हो
न युद्ध न उन्माद हो, न द्वेष अंधकार हो
न घात न प्रतिघात हो, मोहब्बतों की बात हो
दिया जले नगर नगर दिया जले डगर डगर
न मज़हबी जुनून हो,
न नफ़रती फरमान हो
अमन चैन शांति हो, सुखी हरेक प्रांत हो
पनघटो का मान हो
श्रम का सम्मान हो
ज्ञान का विहान हो
शास्त्र मत विधान हो
स्नेह का दिया जले, नेह का दिया जले
दिया जले नगर नगर दिया जले डगर डगर
मनुष्यता का मूल्य हो, स्त्री मात्र तुल्य हो
समग्र सृष्टि शांति हो न मन में कोई भ्रांति हो
दीया जले विकास का यकीन का विश्वास का दिशा दिशा प्रकाश हो
न कोई न निराश हो
सत्य ज्योत हो प्रखर समृद्ध हो हर एक नर
दिया जले नगर नगर दिया जले डगर डगर
 
– अमर त्रिपाठी

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