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स्वप्न आंखों में आयें तो कैसे भला।
आप हों जब खड़े नींद के द्वार पर॥
रात परियों के आंगन में बीती मगर।
हो गयी भोर पायल की झंकार पर॥
दिल की दहलीज़ पर एक दस्तक हुई
खोल दी हमने कमरे की सब खिड़कियां।
एक खुश्बू थिरकती, ठुमकती हुई
साथ लायी धनक रंग सौ तितलियां।
एक नन्ही सी बुलबुल फुदकती हुई
कान के पास आकर चहकने लगी।
उसके पंखों से कुछ ऐसी खुश्बू उठी
मन में केसर की क्यारी महकने लगी।
बेल छज्जे के कोने से आयी उतर
तन पे नन्हीं कली को सजाये हुए।
कुछ सहमती, सिमटती, झिझकती हुई
ओस की बूंद में थी नहाये हुए।
हौले हौले से सूरज की पहली किरण
फ़र्श पर धीरे धीरे सरकने लगी।
उसने बिस्तर के कोने को क्या छू लिया
उजली चादर की सिलवट चमकने लगी।
शोख़, चंचल गिलहरी ठुमकती हुई
एक कोने में आकर खड़ी हो गयी।
मोर पंखी छटा उसकी ऐसी लगी
जैसे नन्हीं सी बेटी बड़ी हो गयी।
थम गयी जैसे कमरे में पुरवा हवा
शोख़ बुलबुल की मासूम मनुहार पर।
स्वप्न आंखों में आये तो कैसे भला
आप हों जब खड़े नींद के द्वार पर ॥
-सागर त्रिपाठी

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