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सांसों की सरगम से जब दिल की धड़कन बढ़ जाती है।
सच कहना क्या तुमको भी तब याद हमारी आती है॥
बादल बारिश के मौसम में राग मल्हार सुनाते हैं।
पुरवाई के झोंकें जब संदेश मिलन का लाते हैं॥
तोता मैना डालों पर अपनी धुन में खो जाते हैं।
कलियों के उपवन में जब मादक भौरें मंडराते हैं॥
सावन की धानी धानी रुत जब आंचल फैलाती है।
सच कहना क्या तुमको भी तब याद हमारी आती है॥
पर्वत के पीछे से सूरज ज्योति ज्वाल ले आता है।
अंधियारा जब भोर के उजले आंचल में छुप जाता है॥
धरती के कण कण को अपनी किरणों से चमकाता है।
हर मनभावन दृश्य प्रकृति का मुग्ध हृदय इतराता है
जब सागर की लहर मचल कर तट से टकरा जाती है।
सच कहना क्या तुमको भी तब याद हमारी आती है॥
सन्नाटे बातें करते हैं जब झरनों की सरगम से।
तितली अठखेली करती है जब फूलों के मौसम से॥
भोर की पुरवाई लहराए नए दिवस के आगम से
शाम सुहानी छेड़ करे जब खुलकर मादक तन मन से॥
पांवों की थिरकन से जब पगली पायल शर्माती है।
सच कहना क्या तुमको भी तब याद हमारी आती है॥
बेचैनी बढ़ जाती है जब शाम से दिल की धड़कन में।
आस की थपकी से आती है नींद नेह के आंगन में॥
जब स्वप्निल प्रतिबिम्ब झलक उठता है मन के दरपन में।
पुष्प मिलन के खिल उठते हैं जब पलकों की चितवन में॥
अंगड़ाई भी अंग अंग में मधुर पीर भर जाती है।
सच कहना क्या तुमको भी तब याद हमारी आती है॥
-डॉ.सागर त्रिपाठी

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