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आज दिवाली फिर से आई,
आओ दीप जलाएं।
खील, बतासे और मिठाई,
खुश हो-हो कर खाएं॥
देते रिश्तेदार, मित्रगण,
हंस-हमस खूब बधाई।
घर आएं, पकवान खिलाएं,
संग स्वादिष्ट मिठाई॥
कहते हैं वनवास भोग जब,
राम लौट घर आए।
इतनी खुशी मनाई घर-घर,
घी के दिए जलाए॥
श्याम अमावस को ही तब से,
हम सब दीप जलाएं।
मनमोहक विद्युत दीपों से,
हर घर-द्वार सजाएं ॥
लिए फुलझड़ी बच्चे विहंसें,
मन में भर उल्लास भी।
इतने चले पटाखे घर-घर,
गूंज उठे आकाश भी॥
मात लक्ष्मी और विनायक,
घर-घर पूजे जाते।
खील, बतासे, खांड-खिलौनों,
से ही भोग लगाते॥
विविध रंग से भरा पर्व ये,
पुलकित हिय कर जाता।
तम को दूर भगा जीवन में,
नव उमंग भर जाता ॥
-सन्तोष कुमार सिंह

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