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पूरे विश्व के वैज्ञानिक जिसकी खोज न कर सके ऐसी एक खोज हिंदुस्थान के अध्यात्मिक परंपरा ने की है . वह है मानवीय मन के शक्ति की खोज . हमारे मन मे असीम शक्ति है. अणुशक्ति से भी बढ़कर है. विश्व के इतिहास में इसे हमने अनुभव किया है. कुछ साल पहले की बात है, विश्व में महासत्ता के रूप में संयुक्त अमेरिका और संयुक्त सोविएत का बोलबाला था. विश्व की सब से श्रेष्ठ, उच्चतम परमाणु शक्ति इन दो देशों के पास थी. इन दोनों में श्रेष्ठता साबित करने हेतु कई साल शीतयुद्ध चल रहा था. लेकिन पेरेस्त्रोईका और ग्लासनोस्त ये दो शब्द एक ऐसी नीति ले कर संयुक्त सोविएत में आए की एक साल के अंदर देखते-देखते संयुक्त सोविएत जैसा शक्तीशाली राष्ट्र टुकड़ों में बिखर गया. चोटी की परमाणु शक्ति होने के बावजूद कोई भी शक्ति संयुक्त सोविएत को एक न रख सकी. इसका कारण लोगों के मन की शक्ति संगठित नहीं थी. मन की ताकत परमाणु शक्ति से भी बढ़कर है इसका एहसास विश्व को हो गया. हमें हमारे मन की ताकत को पहचानना ज्यादा जरूरी है. मन की शक्ति ने ही मानव को महान बनाया है. एक कविता जिसकी पक्तियां मन की महानता का वर्णन करती हैं –
 
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड़ दे
तू जो चाहे पर्वत पहाड़ों को फोड़ दे
तू जो चाहे धरती को अंबर से जोड दे
अमर तेरे प्राण, तुझे मिला वरदान, तेरी
मुट्ठियों में बंद तूफान है रे..
मनुष्य तू बड़ा महान है
 
मन की महानता ने ही मनुष्य को महान बना दिया है. क्या हम इस महानता को पहचानते हैं? अगर पहचानते तो किसानों के खुदकुशी जैसे विषय ही नहीं आते.
 
हमारे संतों ने मन की शक्ति को पहचान कर अपनी रचनाओं में हमेशा मन की शक्ति का जागरण करने पर बल दिया है. समर्थ रामदास जैसे संत ने ‘मनाचे श्लोक’ लिखे हैं. लेकिन यह सब सोचने के पश्चात हमारे मन में सवाल उभरता है कि मन की इस शक्ति की पहचान कैसे करें ? इस शक्ति का जागरण कैसे करें ? हमें इन सवालों के जबाब ढूढ़ने होंगे.

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