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नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस जनरल में छपे शोध-पत्र ने धरती पर जैविक विनाश की चिंतनीय चेतावनी दी है. लगभग साढ़े चार अरब साल उम्र की यह धरती अब तक पांच महाविनाश देख चुकी है. इस क्रम में लाखों जीव व वनस्पितियों की प्रजातियां नष्ट हुईं. पांचवां जो कहर पृथ्वी पर बरपा था, उसने डायनासोर जैसे महाकाय प्राणी का भी अंत कर दिया था. इस शोध-पत्र में दावा किया गया है कि अब धरती छठे विनाश के दौर में प्रवेश कर चुकी है. इस का अंत भयावह होगा. क्योंकि अब धरती पर चिड़िया से लेकर जिराफ तक हजारों जानवरों की प्रजातियों की संख्या कम होती जा रही है. वैज्ञानिकों ने जानवरों की घटती संख्या को वैश्‍विक महामारी करार देते हुए इसे छठे महाविनाश का हिस्सा बताया है. बीते 5 महाविनाश प्राकृतिक घटना माने जाते रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक इस महाविनाश की वजह बड़ी संख्या में जानवरों के भौगोलिक क्षेत्र छिन जाने को बताया है.
 
स्टैनफोर्ड विश्‍वविद्यालय के प्रोफसर पाल आर इहरिच और रोडोल्फो डिरजो नाम के जिन दो वैज्ञानिकों ने यह शोध तैयार किया है, उनकी गणना पद्धति वही है, जिसे यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर जैसी संस्था अपनाती है. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 41 हजार 415 पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की प्रजातियां खतरे में हैं. इहरिच और रोडोल्फो के शोध-पत्र के मुताबिक धरती के 30 प्रतिशत कशेरूकी प्राणी विलुप्तता के कगार पर हैं. इनमें स्तनपायी, पक्षी, सरीसृप और उभयचर प्राणी शामिल हैं. इस ह्रास के क्रम में चीतों की संख्या 7000 और ओरांगउटांग 5000 ही बचे है. इससे पहले के हुए पांच महाविनाश प्राकृतिक होने के कारण धीमी गति के थे, लेकिन छठा विनाश मानव निर्मित है, इसलिए इसकी गति बहुत तेज है. ऐसे में यदि तीसरा विश्‍व युद्ध होता है तो विनाश की गति तांडव का रूप ले सकती है. इस लिहाज से इस विनाश की चपेट में केवल जीव-जगत की प्रजातियां ही नहीं आएंगी, बल्कि अनेक सभ्यताएं और संस्कृतियां भी नष्ट हो जाएंगी. गोया, शोध-पत्र की चेतावनी पर गंभीर बहस और उसे रोकने के उपाय अमल में लाए जाना जरूरी है. बाबजूद यह शोध-पत्र इसलिए संशय से भरा लगता है, क्योंकि अमेरिका के जिन दो वैज्ञानिकों ने यह जारी किया है, उसी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी जवाबदेही से मुकरते हुए जलवायु परिवर्तन के समझौते को खारिज कर दिया है. इसलिए यह आशंका प्रबल है कि दुनिया का राजनीतिक नेतृत्व इसे गंभीरता से लेगा ?
 
चूंकि छठा महाविनाश मानव निर्मित बताया जा रहा है, इसलिए हम मानव का प्रकृति में हस्तक्षेप कितना है, इसकी पड़ताल किए लेते हैं. एक समय था जब मनुष्य वन्य पशुओं के भय से गुफाओं और पेड़ों पर आश्रय ढूंढ़ता फिरता था. लेकिन ज्यों-ज्यों मानव प्रगति करता गया प्राणियों का स्वामी बनने की उसकी चाह बढ़ती गई. इस चाहत के चलते पशु असुरक्षित हो गए. वन्य जीव विशेषज्ञों ने जो ताजा आंकड़े प्राप्त किए हैं उनसे संकेत मिलते हैं कि इंसान ने अपने निजी हितों की रक्षा के लिये पिछली तीन शताब्दियों में दुनिया से लगभग 200 जीव-जन्तुओं का अस्तित्व ही मिटा दिया. भारत में वर्तमान में करीब 140 जीव-जंतु विलोपशील अथवा संकटग्रस्त अवस्था में हैं. ये संकेत वन्य प्राणियों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य और चिड़ियाघरों की सम्पूर्ण व्यवस्था पर प्रश्‍न चिन्ह लगाते हैं ?
 
पंचांग (कैलेण्डर) के शुरू होने से 18 वीं सदी तक प्रत्येक 55 वर्षों में एक वन्य पशु की प्रजाति लुप्त होती रही. 18 वीं से 20 वीं सदी के बीच प्रत्येक 18 माह में एक वन्य प्राणी की प्रजाति नष्ट हो रही है. एक बार जिस प्राणी की नस्ल पृथ्वी पर समाप्त हो गई तो पुन: उस नस्ल को धरती पर पैदा करना मनुष्य के बस की बात नहीं है. हांलाकि वैज्ञानिक क्लोन पद्धति से डायनासौर को धरती पर फिर से अवतरित करने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन अभी इस प्रयोग में कामयाबी नहीं मिली है. क्लोन पद्धति से भेड़ का निर्माण कर लेने के बाद से वैज्ञानिक इस अहंकार में है कि वह लुप्त हो चुकी प्रजातियों को फिर से अस्तित्व में ले आएंगे. लेकिन इतिहास गवाह है कि मनुष्य कभी प्रकृति से जीत नहीं पाया है. इसलिए मनुष्य यदि अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के अहंकार से बाहर नहीं निकला तो विनाश या प्रलय आसन्न ही समझिए ? चुनांचे, प्रत्येक प्राणी का पारिस्थितिक तंत्र, खाद्य श्रृंखला एवं जैव विविधता की दृष्टि से विशेष महत्व होता है. जिसे कम करके नहीं आंका जाना चाहिए.
 
 
भारत में फिरंगियों द्वारा किये गए निर्दोष प्राणियों के शिकार की फेहरिस्त भले ही लम्बी हो उनके संरक्षण की पैरवी अंग्रेजों ने ही की थी. 1907 में पहली बार सर माइकल कीन ने जंगलों को प्राणी अभ्यारण बनाए जाने पर विचार किया, किन्तु सरजॉन हिबेट ने इसे खारिज कर दिया. ईआरस्टेवान्स ने 1916 में कालागढ़ के जंगल को प्राणी अभ्यारण्य बनाने का विचार रखा. किंतु कमिश्‍नर विन्डम के जबरजस्त विरोध के कारण मामला फिर ठण्डे बस्ते में बंद हो गया. 1934 में गवर्नर सर माल्कम हैली ने कालागढ़ के जंगल को कानूनी संरक्षण देते हुये राष्ट्रीय प्राणी उद्यान बनाने की बात कही. हैली ने मेजर जिम कार्बेट से परामर्श करते हुए इसकी सीमाएं निर्धारित कीं. सन् 1935 में यूनाईटेड प्राविंस (वर्तमान उत्तर-प्रदेश एवं उत्तराखंड) नेशनल पार्कस एक्ट पारित हो गया और यह अभ्यारण्य भारत का पहला राष्ट्रीय वन्य प्राणी उ़द्यान बना दिया गया. यह हैली के प्रयत्नां से बना था, इसलिये इसका नाम ’हैली नेशनल पार्क’ रखा गया. बाद में उत्तर-प्रदेश सरकार ने कार्बेट की याद में इसका नाम ’कार्बेट नेशनल पार्क’ रख दिया. इस तरह से भारत में राष्ट्रीय उद्यानों की बुनियाद फिरंगियों ने रखी.
भारत में दुनिया के भू-भाग का 2.4 प्रतिशत भाग है. इसके बाबजूद यह सभी ज्ञात प्रजातियों की सात से आठ प्रतिशत प्रजातियां उपलब्ध हैं. इसमें पेड़-पौधों की 45 हजार और जीवों की 91 हजार प्रजातियां हैं इस नाते भारत जैव-विविधता की दृष्टि से संपन्न देश है. हालांकि कुछ दशकों से खेती में रसायनों के बढते प्रयोग ने हमारी कृषि संबंधी जैव-विविधता को बड़ी मात्रा में हानि पहुंचाई है. आज हालात इतने बद्तर हो गए हैं कि प्रति दिन 50 से अधिक कृषि प्रजातियां नष्ट हो रही हैं. हरित क्रांति ने हमारी अनाज से संबंधित जरूरतों की पूर्ति जरूर की, लेकिन रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के प्रयोग ने एक ओर तो भूमि की सेहत खराब की, वहीं दूसरी ओर कई अनाज की प्रजातियां भी नष्ट कर दीं. अब फसल की उत्पादकता बढ़ाने के बहाने जीएम बीजों का भी खतरा कृषि संबंधी जैव-विविधता पर मंडरा रहा है.
वर्तमान में जिस रफ्तार से वनों की कटाई चल रही है उससे तय है कि 2125 तक जलाऊ लकड़ी की भीषण समस्या पैदा होगी, क्योंकि वर्तमान में प्रतिवर्ष करीब 33 करोड़ टन लकड़ी के ईंधन की जरूरत पड़ती है. देश की संपूर्ण ग्रामीण आबादी ईधन पर निर्भर है. ग्रामीण स्तर पर फिलहाल कोई ठीक विकल्प भी दिखाई नहीं दे रहा है. सरकार को वन-प्रांतरों निकट जितने भी गांव है उनमें ईधन की समस्या दूर करने के लिए बड़ी संख्या में गोबर गैस सयंत्रं लगाने, उज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर देने और प्रत्येक घर में एक विद्युत कनेक्शन नि:शुल्क देना चाहिए. ग्रामीणों के पालतू पशु इन्हीं वनों में घास चरते हैं इस कारण प्राणियों के प्रजनन पर प्रतिकूल असर पड़ता है. यह घास बहुत सस्ती दरों पर ग्रामीणों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए. घास की कटाई इन्हीं ग्रामों के मजदूरों से कराई जाए तो गरीबी की रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले जो ग्रामीण हैं उनके परिवारों की उदरपूर्ति के लिए धन भी सुलभ हो सकेगा और वे संभवत: जगल से चोरी-छिपे लकड़ी भी नहीं काटेंगे. इन उपायों से बड़ी मात्रा में जैव-विविधता का संरक्षण होगा.
 
मध्य-प्रदेश एवं छत्तीसगढ़. देश के ऐसे राज्य हैं, जहां सबसे अधिक वन और प्राणी संरक्षण स्थल हैं. प्रदेश के वनों का 11 फीसदी से अधिक क्षेत्र उद्यानों और अभ्यारणों के लिये सुरक्षित है. ये वन विंध्य-कैमूर पर्वत के रूप में दमोह से सागर तक, मुरैना में चंबल और कुवांरी नदियों के बीहड़ों से लेकर कूनो नदी के जंगल तक, शिवपुरी का पठारी क्षेत्र, नर्मदा के दक्षिण में पूर्वी सीमा से लेकर पश्‍चिमी सीमा बस्तर तक फैले हुए हैं. एक ओर तो ये राज्य देश में सबसे ज्यादा वन और प्राणियों को संरक्षण देने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर वन संरक्षण अधिनियम 1980 का सबसे ज्यादा उल्लंघन भी इन्हीं राज्यों में हो रहा है. साफ है कि जैव-विविधता पर संकट गहराया हुआ है.
 
 संदर्भ – नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस जनरल में प्रकाशित शोध-पत्र

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