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इवोल्यूशन लाखों-करोड़ों सालों से पृथ्वी का भाग्य नियंता रहा है। इसी ने पूरी पृथ्वी और उसके जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को गढ़ा है। इस इवोल्यूशन में प्राकृतिक चयन या नेचुरल सेलेक्शन के जरिए जो सबसे ज्यादा उपयुक्त होता था, उसी का जीन आगे बढ़ता गया। इसी को सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट कहा जाता है। इसमें होने वाले कुछ उत्परिवर्तन या म्यूटेशन से नई प्रजातियों का जन्म भी हुआ।

पहले इंसान भी इसी इवोल्यूशन से संचालित होता रहा था। आज से अगर एक लाख साल या पचास हजार साल पहले के इंसानों को देखा जाए तो आज की तरह केवल एक ही मानव प्रजाति उस समय नहीं थी। अभी तक जो खोज हुई है उससे पता चलता है कि इंसानों की कई प्रजातियां जीवित थी और अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही थीं। फिलीपींस में इसी सप्ताह एक और इंसानी प्रजाति का पता चला है जो कि लंबाई में चार फुट से कम हुआ करती थी। उन इंसानों के अवशेष मिले हैं। जाहिर है कि वे नेचुरल सलेक्शन में सर्वाइव नहीं कर पाए।

हम होमो सेपियंस हैं। हमारी प्रजाति का नाम यही है। होमो सेपियंस ने अपने आप को प्रकृति के सबसे ज्यादा उपयुक्त साबित किया। लेकिन, यहीं पर आकर वह इवोल्यूशन का विरोधी हो गया। होता यह है कि अन्य जीव-जंतु प्रकृति के साथ अपना तालमेल बैठाने के लिए खुद में शारीरिक बदलाव लाते हैं। जैसे हाथी ने अपनी नाक को ही इतना लंबा कर लिया कि वह हाथ का काम करने लगा या जिराफ की गर्दन लंबी हो गई। जबकि, इंसान को जब प्रकृति के साथ तालमेल बनाने की जरूरत पड़ी तो उसने अपने शरीर में परिवर्तन लाने की बजाय ऐसे औजारों को बनाना शुरू किया जो यह काम कर सकें। अपने शरीर पर घने बाल उगाने की बजाय उसने किसी बाल वाले जानवर की खाल को पहनना ज्यादा आसान समझा।

यही चीज उसे जानवरों से अलग करती थी और यहीं से मानव सभ्यता का जन्म भी हुआ। लेकिन, मानव सभ्यता के जन्म लेने के साथ ही इवोल्यूशन पर एक प्रकार से रोकथाम लग गई। अब इवोल्यूशन नहीं बल्कि इंसानी सभ्यता सबकुछ को नियंत्रित करने लगी। इसमें इवोल्यूशन जैसी वाइल्डनेस नहीं थी। लेकिन, समय के साथ हम देख सकते हैं कि इसमें मक्कारी इंसानों जैसी मौजूद थी।

नहीं तो भला ऐसा हो सकता है कि सबसे ज्यादा तगड़े और हट्टे-कट्टे नीग्रो किसी दुबले-पतले और कमजोर से गोरे आदमी की गुलामी करते। हमारे यहां का मेहनतकश तबका जिसके हाथों पर गट्ठे पड़े होते और बाजुओं में मांसपेशियां उछलती रहतीं, वह किसी पेटू पंडित के चरणों में पड़ा होता। इंसानी सभ्यता ने सबकुछ बदल दिया। अपने हाथ में ले लिया।

आज जिसे हम मानव सभ्यता कहते हैं, उसमें इवोल्यूशन से ज्यादा क्रूरता या वाइल्डनेस समा गई है। इसमें पहले से ज्यादा मक्कारी और हवस मौजूद है। अगर दुनिया की आबादी छह सौ करोड़ के लगभग मानें तो मुश्किल से एक करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी लालच और हवस के चलते अब पृथ्वी का ही जीवन मुश्किल हो गया है।

इन एक करोड़ लोगों की लालच और हवस पर काबू नहीं किया गया तो पृथ्वी का ही नष्ट हो जाना संभव है। इन अल्पसंख्यक लोगों ने पूरी दुनिया के संसाधनों को कब्जे में किया हुआ है और सबसे ज्यादा प्रदूषण वे पैदा करते हैं, सबसे ज्यादा उपभोग वे करते हैं, सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वे करते हैं। वे धरती को गरम करने यानी ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है। वे दुनिया का पानी ख़त्म कर रहे हैं। हवा को गंदा कर रहे हैं। उन्हीं के चलते दुनिया की तमाम चोटियों पर जमा बर्फ तेजी से पिघल रही है। दुनिया भर के समुद्रों को उन्होंने प्लास्टिक से भर दिया है।

उनको परास्त करने में ही अब धरती की तरक्की लिखी हुई है।

 

 

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