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‘यूनिवर्सल ब्रदरहुड थ्रू योग’ नामक ग्रंथ का लोकार्पण भारत के उपराष्ट्रपति मा. वेंकया नायडू तथा रा.स्व.संघ के सरसंघचालक मोहन जी भागवत के द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में एक भव्य कार्यक्रम में किया गया।भारत द्वारा योग के रूप में विश्व को मिले एक वरदान का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, मानस शास्त्रीय तथा सामाजिक आदि आयामों पर विवेचन करना ही इस ग्रंथ का प्रमुख उद्देश्य था।

ग्रंथ के आलेखों से ज्ञात होता है कि योग केवल शारीरिक कसरत या श्वासोच्छवास की कसरत नहीं वरन शरीर तथा मन दोनों का संतुलन साधने की शास्त्रशुद्ध साधना है।

इसमें सांख्य तत्वज्ञान प्रणित मृत्युत्पत्ति का सिद्धांत है, साथ ही वर्णाश्रम, पुरुषार्थ से युक्त व्यवहार तथा आचरण का तत्वज्ञान भी है। इन लेखों से यह भी ज्ञात होता है कि गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा प्रतिपादित कर्म, भक्ति और ज्ञान नामक योग प्रत्येक व्यक्ति अंगीकार कर सकता है तथा उसके द्वारा अपना आध्यात्मिक विकास भी कर सकता है।

योग लचीली परंतु दृढ़ चौखट देकर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को अनुशासित रूप देने वाला शास्त्र है। योग का भले ही राजनैतिक या आर्थिक क्षेत्र से सीधा सम्बंध न हो परंतु योग के तत्व व्यक्ति से समाज तक सातत्यपूर्ण तथा स्थिर जीवन प्रवाह की स्थापना करते हुए दिखाई देते हैं।

सामूहिक हित साधने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रगल्भ करना, कर्तव्यों के प्रति उसे जागृत करना, मानवरूपी साधन सम्पत्ति का योग्य उपयोग करके सांस्कृतिक विविधता में भी एकसूत्र का जतन करना इत्यादि में योग का महत्वपूर्ण योगदान है।

योगशास्त्र भारत की समृद्ध विरासत का वह प्रभावशाली वरदान है, जो धार्मिक विविधता, मूल्यों के संघर्ष सामाजिक अव्यवस्था आदि सभी पार्श्वभूमि पर एक चिरंतन मूल्यव्यवस्था देने में सफल हुआ है।

जस्टिस श्रीकृष्ण जैसे दिग्गज लेखकों के लेखों के कारण ग्रंथ का सामाजिक पहलू वाला हिस्सा पठनीय बना है। सात भागों में विभाजित ग्रंथ में योग का विविध क्षेत्रों में योगदान दिखाई देता है। योग के पारंपरिक ग्रंथों से अंतरधार्मिक ग्रंथों से सुसंवाद की भूमिका तक, आसनों से मन:स्वास्थ्य तक सभी विषय लेखों में समाहित हैं।

पहले भाग में पतंजलि योग की सिद्धि विषय पर भी कुछ लेख समाहित किए गए हैं। वैज्ञानिक कसौटियों पर भी योग को खरा साबित करने वाले लेख इसमें समाहित किए गए हैं।

दूसरे भाग में योग के व्यावहारिक मूल्य बताए गए हैं। खेल, सृजनशील कला, व्यवसाय वृद्धि आदि में योग किस प्रकार उपयोगी होगा इसका भी समावेश है।

तीसरा भाग योग का प्रचार प्रसार वैश्विक स्तर पर करने वाले कुछ प्राचीन तथा आधुनिक साधकों को समर्पित है।
चौथे भाग में कुछ योग साधकों के व्यक्तिगत अनुभव शब्दबद्ध किए गए हैं। ये साधक विविध धर्म, देश और व्यवसाय करने वाले हैं। योग उनको जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ है।

वैश्विक परिदृश्य से योग का विचार करने वाला भी एक भाग है। आधुनिकता और परंपरा के तनावों के मुद्दों को योग के माध्यम से कैसे सुगम बनाया जा सकता है यह इन लेखों का माध्यम से समझा जा सकता है।

दिलीप करंबेलकर जी ने इस ग्रंथ के सारांश रूपी लेख में कहा है कि योग के जरिए विश्व बंधुता कायम करके रामराज्य पुन: प्रस्थापित करने में योग किस प्रकार उपयोगी साबित हो सकता है।

ग्रंथ के अंत में दी गई योग विषयक सूची के कारण जिज्ञासू पाठकों को अत्यंत उपयोगी संदर्भ सूची भी उपलब्ध हुई है।

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