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कुछ दिन पहले व्हाट्सएप पर एक कार्टून बड़ा प्रसिद्ध हुआ था जिसमें दो भाग थे. एक भाग में १९९७ का दृश्य था जिसमें एक मां अपने फुटबॉल खेलते बेटे को कान पकड़कर घसीटते हुए घर ला रही है, वहीं दूसरे चित्र में २०१७ का दृश्य है जहां मां अपने बेटे को कान पकड़कर मैदान में खेलने जाने के लिए कह रही है और बच्चा मोबाइल में डूबा हुआ अपनी मां की बात को अनसुनी कर रहा है.
 
इसी प्रकार एक और किस्सा है जो बहुत लोगों के अनुभव में आता है. मैं एक बार मेरी दीदी के घर गया. मेरा भांजा, जो करीब १० साल का है, कहने लगा, चलो मामा हम फुटबॉल खेलते हैं. मैंने कहा, बिलकुल! चलो चलते हैं. मेरा भांजा खुशी से झूम उठा और भागते हुए अंदर गया. मैंने सोचा वह फुटबॉल लेने अंदर के कमरे में गया होगा. बड़ी देर तक वह बाहर नहीं आया तो मैंने उसे आवाज़ दी. मुझे जवाब मिला, मामा, जल्दी अंदर आओ ना, प्ले स्टेशन तैयार है. तुम कौन-सी जर्सी लोगे, लाल या हरी?
 
इस प्रकार के किस्से आजकल आम हो चुके हैं. मैदानी खेल भी अब घर बैठे खेले जा रहे हैं. घरों में बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की संख्या से अब यह स्थिति आने लगी है. बच्चों में आलस्य का ये आलम है कि बाहर के काम करना तो दूर, घर के छोटे-मोटे काम करना भी उनके लिए मुश्किल बन गया है. माता-पिता के पास एक बहुत ही आसान सा स्पष्टीकरण होता है कि जो हमें नहीं मिल सका वह सब हम अपने बच्चों को दे रहे हैं. किन्तु ऐसा करके वे बच्चों की कोई मदद नहीं कर रहे. कई बार माता-पिता बड़े गर्व से बताते हैं कि हमारा बेटा तो मोबाइल बड़ी आसानी से चला लेता है, उसे मोबाइल के सारे फीचर्स पता है. लेकिन यह गर्व की बात नहीं. घर आये मेहमान का मोबाइल निर्लज्जता से मांग कर उस पर गेम खेलना चलन बन चुका है. माता-पिता कुछ कहते नहीं और मेहमान संकोचवश कुछ कह नहीं पाता.
 
मोबाइल के रेडियेशन कितने हानिकारक हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. बड़ों पर ही इसका अत्यधिक असर होता है तो बच्चों की नाज़ुक नसों पर इसका क्या असर होता होगा, यह सोचने वाली बात है. बच्चों में मोटापे का सबसे बड़ा कारण मोबाइल है. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर ३ में से १ बच्चा मोटापे का शिकार है और इसका सबसे बड़ा कारण स्क्रीन टाइम है. स्क्रीन टाइम का अर्थ है किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट के सामने दिन के कुछ घंटे बिताना जिसमें टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, टेबलेट, गेमिंग कंसोल से लेकर हर वह आधुनिक साधन शामिल हैं जिसमें किसी प्रकार की स्क्रीन होती है. टीवी की बढती स्क्रीन साइज ने यह समस्या और जटिल बना दी है. बड़ी स्क्रीन का मतलब अधिक पिक्सेल, और अधिक तेज़ रोशनी जिससे आंखों पर गहरा असर होता है. अत्यधिक स्क्रीन टाइम से एक ओर आंखों में थकावट, दिमागी थकावट और उसके कारण, दिमागी चुस्ती और तंदुरुस्ती कम होना, दिन भर सुस्ती महसूस होना, ये सारी समस्याएं पैदा होती हैं; वहीं दूसरी ओर इनसोम्निया यानि अनिद्रा की शिकायत भी होती है. इन सारी बातों का असर अंततः बच्चों की पढ़ने और ग्रहण करने की क्षमता पर भी होता है. टीवी देखते हुए भोजन करना आज हर घर में सामान्य बात है, किन्तु अमेरिकन अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स द्वारा किये गए एक शोध के अनुसार जिन बच्चों के परिवार टीवी देखते हुए भोजन करते हैं वे कम सब्जियां और अनाज खाते हैं और उनमें भोजन के प्रति अरुचि अधिक होती है. उनके शरीर में हर प्रकार के पोषक तत्वों की कमी होती है. मोबाइल के लगातार इस्तेमाल से बच्चों की गर्दन और पीठ में दर्द की शिकायत हो सकती है.
 
यह तो हुई शरीर की बात. जब हम मन की बात करते हैं तो बातें और गंभीर हो जाती हैं. मोबाइल और टीवी पर अत्यधिक समय बिताने वाले बच्चे जल्द ही उसके आदी हो जाते हैं. यह वैसी ही लत है जैसे कोई नशा हो. ऐसे बच्चों को किसी बात के लिए भी मना करने पर वे हिंसक हो उठते हैं. ऐसे बच्चे बाहर की दुनिया को भी टीवी की नज़र से देखते हैं. वे अपनी एक अलग काल्पनिक दुनिया में रहने लगते हैं और उन्हें वास्तविक दुनिया की कोई खबर नहीं होती. वे मोबाइल और टीवी पर दिखाए जाने वाले हर उत्पाद को खरीदना चाहते हैं. अत्यधिक टीवी देखने वाले बच्चे ज्यादा सॉफ्ट ड्रिंक पीना, जंक फ़ूड खाना अधिक पसंद करते हैं, जो कि उनमें मोटापा तो बढ़ाता ही है साथ ही रोग प्रतिकारक क्षमता भी कम करता है. उन्हें आलसी और असंवेदनशील भी बनाता है.
 
ऐसे बच्चे एकाकी रहना पसंद करते हैं और ज्यादा सोशल नहीं होते. न उनके कोई मित्र होते हैं, न उनकी कोई और रूचि होती है. उन्हें सब बातें बोरिंग लगती हैं. खाली समय उन्हें परेशान करता है. उन्हें हर पल मनोरंजन चाहिए.
यह बात सच है कि आज के अत्याधुनिक तकनीक के दौर में इन उपकरणों के इस्तेमाल को टाला नहीं जा सकता. ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं. किन्तु बच्चों को इनका कितना इस्तेमाल करना चाहिए इसका निर्णय करना आवश्यक है. अगर बच्चे असीमित समय तक, बेरोकटोक इन गैजेट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं तो ये एक खतरनाक स्थिति है. इस मामले में कुछ कदम उठाए जा सकते हैं जो इस प्रकार हैं :
 
* अगर बच्चा १६ साल से कम उम्र का है तो उसे मोबाइल बिलकुल मत दीजिए क्योंकि १६ से कम उम्र के बच्चों के ब्रेन सेल्स काफी नाज़ुक होते हैं जो मोबाइल के शक्तिशाली रेडीएशन्स को सहन नहीं कर सकते और बुद्धि के विकास पर विपरीत असर डालते हैं.
* बस, ट्रेन, कार और लिफ्ट में बच्चों को मोबाइल का इस्तेमाल न करने दें क्योंकि ये चीजें धातु की बनी होती हैं और मोबाइल को धातु में से सिग्नल को खींचने में अधिक शक्ति लगानी पड़ती है जो बच्चों के लिए हानिकारक हो सकता है.
* कमजोर सिग्नल वाले स्थान पर मोबाइल न स्वयं इस्तेमाल करें और न बच्चों को करने दें.
* रात को सोते समय मोबाइल बच्चों से दूर रखें.
* टीवी देखने का समय सीमित कर दें. टीवी देखने के लिए कोई शर्त न रखें. टीवी को किसी पुरस्कार या सजा के लिए इस्तेमाल न करें. क्योंकि इससे टीवी को अनावश्यक महत्व मिलता है. बच्चों के सामने टीवी के कार्यक्रमों पर चर्चा न करें.
* बच्चों को मैदानी खेल खेलने के लिए प्रोत्साहित करें. हो सके तो स्वयं उनके साथ खेलें. कोई सकारात्मक रूचि पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करें, जैसे पुस्तकें पढ़ना, महापुरुषों के चित्र इकट्ठा करना. पासपड़ोस के बच्चों के साथ मिलकर कोई सामजिक कार्य करना जैसे वृक्षारोपण, सफाई अभियान करना आदि.
* संगीत या ट्रैकिंग से संबंधित समूह से अपने बच्चे को जोड़ें.
* उन्हें घर के कामों की आदत डालें. घर की छोटी-मोटी जिम्मेदारियां उन पर डालें.
 
इसके अलावा बहुत कुछ है जो बच्चों को इन गैजेट्स से दूर रख सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जब तक उन्हें कोई बेहतर और सकारात्मक विकल्प नहीं दिया जाएगा तब तक वे उसमें से बाहर नहीं आ सकेंगे. उन्हें ये बात समझाना बहुत आवश्यक है कि ये गैजेट्स केवल साधन हैं, साध्य नहीं.
 
स्टीव जॉब्स और बिल गेट्स जैसे टेक्नोलॉजी के महानायकों ने भी अपने बच्चों को तकनीकी गैजेट्स से हमेशा दूर रखा. स्टीव जॉब्स के अपने शब्दों में, ‘‘मेरे बच्चे मुझ पर और मेरी पत्नीपर फासीवादी होने का और तकनीकी के बारे में अत्यधिक चिंतित होने का आरोप लगाते हैं, और वे कहते हैं कि उनके दोस्तों में से किसी के घर में भी ये नियम नहीं है… ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने प्रौद्योगिकी के खतरों को करीब से देखा है. मैंने इसे अपने आप में देखा है, मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चों के साथ ऐसा हो.’’
वे आगे कहते थे, ‘‘अगर हमारे आईफोन्स और आधुनिक तकनीक के प्रति हमारा व्यसन अगर कोई संकेत है, और अगर हम अपने बच्चों के जीवन के शुरुआती दौर में ही प्रौद्योगिकी पर ले आते हैं तो हम उन्हें अधूरा, विकलांग, कल्पनाशीलता-रहित, सृजनशीलता-रहित, विस्मय-रहित, संवेदना-रहित जीवन दे रहे हैं. हम मैदान में खेलने वाली आखिरी पीढ़ी हैं क्योंकि साफ तौर पर हमारे समय में लैपटॉप और स्मार्टफोन्स नहीं थे. हमें हमारा ज्ञान लोगों से, पुस्तकों से, समाज से और आसपास के वातावरण से मिला था. किसी गूगल सर्च से नहीं.’’
 
तो अगली बार जब आप अपने बच्चे के लिए कोई गेमिंग कंसोल या अन्य कोई गैजेट खरीदने की सोचें तो समझ लीजिये कि आप अपने हाथों से स्वयं अपने बच्चे का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं.

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