हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

संसार का प्रत्येक प्राणी सदैव सुख शंति व आनन्द चाहता है किन्तु उसका मूल स्रोत न जानने के कारण प्राय: इस प्रयास में सफल नहीं हो पाता। इसके लिए जिस अनित्य शक्ति की आवश्यकता होती है, उसका बोध कराने के लिए भारत की आध्यात्मिक धरा पर समय-समीय पर संतों-मनीषियों, सुधारकों व महापुरुषों का जन्म होता रहा है, जिन्होंने अपने देशकाल की तद्युगीन परिस्थितियों के अनुरूप समाज में व्याप्त कुरीतियों का निराकरण कर एक स्वस्थ्य समाज की संरचना में अपना महती योगदान दिया। ऐसी ही एक दिव्य विभूति थे- महावीर स्वामी।

आज से करीब ढ़ाई हजार साल पहले (599 ई. पूर्व ) एक राजघराने में जन्मे महावीर स्वामी का समूचा जीवन त्याग, तपस्या व अहिंसा का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने एक लंगोटी तक का परिग्रह नहीं किया।

समूची दुनिया में पंचशील (सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अत्सेय व क्षमा) का अनूठा सिद्धांत देने वाले स्वामी महावीर ने न सिर्फ मानव समाज अपितु सम्पूर्ण प्राणी समुदाय के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। जैन धर्म के प्रवर्तक व 24वें तीर्थकर महावीर की मान्यता थी कि संसार के प्रत्येक जीव एक ही आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें दूसरों के प्रति वही विचार व व्यवहार रखना चाहिए जो हम खुद के प्रति चाहते हैं। “जियो और जीने दो” का उनका यह जीवनमंत्र वर्तमान परिस्थितियों में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। आज जिस तरह समाज में हिंसा, अत्याचार, चोरी, लूटपाट जैसे अपराधों की बाढ़ सी आती जा रही है। लालच व क्रोध के दानव ने सामाजिक ताने-बाने को तार-तार कर दिया है। खून के रिश्ते तक स्याह हो गये हैं। मानवता व आत्मीयता व संवेदना जैसे मनोभाव विरले ही दिखते हैं। ऐसे अशांत, भ्रष्ट व हिंसक समाज में महावीर की अहिंसा का पथ ही मानव मन को सच्ची शांति प्रदान कर सकता है।

540 ई.पूर्व कुण्ड ग्राम (वर्तमान बिहार) के एक राजघराने में जन्मे एक क्षत्रीय राजकुमार के हृदय में समाज की वर्तमान दशा-दिशा को देखकर वेदना के अंकुर बाल्यावस्था से फूटने लगे थे। परन्तु पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें इस दिशा में कुछ सार्थक करने का मौका 30 वर्ष की आयु में मिल पाया। होश संभालते ही किशोरवय के राजपुत्र वर्धमान ने खुद को विषम परिस्थितियों से घिरा पाया। उनके युग में धर्म के नाम पर बलि प्रथा पूरे चरम पर थी। राज पुरोहित व धर्माचार्य पूर्णत: स्वेच्छाचारी हो गये थे। आम जनता उनके बंधनों व अत्याचारों के बीच पिस कर बुरी तरह कराह रही थी। यह अन्याय देख कर भावनाशील राजकुमार वर्धमान का कोमल मन तड़प उठा और जीवन उद्देश्य प्राप्ति का सुअवसर मिलते ही उन्होंने एक पल की देरी नहीं की। गृह त्यागकर बारह वर्षों तक कठोर तप साधना के बाद कैवल्य (परम ज्ञान) की प्राप्ति के बाद वह जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर महावीर स्वामी बने और अहिंसा को युगधर्म के रूप में प्रवर्तित किया।

तीर्थकर महावीर की मान्यता थी कि लोगों से कहा संसार के प्रत्येक जीवधारी को अपना जीवन अति प्रिय है। जो दूसरों के जीवन को नष्ट करने या क्षति पहुंचाने का प्रयास करता है वह हिंसक होता है और दानव कहलाता है। इसके विपरीत जो दूसरों के जीवन की रक्षा करता है वह अहिंसक होता है और मानव कहलाता है। उन्होंने तत्कालीन हिन्दू धर्म को दूषित बनाने वाली पशु बलि जैसी कुप्रथा को रोककर सामाजिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया। उनका कहना था कि पशु हत्या ही नहीं, स्वार्थपरता, बेइमानी व धोखेबाजी भी हिंसा का रूप है। उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था में अनीति का का प्रवेश हो जाने से राष्ट्र का नैतिक जीवन भ्रष्ट हो जाता है। राज्याधिकारियों में भ्रष्टाचार का दीमक लग जाने के कारण राष्ट्र का वतावरण दूषित हो रहा है। आज दुनिया के अधिकांश देशों में आपाधापी है। युद्ध की आशंका के बादल गहराते जा रहे हैं। यह सब हिंसा मूलक नीति का ही नतीजा है। उन्होंने लोगों से कहा कि तुम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार न करो जो तुम दूसरों से अपने लिए नहीं चाहते। महावीर ने व्यक्ति के आचरण सुधार व उसे त्यागमूलक बनाने पर बल दिया। महावीर स्वामी ने अपने प्रत्येक अनुयायी (साधु व गृहस्थ दोनों वर्गों के लिए) के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह इन पांच व्रतों का पालन अनिवार्य बताया।

महावीर स्वामी की शिक्षाएं वर्तमान में कहीं अधिक प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं। गौरतलब हो कि महात्मा गांधी महावीर स्वामी के अहिंसा दर्शन से इतने गहरे प्रभावित हुए कि आजीवन उनके अनुयायी बने रहे। उन्होंने महावीर के अहिंसा के सूत्र को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार बनाकर पूरे संसार के सम्मुख एक अनूठा आदर्श रखा। 1919 में एक जनसभा में भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, “मैं विश्वासपूर्वक कहता हूं कि जैन तीर्थकर महावीर स्वामी को जिस सिद्धांत के लिए समूचे भारत में पूजा जाता है तो वह “अहिंसा” है। मैंने संसार के कई धर्मों का अध्ययन किया है और उनके हर अनुकरण योग्य सिद्धांत का आचरण भी मैं करता हूं। भले ही मैं खुद को पक्का सनातनी हिन्दू मानता हूं परन्तु मैं नहीं समझता कि जैन धर्म दूसरे धर्मदर्शनों की अपेक्षा जरा भी कमतर है। मेरा मानना है कि जो सच्चा हिन्दू है वह सच्चा जैनी है और जो सच्चा जैनी है वह सच्चा हिन्दू भी है। प्रत्येक धर्म की महानता इस तथ्य में निहित है कि उस धर्म में अहिंसा के तत्व कितने परिमाण में मौजूद हैं। ” यद्यपि कलान्तर में जैन धर्म के सिद्धांतों का अक्षरश: पालन करना जनसामान्य के लिए काफी कठिन होने लगा फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं कि महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन किया उसका मकसद देशवासियों में निर्बलता व कायरता उत्पन्न करना नहीं वरन राष्ट्र में अमन व शांति स्थापित करने का ही था।

इनसेट

 जैन धर्म में बारह भावना

महावीर स्वामी ने संसार में जीव की स्थिति और कर्मानुसार उसकी भली-बुरी गति के संदर्भ में गहन चिन्तन के उपरान्त जिस जीवन प्रणाली का प्रतिपादन किया, वह जैन धर्म में बारह भावना के नाम से प्रसिद्ध है। ये बारह भावनाएं हैं-अनित्य भावना यानी इन्द्रिय सुख क्षणभंगुर है। इसलिए मनुष्य को इस अनित्य जगत के प्रति मोहभाव नहीं रखना चाहिए। अशरण भावना अर्थात जिस प्रकार निर्जन वन में सिंह के पंजे में आये शिकार के लिए मृत्यु ही उसकी अंतिम गति होती है, उसी प्रकार सांसारिक प्राणियों की मृत्यु भी अंतिम सत्य है। संसारानुप्रेक्षा भावना का अर्थ है- अज्ञानीजन भोग विषयों को में सुख तलाशते हैं, किन्तु ज्ञानी उनको नरक का निमित्त समझते हैं, इसलिए मानव को इनमें बिना निर्लिप्त हुए सत्कर्मो के द्वारा सांसारिक यात्रा पूरी करनी चाहिए। एकत्व भावना अर्थात प्राणी को जन्म के बाद अकेले ही संसार रूपी वन में भटकना होता है इसलिए आसक्ति नहीं पालनी चाहिए। अन्यत्व भावना का अर्थ है कि जगत में कोई भी संबंध स्थिर नहीं है। यहां तक कि माता-पिता, पत्नी व खुद की संतान भी सदैव साथ नहीं रह सकती। अशुचि भावना का अर्थ है रुधिर, वीर्य आदि से उत्पन्न यह शरीर मल-मूत्र आदि से भरा हुआ है। अत: इस पर गर्व करना अनुचित है। अस्तव भावना यानी जिस प्रकार छिद्र युक्त जहाज जल में डूब जाता है उसी प्रकार जीव भी अपने कर्मो के परिणामों के अनुसार इस भव सागर में डूबता, उतराता रहता है। निर्जरा भावना का अर्थ है पूर्व कर्मो को तपस्या द्वारा क्षय करना ही मानव जीव का प्रमुख कर्तव्य है। इन बारह भावनाओं के माध्यम से महावीर जी समाज का उद्धार कर सकने में समर्थ हो सके।

पूनम नेगी

This Post Has One Comment

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu
%d bloggers like this: