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सन २०१८ आरंभ हो चुका है. देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को नए वर्ष की पूर्व संध्या पर नया नेतृत्व प्राप्त होनेवाला है. यह नया नेतृत्व राहुल गांधी का ही है. लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधान सभा चुनावों में लगातार होती दारुण पराजय के दुःसह अनुभवों ने उन्हें बहुत कुछ सीखा दिया है. ‘सफलता जैसी सफलता और कोई नहीं होती’ यह कहावत हम जानते हैं. लेकिन राहुल के बारे में कहना होगा कि ‘विफलता जैसी सफलता और कोई नहीं होती.’ क्योंकि, एक से बढ़कर एक विफलताओं के बाद भी उन्हें कांग्रेस जैसे ऐतिहासिक दल की अध्यक्षता प्राप्त हो रही है. यह दुनिया का एक आश्चर्य ही है. अब तक जहां-जहां कांग्रेस की पराजय हुई वहां-वहां संजय निरूपम, राज बब्बर, अजय माकन जैसे स्थानीय नेताओं ने पराजय की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पदों से इस्तीफे की पेशकश की है. लेकिन राहुल को यह नियम लागू नहीं है. वे उपाध्यक्ष पद से पदोन्नत होकर अध्यक्ष नियुक्त हो गए हैं.
 

 
 
दादाभाई नौरोजी, बद्रुद्दीन तैयबजी, फीरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले, सरोजिनी नायडु, मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे दिग्गजों ने जिस कांग्रेस अध्यक्ष पद जिम्मेदारी वहन की थी, उसका भार अब राहुल गांधी के कंधों पर है. १९५२ के पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने ३६४ सीटें पाई थीं, जो १९८४ में ४१४ तक बढ़ गईं; लेकिन २०१४ के चुनावों में वह ४४ सीटों पर सिमट गई. वस्तुतः कांग्रेस तो एक आंदोलन था. कांग्रेस के नेतृत्व में लाखों युवाओं ने जान की बाजी लगाकर आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया. लगभग छह दशकों तक केंद्र व अधिकांश राज्यों में सत्ता में रही कांग्रेस अब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. २०१४ के लोकसभा चुनावों के बाद से उसमें हो रही टूटफूट थमने का नाम नहीं ले रही है. १९७७ के आपातकाल के बाद भी देश के जनमानस पर कांग्रेस का प्रभाव कायम था. इसी कारण १९८० में कांग्रेस को फिर सत्ता मिली. लेकिन अब तो देश की जनता कांग्रेस से छितरने लगी है. क्या इस संकट से कांग्रेस पुनः उबर पाएगी? यही कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समक्ष सब से बड़ा प्रश्न है. वास्तव में कांग्रेस की परेशानी बाहर और कहीं नहीं, उसके भीतर ही है. उसका शीर्ष नेतृत्व और वर्तमान में अध्यक्ष बने राहुल गांधी इसका कारण है.
 
अनेक कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मन को यह प्रश्न सल रहा है कि राहुल गांधी का नेतृत्व कौशल साबित होने के पूर्व ही उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में थोपने की जल्दबाजी क्यों हुई? राहुल गांधी के अजीबोगरीब कामकाज की सर्वत्र चर्चा होती रहती है. राजनीतिक गंभीरता के तेवर उनमें अब तक दिखाई नहीं दिए हैं. किसी विषय पर पांच-दस मिनट बोलने के अलावा उनकी कोई संसदीय पटुता दिखाई नहीं देती. उन्होंने अब तक एक भी बार कृषि, आर्थिक, सामाजिक, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर दीर्घ भाषण नहीं किया है. जो विषय सामने आता है उस पर वे नौसिखिए राजनेता की तरह अपनी उथली प्रतिक्रिया ठोंक देते हैं. एक बार कोई मुद्दा हाथ में लें तो उसे अंजाम तक पहुंचाने का कौशल उनके पास नहीं है. इसे हम निरंतरता का अभाव कह सकते हैं. राहुल गांधी की बचकानी छवि बन चुकी है. इसी कारण कांग्रेस में भी राहुल गांधी के बारे में भरोसे का माहौल दिखाई नहीं देता. उनके उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए कांग्रेस कहीं भी नहीं पनपी है. आस्तीनें चढ़ाकर बोलने का उनका ढंग लोगों को नहीं सुहा रहा है. इसी कारण भारतीय जनता उन्हें गंभीरता से नहीं ले रही है. यह उनका नकारात्मक पक्ष ही है. अध्यक्ष बनने के बाद उनकी इस छवि को वे किस तरह मांजते हैं यह तो समय ही बताएगा.
 
रामचंद्र गुहा का नाम आप जानते ही होंगे. इतिहास और वर्तमान का वास्तविक आकलन करनेवाले देश में जो चुनिंदा लोग हैं उनमें उनका शुमार है. उनका जिक्र इसलिए आया क्योंकि उन्होंने हाल के दो दशकों में कांग्रेस के फिसलते ग्राफ का सटीक विश्लेषण किया है. उनका सवाल है कि ‘कांग्रेस आखिर गांधी-नेहरू घराने पर इतनी निर्भर क्यों हैं?’ वैसे उन्होंने साफ कर दिया है कि गांधी-नेहरू घराने का करिश्मा अब खत्म हो चुका है. जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गांधी ने कितना कुछ काम किया यह नई पीढ़ी के मतदाताओं को याद रहने का कोई कारण नहीं है. युवा पीढ़ी को घरानेशाही या विरासत जैसी बातों में अब रुचि नहीं है. इंदिरा गांधी ने १९७५ के बाद कांग्रेस को अपनी पारिवारिक दुकान के रूप में तब्दील कर दिया था. तब से कांग्रेस में परावलम्बन की संस्कृति निर्माण हुई है. कांग्रेस नेताओं के मन में यह भावना पक्की बैठ गई है कि गांधी-नेहरू परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी जिंदा ही नहीं रह सकती. पार्टी को जोड़े रखने के लिए इस घराने की जरूरत है. सोनिया गांधी ने भी अध्यक्ष बनते ही अपने पुत्र राहुल को राजनीति में उतारने के लिए तत्परता से पांसे फेंकने शुरू कर दिए. लेकिन अब माहौल बदल चुका है. अब मतदाताओं में सोनिया गांधी के प्रति पहले वैसा अपनत्व दिखाई नहीं देता.
 
वैसे भी कांग्रेस में नेतृत्व का वाकई संकट पैदा हो गया था. सोनिया गांधी और राहुल गांधी के रूप में दो सत्ता केंद्र बन गए थे. राहुल गांधी चलनेवाला सिक्का नही था; अतः प्रियंका गांधी को आगे लाने की मांग उठती रही. सोनिया नहीं चाहती थीं कि प्रियंका चमके और राहुल का नेतृत्व फीका पड़ जाए. जैसे ही प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने का माहौल बनने लगा उनके पति राबर्ट वाड्रा का ‘करतब’ उजागर होने लगा.
 
पिछले दो दशकों में कांग्रेस पराजय पर पराजय झेल रही है. यह सच है कि, दो-चार पराजय से कोई भी राजनीतिक प्रवाह या विचारधारा खत्म नहीं होती. अतः कांग्रेस खत्म हुई या कांग्रेस की विचारधारा विलुप्त हो गई यह मानने का कोई कारण नहीं है. असल में कांग्रेस के समक्ष नेतृत्व का संकट है. यह सब जानते हैं कि जहाज डूबने लगे तो सबसे पहले चूहों को पता चलता है और वे जहाज से बाहर कूदने लगते हैं. कांग्रेस का भी वैसा ही हुआ है. डूबते जहाज से छलांग लगानेवालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. २०१४ के चुनाव में मात्र ४४ सीटों पर सिमटते ही कांग्रेस के भविष्य के बारे में चर्चा आरंभ हो गई. आपातकाल के बाद भी कांग्रेस की इतनी दयनीय हालत नहीं हुई थी. १९८९ के चुनाव अर्थात रामजन्मभूमि आंदोलन के बाद से कांग्रेस का तेजी से र्हास होने लगा. उसे तीन बार सत्ता हासिल करने में कामयाबी जरूर मिली, लेकिन हर बार उसे अपने मित्र-दलों से सहायता लेनी पड़ी. २००९ के चुनावों का अपवाद छोड़ दिया जाए तो १९९६ से कांग्रेस डेढ़ सौ सीटें भी नहीं पा सकी. राज्य स्तर पर सोचें तो सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस का सुपड़ा साफ हो गया. पश्चिम बंगाल में १९७५ से पहले माकपा और अब ममता बैनर्जी कांग्रेस को सिर उठाने नहीं दे रहे हैं. दक्षिण में कर्नाटक छोड़ दिया जाए तो अन्य राज्यों में कांग्रेस के लिए वीरानी है. गुजरात में तो १९९५ से भाजपा ही सत्ता में है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले डेढ़ दशकों से कांग्रेस विपक्ष में बैठ रही है. ओडिशा में बीजू पटनायक का राज है. राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, केरल, हिमाचल प्रदेश में कभीकभार उसे सत्ता मिलती रही है. पूर्वोत्तर में भी कांग्रेस को नकारा जा रहा है. कुल मिलाकर पिछले २५ वर्षों में कांग्रेस का ग्राफ उतार पर ही है एवं इस गिरावट में और तेजी आने की स्थिति है. सोनिया और राहुल घराने के कर्तृत्व पर मिली विरासत को सम्हाल नहीं पाए और कांग्रेस की ताकत को ३१४ सीटों से ४४ सीटों तक उतारने का पराक्रम उनके नाम हो गया. ऐसी परिस्थितियों में राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष पद की बागडोर संभालनेवाले हैं.
 
कांग्रेस नेताओं में तो राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने की कल्पना से ही भय व्याप्त है. इसका संकेत कांग्रेस के भीतर हो रही हलचलों से मिल जाता है. लिहाजा, दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के परिपक्व नेता ने पहले ही यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि ‘कांग्रेस को सर्जरी की आवश्यकता है.’ लेकिन करेगा कौन ऐसी सर्जरी? किसमें इतना दम था कि राहुल गांधी को नकार दे? इसलिए सर्जरी तो रह गई. पराजय, नैराश्य और घरानेशाही की बीमारी और बढ़ती गई और ऐसी गिरती-उठती कांग्रेस के राहुल गांधी अब राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं. राहुल गांधी की कार्यशैली के बारे में सवाल बने हुए ही हैं और उनके जवाब नहीं मिले हैं.
 
यह सब जानते हैं कि राहुल गांधी सलाहकारों द्वारा लिखकर दिए गए भाषण पढ़ते हैं और उनमें तथ्यों का अतापता नहीं होता. इस बड़बोलेपन पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी उन्हें फटकार लगाई है. संघ पर गांधी हत्या का झूठा आरोप गढ़कर उन्होंने एक बार फिर हौवा खड़ा करने की साजिश की. इस भाषण की देश की जनता ने ही नहीं, न्यायालय ने भी भर्त्सना की है. उनका एक और मसालेदार भाषण कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में हुआ. इसमें उन्होंने यह कहकर सनसनी फैला दी कि भारत घरानेशाही पर ही चलता है. समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, द्रमुक के स्तालिन, अभिषेक बच्चन, अनिल व मुकेश अंबानी आदि की मिसालें भी उन्होंने दीं. उन्होंने कहना था कि घरानेशाही के नाम पर उन्हें अकेले को ही दोषी न करार दिया जाए. घरानेशाही के कारण ही वे राजनीति में आए इसे उन्होंने अपरोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया और स्पष्ट किया कि उनके माता-पिता, दादी ये सभी घरानेशाही के कारण ही सर्वोच्च पद पर पहुंचे. अब इन शब्द-सुमनों के कारण कांग्रेस के अग्रणी नेताओं की क्या हालत हुई होगी, यह वे ही जाने.
 
दिल्ली यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं से मिले तो राहुल गांधी की विद्वत्ता के बारे में एक किस्सा बढ़ाचढ़ाकर बताया जाता है. एक बार राहुल गांधी उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से पार्टी संगठन को मजबूत बनाने के बारे में चर्चा कर रहे थे. चर्चा अचानक पर्यटन की ओर मुड़ गई. राहुल ने रावत से कहा कि कुलू-मनाली में बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं. वहां अच्छी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए. कुलू-मनाली हिमाचल प्रदेश में आता है, फिर वे उन्हें क्यों सुविधाएं मुहैया करने के लिए कह रहे हैं इसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत समझ नहीं पा रहे थे. फिर भी राहुल गांधी कुलू-मनाली की ही बात करते रहे. तिस पर सिर खुजाते हुए रावत ने कहा, ‘‘आप कहते हैं वह सही है. मैं आपका संदेश हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह तक पहुंचाता हूं.’’ यह इशारा भी राहुल गांधी समझ नहीं पाए. कुलू-मनाली की रट जारी ही थी. अंत में रावत को साफ तौर पर कहना पड़ा कि ‘‘कुलू-मनाली उत्तराखंड में नहीं, हिमाचल प्रदेश में आता है.’’
 
यह सुनते ही राहुल गांधी इतने शर्मिंदा हुए कि कुलू-मनाली पुराण उन्होंने रोक दिया और चर्चा बीच में ही छोड़कर रास्ता नाप लिया. अब यह किस्सा कितना सच है या कितना झूठ है यह तो राहुल बाबा और रावत ही जाने, लेकिन दिल्ली में इस किस्से की बड़ी चर्चा होती है. सोनिया और राहुल के बारे में दूसरी चर्चा है फोतेदार के पुस्तक की. फोतेदार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निकट सहयोगी और कांग्रेस के ‘थिंक टैंक’ रहे हैं. उनकी ‘द चिनार लीव्ज’ पुस्तक प्रकाशित हुई है. इसमें उन्होंने सोनिया और राहुल की आलोचना की है. उनका कहना है कि ‘देश की जनता राहुल गांधी का नेतृत्व कभी स्वीकार नहीं करेगी.’ फोतेदार परदे के पीछे रहकर कांग्रेस के लिए रणनीति बनाते रहे हैं. उन्होंने कांग्रेस का स्वर्ण काल देखा है. ऐसा व्यक्ति अपनी भावना सार्वजनिक रूप से व्यक्त करता है, इससे उनकी वेदना प्रकट होती है और आनेवाले दिनों का संकेत भी मिलता है.
 
कांग्रेसजनों के अलावा देश के समक्ष भी यह प्रश्न है कि क्या राहुल गांधी का नेतृत्व पार्टी को संवारेगा? अगले दो वर्षों में लोकसभा के चुनाव हैं. तब तक कांग्रेस को संगठित रूप में खड़ा करना होगा. पार्टी के परम्परागत मतदाता याने मुस्लिम, दलित, आदिवासी कांग्रेस से छितरने लगे हैं. घोटालों, भ्रष्टाचार के कारण मध्यमवर्गीय मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति आज भी रोष है. समाज के महत्वपूर्ण घटकों को जोड़े बिना कांग्रेस के लिए सत्ता के द्वार नहीं खुलनेवाले हैं. राहुल गांधी का नेतृत्व उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश जैसे बड़े हिंदीभाषी राज्यों में स्वीकार्य नहीं है, जहां कि लोकसभा की १५० सीटें हैं. पार्टी के कार्यकर्ताओं में उदासीनता है. उनमें विविध आंदोलनों के जरिए जान फूंकनी होगी. कार्यकर्ताओं और लोगों के बीच कांग्रेस को पहुंचाने की बड़ी चुनौती राहुल गांधी के समक्ष है. कांग्रेसमुक्त भारत के एजेंडे के साथ जनता ने मोदी को सत्ता सौंपी है. ऐसे समय में ऐतिहासिक पार्टी के रूप में कांग्रेस की ओर देखें तो लगता है कि उसका ऐतिहासिक कार्य अपनी जगह है परंतु सच यह है कि पिछले तीन दशकों में पार्टी में सक्षम नेतृत्व पैदा नहीं हो पाया है. जनसाधारण में ऊर्जा निर्माण करनेवाले नेतृत्व की आवश्यकता होने के बावजूद राहुल गांधी जैसा नेतृत्व ऐतिहासिक विरासत रखनेवाली कांग्रेस को मिले यह उसका दुर्भाग्य है या सौभाग्य यह तो समय ही तय करेगा. राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का कारण उनकी लोकप्रियता नहीं है, बल्कि कांग्रेस नेताओं की गांधी-नेहरू घराने के प्रति भक्ति और निराशावादी वृत्ति जिम्मेदार है.
 
यह अंदाजा लगाना कठिन है कि क्या कांग्रेस फिर से उठ खड़ी होगी और हो भी जाए तो किस रूप में और किसके नेतृत्व में होगी? ऐसे प्रश्न पहले भी उठे हैं. १३० साल पुरानी यह पार्टी खत्म होते-होते फिर से उठ खड़ी हुई है. कभी कभी बड़ा नेतृत्व विलुप्त हो जाने के बाद भी यह पार्टी उठ खड़ी हुई है. मिसाल के तौर पर नेहरू के बाद इंदिरा गांधी याने ‘गूंगी गुड़िया’ सत्ता में आई. लेकिन उनके नेतृत्व में कांग्रेस फलीफूली. कांग्रेस का सत्ता की परिधि से बाहर हो जाने जैसा माहौल कई बार पैदा हुआ लेकिन वह पुनः सत्ता के घेरे में आ गई. आपातकाल और बाद का कालखंड यही बताता है. कांग्रेस में प्रचंड विकृतियां हैं, लेकिन पार्टी के प्रति भारतीय जनमानस में कृतज्ञता का भाव है.
 
रामचंद्र गुहा जैसे प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक ने तो राहुल गांधी कटु लगनेवाली चेतावनी दे दी है. उनका कहना है कि चूंकि राहुल का जमा का कोई पक्ष नहीं है इसलिए वे अब शादी करें और शांति से जीवन बिताये. यह टिप्पणी भले कड़वी लगे लेकिन इससे राहुल गांधी के समक्ष चुनौतियों की तीव्रता का अंदाजा लग जाता है. मुद्दा यह है कि एक जमाने में शक्तिशाली रही कांग्रेस पार्टी की अब कोई खैर नहीं है. पार्टी को संजीवनी देनेवाले नेतृत्व की आवश्यकता होने के बावजूद राहुल गांधी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं. स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद कांग्रेस को विसर्जित करने का महात्मा गांधी ने सुझाव दिया था. इस सुझाव पर अमल करने की दिशा में राहुल गांधी का मार्गक्रमण न हो यही शुभेच्छाएं!

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