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     ग्लेनकनियन

 

मंजिल के संकल्प को साधना है तो फिर शिकायत एवं बहाने नहीं करना चाहिए। शिकायत एवं बहाने बनाने वालों को मंजिलें हासिल नहीं होतीं।

यूरोप के एक परिवार मे मात्र तीन प्राणी थे। एक तो थी पति से परित्यक्त मां एवं उसके दो अबोध उम्र के पुत्र। पति से परित्यक्त होने के कारण मां को अपना एवं पुत्रों का पालन-पोषण करने हेतु नौकरी पर जाना पड़ता था। दोनों बच्चे पढ़कर स्कूल से आए परंतु मां काम की व्यस्तता से घर नहीं आ पाई थी। बच्चे भूख से व्याकुल हो रहे थे. अतः उन्होंने भूख मिटाने के लिए दूध को गर्म करने को चूल्हा जलाने हेतु मिट्टी के तेल के बजाय नासमझी मे पेट्रोल डाल दिया। तीली से ज्यों ही आग जलानी चाही पेट्रोल ज्यादा गिरने से आग एकदम भभक पड़ी एवं उसमें बच्चों के कपड़ों ने भी आग पकड़ ली। बड़ा लड़का जिसने आग हेतु माचिस से तीली जलाई थी वह तो आग में पूरी तरह झुलस कर वहीं चल बसा। दूसरा छोटा भाई भी आग से काफी झुलस गया। उसका शरीर बदसूरत तथा पांव, चमड़ी जल जाने से लकड़ी की तरह हो गए।

इलाज हेतु अस्पताल मे भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उसका जीवन तो बचा लिया, परन्तु अस्पताल से छूटने पर वह पहियेदार कुर्सी का मेहमान बनकर घर लौटा। मां बहुत समझदार एवं बच्चा बड़े धैर्य तथा संकल्प का धनी थी। मां ने कहा- बेटा, दुर्घटना किसी के भी जीवन में घटित हो सकती है। हमें साहस से काम लेना चाहिए एवं हिम्मत रखकर जीवन निर्माण में लग जाना चाहिए। बेटे ने कहा- मां, तुझे किसने कह दिया कि मैं साहस खो बैठा हूं। मुझ में अदम्य साहस अभी भी ठाठें मार रहा है। मां, तुम चिंता मत करो। यदि तेरा असली पुत्र हूं तो तुम विश्वास रखो कि मैं स्वयं को कुछ बनाकर ही दम लूंगा।

वह बच्चा जैसा डाक्टरों ने कहा, उनके निर्देशों का पालन करते हुए, हीनता के भाव को पास भी फटकने नहीं देकर बैसाखियों के सहारे पढ़ा-लिखा एवं उसने एम. ए. तथा पीएच. डी. की। और तो और विकलांगों की दौड़ में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया।

सिर्फ इतना ही नहीं, उसने अपने साहस तथा अथक परिश्रम के बल पर विश्वविद्यालय के निदेशक के पद को सुशोभित किया। अमेरिका के इस श्रम साधक़ साहसी एवं संकल्प के धनी व्यक्ति का नाम था ग्लेनकनियन।

द्वितीय विश्वयुद्ध में यह सेनानी वीर बहादुर युद्ध के दौरान फौज का अफसर बनकर मोर्चे पर गया एवं विजयश्री का वरण करके अपने स्वदेश लौटा। अपनी समस्त जमा पूंजी से उसने विकलांगों तथा अपाहिजों के कल्याणार्थ ट्रस्ट निर्माण कर एक आश्रम खोला, जहां आज भी आठ हजार विकलांग स्वावलम्बन का शिक्षण तथा प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने पांवों पर खड़े होने के यज्ञ में अपनी आहुति प्रदान कर रहे हैं। तभी कहा है-

करत करत अभ्यास से जड़मति होत सुजान।
रसरि आवत जात है सिल पर पड़त निशान॥

दृढ़ संकल्प ही सफलता का सोपान हैं।
एक संस्कृत सूक्ति है- शनैः पंथा शनैः पंथा शनैः पर्वत लंघनम्। अर्थात धीरे-धीरे चलकर पर्वत तक को लांघा जा सकता है। बस चाहिए मात्र संकल्प। साहस एवं तद्नुकूल श्रम करने की क्षमता। सफलता का यही मूल मंत्र है कि जो चलते हैं वे पहुंचते हैं। एक शायर ने कहा है-

जिनको है पहुंचना शिकवे नहीं करते।
शिकवों में जो उलझते हैं पहुंचा नहीं करते॥

अर्थात मंजिल के संकल्प को साधना है तो फिर शिकायत एवं बहाने नहीं करना चाहिए। शिकायत एवं बहाने बनाने वालों को मंजिलें हासिल नहीं होतीं।

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