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अनेक राजनीतिक दलों ने घोषणापत्र प्रकाशित नही किये
अनेक दलों जैसे मायावती की बहुजन समाज पार्टी, ममता बॅनर्जी की तृणमुल कांग्रेस सहित अनेक दलों ने अभी तक अपने घोषणापत्र जारी नही किये हैं। उन्हे शायद यह सुविधाजनक नही लगता। चुनाव सभाओं में हम जो बोलेंगे वही हमारा घोषणापत्र होगा यही उनका मानना होगा। अन्य सभी दलों पर टीका-टिपण्णी करने का उन्हे अधिकार है परंतु वे राष्ट्रहित के लिये क्या करना चाहते हैं इस विषय में बोलने बताने की क्षमता उनके पास नही है। अनेक निर्दलीय उम्मीदवार, वे किन राष्ट्रीय नीतियों का समर्थन करते हैं यह बताने तैयार नही हैं।
इस लेख में विभिन्न राजनीतिक दलों ने देश की सुरक्षा हेतु क्या घोषणायें की हैं, केवल इसका विश्लेषण किया जायेगा।
समाजवादी दल के घोषणापत्र में अहिर रेजीमेंट तयार करने की बात लिखी गई है। अपने मतदाताओं को खुब करने हेतु एक अलग रेजीमेंट तयार करना परंतु कश्मीर के विषय में, पाकिस्तान के विषय, माओवाद का मुकाबला करने हेतु क्या नीति है इसके विषय में घोषणापत्र चुप है।
कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में केवल दो नकारात्मक बातों का उल्लेख है। वह याने हम अणुबम का इस्तेमाल नही करेंगे एवं अंतरिक्ष का उपयोग युध्द के लिये नही करेंगे। परंतु राष्ट्र की सुरक्षा के विषय में मौन है।
भाजपा का राष्ट्रीय सुरक्षा पर बल
भाजपा के संकल्प पत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर दिया गया है। पूर्वोत्तर की घुसपैठ से लेकर काश्मीर में आतंकवाद तक समस्याओं पर सरकार आक्रामक नीति अपनायोगी ऐसा आश्वासन दिया गया है।
काश्मीर के संदर्भ में धारा 370 एवं 35अ को हटाना, आतंकवाद के विरोध में शुन्य सहनशीलता (नशीे ीें श्रशीरपलश) की नीति, पूर्वोत्तर में घुसपैठ रोकना, नागरिकता विधेयक को पास कराना जैसे आश्वासन आक्रामक तरीके से घोषणा पत्र में लिखे गये हैं। सेना का आधुनिकीकरण करने की बात भी कही गई है। भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय में सुस्पष्ट विचार करती है एवं केंद्र में पुन: सरकार आने पर राष्ट्रीय सुरक्षा के संबध में कोई समझौता नही किया जायेगा ऐसा कड़ा संदेश इस संकल्प पत्र में दिया गया है। सरकार के पहले कार्यकाल में काश्मीर या पूर्वोत्तर के संबध जो कडे करम नही उठाये गये उन्हे, यदि दुसरा कार्यकाल मिला, तो पूरी आक्रामकता के साथ उठाया जायेगा यही यह घोषणापत्र सूचित करता है।
कांग्रेस का घोषणापत्र देश की सुरक्षा हेतु घातक?
कांग्रेस ने देश की सुरक्षा पर घोषणापत्र हेतु नॉर्दन कमांड के रिटा.आर्मी कमांडर जनरल हुड्डा की मदद ली थी। परंतु जनरल हुड्डा द्वारा दिये गये मुद्दों को, ऐसा लगता है, इस घोषणापत्र में शामिल नही किया गया। कांग्रेस ने जो आश्वासन दिये हैं वे देश की सुरक्षा के लिये घातक हैं।
घोषणापत्र में जम्मू-काश्मीर में सशस्त्रबलों की तैनाती के संबध में पुर्नविचार, काश्मीर घाटी में सेना एवं केन्द्रीय अर्ध सैनिक बलों की उपस्थिति कम करना, कानून-व्यवस्था ठीक रखने हेतु जम्मू-काश्मीर पुलिस को अधिक जबाबदारी देने के आश्वासन दिये गये है।
वर्तमान में क्या राज्य पुलिस आंतकवादियों के खिलाफ अकेले पड़ सकती है क्या? निश्चित ही नही। ऐसे में आंतकियों के विरोध में केवल राज्य पुलिस का उपयोग अत्यंत आत्मघाती करम होगा।
जम्मू-काश्मीर के लोगों से बिनाशर्त बातचित के लिये नागरिकों में से तीन चुने हुए वार्ताकारों की नियुक्ति करने की बात कही गई है। ऐसी ही एक कमेटी पिछली सरकार ने भी नियुक्त की थी। इस पाडगावकर समिति करोडो रूपये खर्च कर जो निदान निकाला था वह खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसा था। तत्कालीन सरकार ने उसकी सिफारिशों को लागू करने लायक भी नही समझा। अब जो समिति बनाने की बात कही गई है वह नया क्या कर लेगी?
सेना का मनोबल करना
सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कही है वह याने सेना के विशेबाधिकार के संबध में उनकी नकारात्मक भूमिका। यह भूमिका पूर्वोत्तर या काश्मीर के अलगाववादियों को पुचकारने वाली भले ही हो परंतु यह देशहित में कदापि नही है। इससे ऐसा लगता है मानो भारतीय सेना अत्याचारी है और वह अनन्वित अत्याचार कर रही है। इस का हल्ला वे लोग कर रहे हैं जिनकी देशनिष्ठा ही संदिग्ध है। कांग्रेस की भूमिका उनका समर्थन करने वाली है।
‘अफस्पा’ देश की सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील प्रदेशों में लागू होने वाला कानून है। इस कानून से सैन्यदलों को अधिकार प्राप्त होते हैं। स्वतंत्र देश में अतिविशिष्ट परिस्थिति के सिवाय सशस्त्र दल तैनात नही किये जा सकते हैं। काश्मीर, पूर्वांचल जैसे आतंकवाद प्रभावित राज्यों में सेना की आवश्यकता अनुभव की जाती है। इसका उपयोग इतने वर्षों तक सभी कांग्रेस शासित राज्यों में किया गया, अब ऐसी क्या परिस्थिति निर्माण हो गई कि इसका उपयोग अखरने लगा? नेहरूजी के कार्यकाल में इस कानून का निर्माण किया गया था। लागालेन्ड में आतंकवादियों से निपटने के लिये यह कानून लागू किया गया। दहशतवाद का अंत सुरक्षा बलों के अलावा और कौन कर सकता है?
कांग्रेस सरीखे जिम्मेदार राष्ट्रीय दल की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबधित यह नकारात्मक भूमिका बिलकुल भी अपेक्षित एवं वांछनीय नही है।
स्वत: के पैर पर कुल्हाडी मारना
देश द्रोह का कानून रद्द करना, काश्मीर में आतंकवादियों से वार्ता, वहां से सेना हटाना अलगाववादियों और अब्दुल्ला निता- पुत्र की मांगों का समर्थन करना, कर्ज न लौटाने वालों पर फौजदारी मुकदमे दायर न करने जैसे आश्वासनों से कांग्रेस ने अपने पैर पर स्वत: कुल्हाडी मारली है। कांग्रेस के घोषणापत्र का अब्दुल्ला एवं महबुबा मुफ्ती द्वारा किया गया स्वागत यही दर्शाता है। इसके पूर्व के चुनावों में भी कभी ऐसे आश्वासन अपने घोषणापत्र में कांग्रेस के नेताओं ने नहीं दिये थे।
देशद्रोह की धारा को अपराधिक श्रेणी से हटाना
124- यह देशद्रोह की धाराअब कालबाह्य हो गई है और इसे रद्द करना चाहिए, ऐसी भूमिका कांग्रेस ने ली है। इस कानून का दुरूपयोग न हो ऐसी अपेक्षा करना तो ठीक है, परंतु एक ओर सेना का मनोबल गिराने वाली भूमिका का निर्वाह करना और दूसरी ओर देशद्रोहीयों को प्रोत्साहन देना यह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत घातक है। आतंकवादी एवं नक्सलवादियों के विरूद्ध यह कानून उपयोग में लाया जाता है। लोगों को किडे-मकोडे की तरह मार डालने की नक्सलवादी प्रवृत्ति के विषय कांग्रेस निश्चित क्या सोचती है? जो सैनिक देश की सीमा पर लड रहे हैं उनको ताकत देनी है या उनका मनोबल गिराना है? क्या देशद्रोही यह गंभीर अपराध नही है? देशद्रोह की धारा को अपराधिक कानून की व्याख्या से हटाया जायेगा क्या?कश्मीर को अलग राज्य का दर्जा देने वाली धारा 370 को हटाने का विरोध, पत्थरबाजी करने वाले काश्मीरी गद्दारों को यह राह भटके बच्चे-युवक कहकर उन्हें बचाने की प्रवृत्ती, देश के टुकडे होंगे इन्शा अल्लाह कहने को अभिव्याक्ति की आजादी के नाम पर बचाना, पाकिस्तान- बाग्लादेश-अफगानिस्तान में हो रहे अत्याचारों के कारण वहां से भागकर भारत में आने वाले हिंदू -सिख-बौद्ध इसाईयों को भारत प्रवेश की अनुमति न देना, आतंकवादियों को “जी” कहकर संबोधित क्या योग्य है?
क्या करना चाहिये?
दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों द्वारा अपने घोषणापत्रों में अलग अलग मुद्दों को केंद्र स्थान में रखा गया है। इस संदर्भ में कौनसे मुद्दे जनता को अच्छे लगते हैं एवं जनता किसपर विश्वास रखती है यह तो मतदान के दिन मतदाता बतायेगी ही, परंतु कम से कम दोनों प्रतिस्पर्धियों के प्रचार की दिशा घोषणापत्रों से अधोरेखित होती है।
जनता घोषणापत्र पढ़े। समाचार पत्र एवं टिव्हि चैनल्स दोनों घोषणापत्रों पर गंभीरता से चर्चा कराये यह अच्छा होगा। घोषणापत्र के एक दो मुद्धों को लेकर समाचार छापना यह रूकना चाहिये। पिछले घोषणापत्र की किन बातों पर अमल नहीं हुआ इसकी जानकारी जनता को देने के लिये दलों को बाह्य किया जाना चाहिये। पिछले सत्तर सालों के विभिन्न दलों के घोषणापत्र और उनमें दिये काम और आश्वासनों की पूर्ति का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिये। प्रचार में केवल एक दुसरे की कमीयां न निकालीजायें। प्रचार सभाओं में आने वाली भीड को हम निश्चित क्या बताना चाहते हैं इस पर चर्चा होनी चाहिये यही अपेक्षा है।
जिन राजनितिक दलों ने घोषणापत्र जारी नही किये है उन्हेमतदाता वोट क्यों दें? चुनाव आयोग को यह निश्चित करना चाहिये कि चुनावों की घोषणा के दो सप्ताह के भीतर दल अपने घोषणापत्र जारी करें। यह कंपलसरी किया जाना आवश्यक है जिससे उनपर चर्चा हो सके एवं मतदाता इस बात पर विचार कर मतदान कर सके कि किस दल में कौन से मुद्दे देाहित में है और कौनसे देशविरूद्ध है।

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