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ऐसे सम्पादक जिन्होने पत्रकारिता क्षेत्र को बदनाम किया……

पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है | लोकतंत्र को सक्षम करने मेंपत्रकारिता के माध्यम से उचित विचार रखना अपेक्षित है | राष्ट्र और समाज की समस्याओं को अपनी खुद की समस्या समझकर सत्य के लिए अपनी कलम के माध्यम से लड़ना अपेक्षित है, न की खुद की समस्या को राष्ट्र की समस्या बनाकर पेश करना | प्राय: पत्रकारिता में ऐसी ही कुछ प्रवृत्तीया दिखाई दे रही है |

पत्रकारिता तो वह व्रत है जो हमेशा सत्य का पक्ष ले | जो किसी भी दबाव के सामने न झुके | समाज के समस्याओं को आवाज दे और नागरिको के हित में पक्ष लेकर उनका वकील बने | सत्ता को भी सवाल पूछे | लेकिन जितना आवश्यक सवाल पूछना है, उतनाही आवश्यक सरकार के अच्छे निर्णयों का समर्थन भी करे | सवाल पूछना यह पत्रकारिता का अस्त्र है | वह पत्रकारिता की आदत न बन जाए | भारत में आज भी हिंदू, हिंदुत्व, संस्कृति, संघ और भाजप ऐसे शब्दो को तुच्छतापुर्वक दृष्टी से देखा जाता है | इसके उपरांत इन शब्दोपर प्रहारकरनेमे,आलोचना करनेमे विद्वत्ता का प्रमाण माना जाता है | क्या यह सही पत्रकारिता है ?

माना की आपको संघ, हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति, प्रधानमंत्री पसंद नहीं है |हो सकता है आप किसी विशिष्ट विचारधारा को मानते हो | लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की आप अपनी पसंद या नापसंद  लोकतंत्र की दुहाई देकर जनता पर थोपे | एक जिम्मेदार पत्रकार पत्रकारिता का ऐसा दुरुपयोग कभी भी नहीं करता | लेकीन इंडियन एक्स्प्रेस ग्रूप में जो कुछ चल रहा है उससे न सिर्फ पत्रकारिता क्षेत्र बदनाम हुआ है बल्की पत्रकारिता के मुल्यो पर आशंकाए उपस्थित की जा रही है |

२१ सितम्बर २०१८ को इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप द्वारा महाराष्ट्र मेंप्रकाशित लोकसत्ता अखबार के सम्पादकीय आलेख में झूठा लिखा गया की, अखलाख की जब हत्या होने पर सरसंघचालकजी ने उस हत्या का समर्थन किया |

इस झूठ के खिलाफ पाठको ने अखबार की कडी आलोचना की,जिसके उपरांत २२ सितंबर को विज्ञप्ती प्रकाशित की गई | जिसमे लिखा गया की, अखलाख के हत्याकी  समर्थन वाला वाक्य सरसंघचालकजी ने नही कहा बल्की संघ का मुखपत्र पांचजन्य में  प्रकाशित हुआ था |

२६ सितंबर को मुंबई के अक्षय फाटक ने इस झुठी खबर और पांचजन्य के अनुमति बिना उनका वाक्य प्रकाशित करने के विरोध में प्रेस कौन्सिल ओफ इंडिया के दफ्तर में शिकायत दर्ज की| जिसके परिणामस्वरूप २८ सितंबर कोविज्ञप्ती प्रकाशीत की गई जिसमे स्पष्ट किया गया की आलेख में प्रकाशित हुआ वाक्य सरसंघचालकजी ने नही कहा था | इसलिए हमे खेद है |

१४ नवंबर २०१८ को प्रेस कौन्सिल ओफ इंडिया द्वारा इस शिकायत की छानबीन करने के पश्चात लोकसत्ता के सम्पादक को कारण बताओ नोटीस भेजी गई |

४ दिसंबर २०१८ लोकसत्ता द्वारा प्रेस कौन्सिल को को चिठ्ठी लिखी गई और कहा गया की, हमे अंग्रेजी या मराठी में नोटीस भेजो |

इंडियन एक्सप्रेस में २१ सितंबर को करण थापर का इसी विषय पर आलेख प्रकाशित किया गया जिसमे इसी झूठे संदर्भ को दोहराया गया | लोकसत्ता ने खेद प्रदर्शित करते हुये विज्ञप्ती प्रकाशित की थी | लेकीन इंडियन एक्स्प्रेस ने ऐसी कोई भी विज्ञप्ती प्रकाशित नही की थी | जो की प्रेस कौन्सिल के Act no. 13 Under correction Guidelines (When any factual error or mistake is detected or confirmed, the newspaper should sou-motu publish the correction promptly with due prominence and withapology or expression of regrets in a case of serious lapse.) का उल्लंघन है | अक्षय फाटकजी ने प्रेस कौन्सिल में शिकायत दर्ज की और छानबीन के पश्चात २५ जनवरी २०१९ को इंडियन एक्स्प्रेस के सम्पादक को कारण बताओ नोटीस भेजी गई |

आखिरकार २९ मार्च २०१९ को प्रेस कौन्सिल के कमिटी के सम्मुख सुनवाई हुई| जिसमे शिकायतकर्ता अक्षय फाटक की ओरसे ऋतुजा जोशी जी ने कमिटी के सम्मुख बात रखी | लोकसत्ता के अभिवक्ता ने अपनी बात राखते हुये, अखबार को
सेन्सर न करने दलील की, लेकीन कमिटी द्वारा स्पष्ट किया गया की यह बात गंभीर है | जब सम्पादकीय आलेख लिखा जाता है तो उसमे प्रकाशित किये जानेवाली हर एक बात को सोच समझकर प्रकाशित करना चाहीए | छानबीन किये बिना
ही जो संदर्भ लोकसत्ता के सम्पादकीय आलेख मे प्रकाशित हुए है वह प्रकार निन्दनीय है | और ऐसे गैर जिम्मेदार कृत्यो से ही पत्रकारिता का क्षेत्र बदनाम होता है | इसकी रिपोर्ट RNI को और महाराष्ट्र सरकार को उचित कारवाई करने के लिए भेज दी जायेगी |

एक्स्प्रेस ग्रूप के पत्रकारिता से ऐसा लगता है मानो उनके मनमे यह डर है की कही ग्रूप के नापसंद नेता को जनता पसंद ना करने लगे | कितनी शर्मनाक बात है जब एक अखबार समूह किसी एक विचारधारा को बदनाम करने के लिये झूठ का सहारा लेता है | और इससे भी शर्मनाक बात है की, झूठ साबित होने पर खेद भी प्रकट नही किया जाता | क्या यही आदर्श प्रस्थापित किये जानेवाले है पत्रकारिता के क्षेत्र में ? इंडियन एक्स्प्रेस ग्रूप के सम्पादको ने इस तरह से समुचे पत्रकारिता मूल्य और इस क्षेत्र के सत्यनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित किये है |

 

पत्रकारिता ने समाज की चेतना को जागृत करना अपेक्षित है | नागरीको को तथ्यो के आधार पार जानकारी देना यह कर्तव्य है | राष्ट्र और समाजहित के लिये जन जन को नैतिक आचरण के लिये प्रवृत्त किया जाना चाहिये | लेकीन किसी आंतरिक परेशानी को लेकर एक राष्ट्रव्यापी संघटन को बदनाम करणे की कोशीश करना बौद्धिक अपराध ही है |

 

ज्ञात हो की लोकसत्ता ने सम्पादकीय आलेख मे मदर तेरेसा को संत उपाधी प्रदान करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाये थे और उनके सेवा के नाम पर चल रहे धर्मपरिवर्तन को भी उजागर किया था | लेकीन किसी दबाव में  आकर लोकसत्ता ने माफी मांगी और उस सम्पादकीय आलेख को हटा दिया था | किसी एक विशिष्ठ धर्म के प्रति लगाव और उसके लिये अन्य किसी धर्म की आलोचना यह लोकसत्ता की विचारप्रक्रिया बन गई है |

भारत के स्वर्णिम पत्रकारिता के इतिहास में लोकसत्ता की यह झुठी पत्रकारिता काला धब्बा बनकर रहेगी यह तो निश्चित है |

 

लोकसत्ता में यह पहली बार नही हुआ है, इस विषय मी तो उन्होने हद कर दी | इस अग्रलेख मे गलती से कुछ बात लिखना, और  जान बुझ कर गलती करना इसमे अंतर है | लोकसत्ता और इंडियन एक्स्प्रेस इन दोनो अखाबारो मे एक ही दिन ऐसी गलात बात प्रकाशित होना याह सिर्फ इत्तेफाक नही हो सकता | 

 

अक्षय फाटक, मुंबई  : शिकायतकर्ता 

 

                                                                                                                                                                                    प्रसाद शिवाजी जोशी 

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