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ये धरती हम सबकी साझी है। भले ही हमारी चमड़ी का रंग गोरा हो या काला, पीला हो या भूरा। हम सब एक ही हवा में सांस लेते हैं। एक ही समुद्र हमारी धरती को ठंडा रखता है। एक ही वायु मंडल हमारा अपना है। जाहिर है, घर की कोई एक दीवार भी गिरती है तो पूरी इमारत कमजोर होती है।
पूरी दुनिया एक-दूसरे से बेहद महीन धागे से जुड़ी हुई है। ऊपर तो इंसानों की अलग – अलग नस्लों की बात की गई है। लेकिन, दुनिया भर की जीव-जंतुओं की लाखों प्रजातियां, पादपों की लाखों प्रजातियां इस पूरे ईकोसिस्टम का हिस्सा है। सब एक – दूसरे पर निर्भर हैं। और इस निर्भरता का हम अभी तक पांच फीसदी भी नहीं समझ पाए हैं। यहां तक कि शेर का जीवन भी एक तितली या मधुमक्खी के जीवन पर निर्भर है। मधुमक्खी या तितली मरेगी तो शेर भी नहीं बचेगा।
जब हम युद्धों की वकालत करते हैं तो हम इसी बात को भूल जाते हैं। धरती के किसी भी हिस्से को बारूद या परमाणु हथियारों से नष्ट होने की कीमत सबको चुकानी पड़ेगी। भले ही हम उस जगह से हजारों किलोमीटर दूर रहते हों। भले ही हमारे पास उस धमाके की आवाज न पहुंचे। लेकिन, धरती की मौत होती है धीरे-धीरे। हिरोशिमा-नागासाकी इसके गवाह है। भोपाल पर अभी भी गैस कांड के दाग मौजूद हैं।

हमारी पूरी धरती साझा है। इसे ऐसे समझें कि यमन और अरब में आई आंधी की धूल भी दिल्ली के आसमान पर छा जाती है और लोगों को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। इक्वेटर पर जब पैसिफिक सागर में समुद्र बेहद गरम हो जाता है तो भारत और अफ्रीका का मानसून प्रभावित हो जाता है। इसे अल नीनो इफेक्ट कहा जाता है। समुद्र गरम तो हमारे यहां से हजारों किलोमीटर दूर होता है लेकिन मौसम पर होने वाले उसके प्रभाव के कारण सूखा हमारे यहां का किसान झेलता है। उसकी फसल मर जाती है और उम्मीदें सूख जाती हैं। 

जब आराल सागर में गिरने वाली नदियों, दो बड़ी नदियों आमू दरिया और सीर दरिया का रास्ता बदल दिया जाता है तो दुनिया की सबसे बड़ी झीलों में से एक आराल सागर सूख जाती है। आपमें से बहुत सारे लोगों ने हो सकता है कि चेर्नोबिल का नाम सुना हो। यूक्रेन में स्थित इस जगह पर सबसे घातक परमाणवीय दुर्घटना हुई थी। जिसके बाद से यहां पर हजारों एकड़ जमीन को खाली करा लिया गया है। यहां पर आज भी रेडिएशन निकलता है और वीरान जमीन पर बहुत सारे वन्यजीव रहते हैं। भेड़िए उनमें सबसे बड़े हैं। ये भेड़िए तीन सौ किलोमीटर तक की दूरी में चक्कर लगाते हैं। अब वैज्ञानिकों को डर है कि कहीं उनके जरिए यह रेडिएशन भी बाकी जगहों पर न पहुंच जाए।

यह जो तस्वीर देख रहे हैं, ये ध्रुवीय भालू और उसके बच्चे की है। मां भालू अपने बच्चे को गोद में लेकर जमीन यानी बर्फ की मोटी परत ढूंढ रही है। वे बर्फ की मोटी परत पर रहते हैं। बर्फ की मोटी परत ही उन्हें शिकार करने में मदद करती है। जब हम कुछ जलाते हैं तो यह धरती गरम होती है। हमारे वाहन चलाने से, हमारे बिजली बनाने से, हमारी तमाम गतिविधियां ऐसी हैं जो इस धरती को गरम कर रही हैं। और यह गर्मी इस ज्यादा रफ्तार से निकल रही है कि समुद्र उसे ठंडा नहीं कर पा रहे हैं। बल्कि समुद्र भी गरम हो रहे हैं। यही ग्लोबल वार्मिंग है।

इसके चलते पृथ्वी के ध्रुवों पर जमा बर्फ की मोटी परत टूट रही है। ध्रुवीय भालू और वालरस जैसे जीवों का जीवन सीधे संकट में है। माना जाता है कि अगले सौ सालों में पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर जमा बर्फ भी पिघल जाएगी।

जीना मुश्किल हो जाएगा। कुछ-कुछ वैसा ही जैसा अभी इस भालू मां और बच्चे का हो गया है।
इसलिए धरती के बारे में सोचें। उसे सचमुच मां का दर्जा दें।

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