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अपने स्कूल जाने की तैयारी करते हुए सक्षम ने मेरी ओर देखा और पूछ बैठा-‘‘बाबा, आप इतनी जल्दी कहां जाने की तैयारी करने लगे आज?’’
‘मैं? मुझे आज दिल्ली जाना है बेटा. दिल्ली से आपको कुछ मंगाना है क्या?’
‘‘नहीं बाबा, मेरे पास तो सब कुछ है, आप बस जल्दी लौट आना. शाम को खेलेंगे.’’-स्कूल ड्रैस पहनते हुए उसने मेरी ओर देखा फिर जैसे उसे कुछ याद आया, वह उत्साहित होते हुए बोला,-‘‘ आप दिल्ली जा रहे हो न? तो ऐसा करना कि वहां प्लेनेटोरियम भी देख आना. बहुत आनन्द आयेगा आपको.’’
‘अच्छा! ये प्लेनेटोरियम क्या होता है बेटा?’-मैंने अनजान बनते हुए उससे प्रश्न किया तो वह चंचलता से मेरी ओर देखकर मुस्कराने लगा,-‘‘बाबा, आपको नहीं पता प्लेनेटोरियम क्या होता है?’’
‘हां बेटा,क्या होता है प्लेनेटोरियम, आपको पता है क्या?’
‘‘बाबा, आपको तो कुछ नहीं पता.’’-अपने बांए हाथ की हथेली पर सीधे हाथ की हथेली मारते हुए सक्षम मुस्कराया,-‘‘प्लेनेटोरियम यानि कृत्रिम सौर ऊर्जा मण्डल . पता है बाबा, एक बड़े से हाल में सूरज,चन्द्रमा,सितारे और बहुत से उपग्रह दिखाये जाते हैं.’’
‘अच्छा! सूरज,चन्द्रमा और बहुत से उपग्रह भी? लेकिन ये सब एक बड़े हाल में कैसे आ सकते हैं भला.‘- मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए सक्षम की ओर देखा तो वह और उत्साहित होकर बोला,-‘‘हां बाबा, लगता है आपको तो सचमुच कुछ नहीं पता. आपको आपके टीचर जी ने नहीं पढ़ाया था इसके बारे में? देखो मैं बताता हूं आपको. जब आप दिल्ली पहुंच जाओ न तो किसी अंकल से पूछ लेना कि मुझे प्लेनेटोरियम देखने जाना है, वो रास्ता बता देंगे. और नहीं तो ऐसा करना बाबा कि आप न स्टेशन से ही आटो कर लेना. ठीक है न बाबा? जब आप प्लेनेटोरियम पहुंचेंगे न तो पहले आपको टिकट विंडो से अपनी टिकट लेनी पड़ेगी. पता है बाबा, उस टिकट पर आपके बैठने की सीट नम्बर लिखी होगी. आप उस हाल के अन्दर घुसकर अपनी सीट पर बैठ जाना. ठीक है? फिर टार्च जलाकर एक अंकल आयेंगे जो सबकी टिकट चैक करेंगे. आप उनको अपनी टिकट दिखा देना. ठीक है बाबा?’’-सक्षम लगातार बताये जा रहा था तभी मैंने बीच में टोक दिया,-
‘हां, ये सब तो ठीक है, पर वो जो मैंने पूछा था कि उस हाल के अन्दर चन्द्रमा,सितारे और अन्य उपग्रह …..वो सब कैसे आ सकते हैं, वो बात तो बताओ.’
‘‘बाबा…वही तो बता रहा हूं. आप बस सुनते जाओ. आप बार-बार टोकेंगे तो मुझे स्कूल के लिए देर हो जायेगी और बाबा, आपकी गाड़ी भी छूट सकती है. समझे?
‘समझ गया बेटा,अब फिर आप जल्दी से बता दो.’-मैंने उस नन्हे नाती की चपल बातें सुनकर मन ही मन मुस्कराते हुए चुटकी ली.
‘‘देखो जब सब लोग अपनी-अपनी सीट पर बैठ जायेंगे न, तो उस हाल में अंधेरा हो जायेगा और फिर प्रोजेक्टर चालू हो जायेगा.’’
‘प्रोजेक्टर !ये प्रोजेक्टर कहां से बीच में आ गया अब? आप तो ग्रह-उपग्रह की बात बताने जा रहे थे .’
‘‘देख लो फिर से टोक दिया बाबा.’’-सक्षम तिरछी नजर से मेरी ओर मुस्कराया,-‘‘मैं वही तो बता रहा हूं आपको. ये जो प्रोजेक्टर होता है न, इसी में से सभी ग्रह-उपग्रह यानि प्लेनेट निकलकर स्क्रीन पर दिखाई देते हैं. अब समझ गये न बाबा?’’
‘नहीं समझा.’-मैंने अज्ञानता प्रकट करते हुए कहा तो सक्षम ने अपने सीधे हाथ की चारों उंगलियों को अपने माथे पर हल्के से मारते हुए मेरी ओर देखा,-‘‘ओफ्फो, बाबा आपने हाल के अन्दर कभी मूवी देखी है?’’
‘हां, देखी तो है.’
‘‘तो फिर आप ये समझ लो कि जैसे पिक्चर हाल में सामने लगी स्क्रीन पर जो मूवी दिखाई देती है, वह प्रोजेक्टर से ही तो चलाते हैं. ऐसे ही प्लेनेटोरियम का जो प्रोजेक्टर होता है न बाबा, वह थोड़ा अलग तरह का होता है. उसमें सभी प्लेनेट अलग-अलग दिशाओं में घूमते हुए दिखाई देते हैं. बिल्कुल सचमुच के आसमान की तरह. बहुत आनन्द आता है बाबा, आप देखना.”
‘अच्छा!’
‘‘हां, आप जरूर देखना. और एक और मजेदार बात बताऊं बाबा?’’
‘हां-हां बताओ.’’
‘‘जैसे ही उस हाल के अन्दर अंधेरा होता है न और रात का सीन चालू होते ही तारे टिमटिमाने लगते हैं तो बहुत सारे लोग तो देखते ही देखते, रात समझ कर सो जाते हैं अपनी कुर्सियों पर.’’
‘अच्छा आप भी सो गये थे क्या?’
‘‘नहीं……” -सक्षम ने शरमाते हुए तिरछी नजर से मेरी ओर देखा फिर शरारत से बोला,-‘‘हां आप भी मत सो जाना बाबा.’’
‘ठीक है, नहीं सोऊंगा. प्लेनेटोरियम देखने के बाद फिर और क्या चीज देखूं?’-मैंने सक्षम को कुरेदा तो अपने मोजा पहनते हुए मेरी ओर देखने लगा,-‘‘जब आप प्लेनेटोरियम देख लो और आपके पास टाइम और हो बाबा तो फिर आप ऐसा करना कि रेल म्यूजियम भी देख आना.’’
‘रेल म्यूजियम भी है दिल्ली में?’
‘‘और नहीं तो क्या. इसका मतलब ये हुआ बाबा कि अभी तक आपने रेल म्यूजियम भी नहीं देखा है.’’
‘हां बेटा, देखा तो नहीं है. आपने देखा है? क्या होता है रेल म्यूजियम में?’-मैंने धीरे से मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा. मेरी अज्ञानता पर सक्षम ठहाकर हंस पड़ा,-‘‘उल्लू बना रहे हो मुझको.’’
‘नहीं बेटा, उल्लू नहीं बना रहा. सच्ची-मुच्ची में नहीं देखा.’
‘‘बाबा…….. मैं फाइव ईयर्स का हूं तो भी मैंने दिल्ली में इतनी सारी चीजें देख लीं और इसका मतलब ये हुआ कि आप अपने मम्मी-पापा के साथ कहीं जाते ही नहीं थे क्या? या आप शरारत करते थे इसलिए आपके पापा आपको कहीं ले नहीं जाते थे?’’
‘हां बेटा, अब आप बता दो तो देख आऊंगा.’-मैंने उसे उकसाया तो उत्साह में भरकर वह बताने लगा-‘‘देखो बाबा, जब आप रेल म्यूजियम देखोगे न, तो एकदम हैरान रह जाओगे. रेल म्यूजियम में स्टीम,डीजल और इलैक्ट्रिक सभी तरह के बहुत बड़े-बड़े और असली इंजन रखे हुए हैं. और बाबा, बहुत सारे तरह-तरह के स्टेशन भी दिखाई दे्रगे.’’
‘अरे वाह, फिर तो आनन्द आ जायेगा.’
‘‘हां, और बताऊँ बाबा? वहां पर टाय ट्रेन और जाय ट्रेन भी हैं जो चलती भी हैं. इतना ही नहीं, रेल म्यूजियम में क्विज भी है. अगर आप सारे गेम्स के सही-सही जबाव दे दोगे न, तो आप जीत जाओगे. ठीक है बाबा, जीत कर आओगे न? प्रोमिज .’’
‘हां बेटा, प्रोमिज.’
‘‘ठीक है बाबा, अब मैं स्कूल जाता हूं. फिर कभी आपको और ढेर सारी बातें बताऊंगा.’’-मेरी तरफ देखते हुए सक्षम ने सबके पैर छूए और अपने स्कूल-वाहन में बैठ गया.
’’’
डा.दिनेश पाठक‘शशि’
28,सारंग विहार,मथुरा-6
मोबा.-9412727361

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