हिंदी विवेक : we work for better world...
 

 
वर्ष 2013 में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से करीब 30% या कुल 162 सदस्यों के खिलाफ देश के विभिन्न थानों में आपराधिक मामले दायर थे, वहीं 14% सदस्य ऐसे थे, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दायर थे. वहीं बात अगर राज्य विधानसभा की करें, तो यहां भी देश भर की विधानसभाओं के कुल 4032 सदस्यों में से 30% या 1258 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे, जबकि 14% सदस्यों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दायर थे. इनमें बिहार की मधेपुरा विधानसभा सीट से विजयी रहे पप्पू यादव, सिवान से पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन, फैजाबाद की बीकापुर विधानसभा सीट से सपा के विधायक मित्रसेन यादव,झारखंड के नेता शिबू सोरेन आदि जैसे दिग्गज अपराधी शामिल हैं.वर्ष 2014 के चुनाव के दौरान 1581 उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किये गये. इन लोगों पर हत्या, किडनैपिंग, जबरन वसूली, रेप आदि जैसे न जाने कितने और कैसे-कैसे चार्जेज लगे हैं. ऐसे में इन्हें ‘जनप्रतिनिधि’ कहना या जनप्रतिनिधि की उपाधि से नवाजना अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने जैसा है. जो लोग अपने फायदे या मजे के लिए किसी का भी हक छीनने या उसकी जान लेने से भी नहीं हिचकते, उनसे लोकतंत्र के रक्षा की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है.
लोकतंत्र का मूलमंत्र है- सबका, सबके द्वारा और सबके लिए. अर्थात वैसा शासनतंत्र जो लोगों का है और उसे लोगों के हित में लोगों द्वारा ही बनाया जाये, जबकि इन जनप्रतिनिधियों का मूलमंत्र होता है- मेरे द्वारा, मेरे लिए और मेरे ही हित में. अत: ऐसे लोगों से यह उम्मीद भी कैसे की जा सकती है कि वे जब लोकसभा या राज्य विधानसभा में निर्वाचित होकर जायेंगे, तो आम जनता के हित में फैसले लेंगे. अब समय आ गया है कि ऐसे आपराधिक जनप्रतिनिधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाये. इसी में देश का, लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था का और इस देश का नागरिकों का हित है.
                                                                                                                                                    प्रियदर्शिनी

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu