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दुनिया भर में सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा हिन्द महासागर में फेंका जा रहा है। इसके चलते हिन्द महासागर में प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा पैच बन गया है। समुद्र में बहते प्लास्टिक कचरे के लगभग 22 हजार अवक्षेपों के बारे में उपग्रहों से मिले डाटा के आधार पर ऑस्ट्रेलिया की एक शोध संस्था ने यह निष्कर्ष निकाला है।

इंसान ने सबसे पहले पत्थर, हड्डियों और सींगों से अपने काम की चीजें बनाने की शुरुआत की। इसके बाद उसने यही काम लकड़ी और मिट्टी से लेना शुरू किया। फिर धातुओं की खोज हुई और बहुत सारे काम धातुओं से किए जाने लगे। लेकिन, आधुनिक मानव ने एक नई चीज का अविष्कार किया, यह था प्लास्टिक। मिट्टी के बर्तन टूट जाते थे। लकड़ी गल जाती थी और लोहे पर जंग लग जाता था। लोहा बिजली का सुचालक है। लेकिन, प्लास्टिक इस सबसे दूर थी। उससे चीजें बनाना ज्यादा आसान था और यह खराब भी नहीं होती थी। अन्य चीजों की तुलना में इसे नष्ट होने में बहुत ही ज्यादा समय लगता था। ज्यादा समय तक चलने के चलते इसका प्रयोग भी अधिकाधिक होता है। 

हम अपने रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों को देखें तो हर तरफ प्लास्टिक और उससे बनी चीजों की भरमार है। हमें याद भी नहीं है कि कितनी चीजों का हम इस्तेमाल करते हैं और वे प्लास्टिक से बनी हुई है। प्लास्टिक के बगैर आज जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
लेकिन, हजारों सालों में नष्ट होने वाला प्लास्टिक का गुण ही आज सबसे बड़ी समस्या बन गया है। खराब होने, बेकार होने के बाद उसका क्या किया जाए ? पूरी दुनिया इस समस्या से जूझ रही है। हर तरफ प्लास्टिक कचरा एक समस्या बन गया है। रीसाइकिल इसका एक समाधान है। लेकिन अभी बनने वाले प्लास्टिक की बहुत ही कम मात्रा रीसाइकिल की जाती है। इसे जलाकर नष्ट करने पर बेहद हानिकारक गैसें निकलती हैं। इसके चलते प्लास्टिक कचरे का बहुत बड़ा हिस्सा समुद्रों में बहा दिया जाता है। एक आकलन के मुताबिक हर साल 15 मिलियन टन यानी डेढ़ करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में बहा दिया जाता है।

समुद्र के अंदर कुछ धाराएं चलती रहती हैं। कुछ बाहर की हवा उन धाराओं को प्रभावित करती हैं। इसके चलते यह कचरा दुनिया भर में बहता रहता है। बहुत सारा कचरा समुद्र तटों पर दोबारा आ लगता है। जबकि, कहीं-कहीं पर अवक्षेप की तरह जमा होता रहता है। पैसिफिक सागर में प्लास्टिक कचरे का एक विशाल पैच मौजूद है। माना जाता है कि इसमें 80 हजार टन कचरा है। प्लास्टिक कचरे के ऐसे ही विशालकाय अवक्षेप हिन्द महासागर, एटलांटिस महासागर में भी मौजूद हैं।

और यह सब कुछ केवल सौ सालों में ही हुआ है। सौ सालों में ही हमने समुद्रों को प्लास्टिक से पाट दिया है। बहुत सारा प्लास्टिक पानी के अंदर बैठ जाता है। जबकि, बहुत सारा पानी के ऊपर तैरता रहता है। समय के साथ ये छोटे सूक्ष्म टुकड़ों में टूटते हैं, जिसके चलते समुद्र के तमाम जलजीव अकाल मौत का शिकार होते हैं। वे जीवों के पाचनतंत्र में प्रवेश करते हैं और उन्हें मार देते हैं।
इन्हीं समुद्रों से उठने वाली भाप बाद में मानसून बनकर हमारे ऊपर बरसती है। सोचिये, क्या आसमान से गिरने वाली बारिश की बूंदें आने वाले समय में सचमुच पहले जैसी पवित्र रह पाएंगीं

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