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ज़माना बदल रहा है और ज़माने के साथ बदल रहा है उपलब्धियों के पीछे भागने का हमारा अंदाज़ भी। अपने दादा जी और दादी जी के मुंह से कई बार मैंने सुना कि ‘हमारा ज़माना बड़ा ही अच्छा था, कभी किसी बात की ना तो फ़िक्र थी ना लालसा। आजकल के बच्चे तो कितना भी पा लें खुश ही नहीं होते’। बात तो दरसअल सच ही है। जीवन में बहुत कुछ हासिल करने की इच्छा ने मनुष्य को एक रोबोट ही बना डाला है। उपलब्धियों की रेस में पीछे ना रह जाएं, ये डर हम सबको भीतर ही भीतर सताता रहता है और हम डर के कारण निरन्तर भागते रहते हैं, बिना ये सोचे कि वास्तविकता में हम किस चीज़ के पीछे भाग रहे हैं – वो, जो हमें चाहिए या फिर वो, जो दूसरे सोचते हैं कि हमें हासिल करना चाहिए।

कामयाबी की परिभाषा व्यकि दर व्यक्ति उलझती ही जाती है। इसी उलझन में वक़्त गुज़रता जाता है और हज़ार कामयाबी हासिल करने के बाद भी हम स्वयं को नाक़ामयाब ही पाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर एक मध्यम वर्गीय परिवार का व्यक्ति, एक साधारण नौकरी हासिल करता है तो वह उस कामयाबी के पल को नकार देता है, ये सोचकर कि उसका दोस्त उससे बेहतर नौकरी पर उससे अधिक तनख्वाह पा रहा है और उस मक़ाम तक पहुंचने पर ही वह कामयाब कहलायेगा।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कामयाबी का एक ख़ास पैमाना हमारे अपने और पराये मिलकर ख़ास हमारे लिए ही तैयार करते हैं। जैसे, यदि कोई व्यक्ति रेलवे विभाग में क्लर्क की परीक्षा पास कर लेता है तो उसे बधाई देने या उसके साथ मिलकर वो खुशी का पल मनाने की जगह सभी उसे सलाह देते हैं कि  क्लर्क की परीक्षा पास कर ली है लेकिन, लक्ष्य आई.ए.एस होना चाहिए। अब तैयारी में लग जाओ तभी कामयाब बनोगे। और फिर, उस व्यक्ति के लिए, बेहद मेहनत करने के बाद हासिल हुई क्लर्क की उस कुर्सी का महत्व एक क्षण में ही ख़त्म हो जाता है। जो कि निश्चित ही ग़लत है।

ऐसे में, ये समझना ज़रूरी है कि परीक्षा क्लर्क की पास की हो या आई.ए.एस. की, मेडिकल की हो या टीचिंग की, परीक्षा का महत्व एक ही होता है, मेहनत सबमें लगती है और कामयाब होने पर खुशी भी समान ही होती है। तो फिर क्यों हम अपनी मेहनत से हासिल हुई इस खुशी को मनाने के लिए इतना हिचकते हैं ? क्यों हम कामयाबी का स्तर आँकने लगते हैं ? क्यों हम अपनी क़ामयाबी तय करने का हक़ दूसरों को दे देते हैं?

अपनी मेहनत से, सम्मान के साथ, आप जो कुछ भी हासिल करते हैं वो क़ामयाबी ही तो है – और कामयाबी कभी बड़ी या छोटी नहीं होती। कामयाबी बस कामयाबी होती है। लेकिन, इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए बेहद ज़रूरी है कि अपनी कामयाबी के उस पल को हम जियें।

अपनी कामयाबी, चाहे वो किसी की भी नज़र में कितनी ही मामूली क्यों ना हो, यदि आप सेलिब्रेट करते हैं, तो खुशी के वो पल आपके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पल बन जाते हैं। जो आपको आपके कामयाब अस्तित्व का आभास कराते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे हम अपने परिवार के बच्चों का जन्मदिन हमेशा मनाते हैं, पार्टी का स्तर निश्चित ही हमारी हैसियत के अनुसार हम तय करते हैं, लेकिन जन्मदिन मनाते हैं, धूमधाम से, खुशी से। ये जश्न बच्चे में एक खुशी और ऊर्जा का संचार पैदा करता है और वह स्वयं को महत्वपूर्ण महसूस करता है, जो कि एक ख़ुशहाल जीवन का आधार है।

अपने हिस्से की ख़ुशी पर हम सबका समान अधिकार है, चाहे कोई अबोध बालक हो या कोई परिपक्व वयस्क। तो मेहनत कीजिये, ऊँचे लक्ष्य भी निर्धारित कीजिये लेकिन स्वयं को, स्वयं की खुशी को, स्वयं की मेहनत को और कामयाबी के हर छोटे बड़े क्षणों को नकारिये नहीं। सेलेब्रेट कीजिये, ख़ुद को शाबाशी भी दीजिये। क्योंकि, जीवन में आगे बढ़ते रहना ज़रूरी है, प्राकृतिक भी, लेकिन कभी थमकर अपनी कामयाबी की ख़ुशी को जीना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।

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