हिंदी विवेक : we work for better world...

 

भौगोलिक उत्तर की बजाय ’चुम्बकीय उत्तर ’ है महत्वपूर्ण

वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों की वैज्ञानिको द्वारा पुष्टि करने तथा इस विज्ञान के ’रिजल्ट -ओरिन्टेड ’ होने के कारण मान्यता का व्याप भी बढ गया है. जैसे -जैसे इस विज्ञान तक आम आदमी की पहुंच हो रही है, वैसे -वैसे स्वप्रयोगधर्मिता प्रचलित अवधारणाओं इत्यादि के कारण कई तरह की भ्रान्तियां भी पनपने लगी है. दिशाएं वास्तु विज्ञान का प्रमुख आधार है जबकि कुछ लोग, भवन में आगे या पीछे कौन -कौन से निर्माण कार्य करने चाहिए, जैसी अवधारणाएं बना लेते है. इतना ही नहीं, जो लोग यह जानते है कि दिशाओं का वास्तुशास्त्र मे अत्यधिक महत्व हैं, वे भी सूर्य की स्थिति के आधार पर दिशाओं का निर्धारण करके भवन का वास्तु विवेचन करने लगते है. वास्तव में सभी वास्तु सिद्धान्तों का पालन ’चुम्बकीय उत्तर ’ (मैग्नेटिक नार्थ ) की स्थिति को ध्यान में रखते हुए करना होता है न कि ’भौगोलिक उत्तर ’ (ज्योग्राफिक नार्थ ) के अनुसार. क्योकिं सूर्य तो उत्तरायण एवं दक्षिणायन में अपनी स्थिति बदलते हुए प्रतीत होता है जबकि चुम्बकीय उत्तर स्थिर रहता है. बरसो से एक अवधारणा यह भी प्रचलित है कि भवन मे बायें पक्ष को भारी करने से वास्तुविज्ञान के नियमों का स्वमेव पालन हो जाता है. इस अवधारणा को समझने के लिए इसकी उत्पति के कारण की तह में जाना होगा.

मध्यकाल में विदेशी आक्रमणकारियों ने कई ऐतिहासिक भवनों के साथ पुस्तकालयों को भी नष्ट कर दिया एवं अमूल्य पांडूलिपियां व ग्रथं बडी मात्रा में नष्ट हो गए. इतना ही नहीं ऐतिहासिक इमारतों को बनाने वाले कुशल कारीगरों एवं विद्वान वास्तुकारों को भी मार देने जैसी घटनाएं होने लगी ताकि उनके द्वारा बनाया गया भवन सदैव अद्वितीय बना रहे. विद्वानों और ग्रंथो पर संकट के उस दौर में जब भावी पीढी तक ज्ञान हस्तांतरित करना दुष्कर कार्य होने लगा तो विद्वानों ने भावी पीढी के हित में बीजमंत्र की तरह कुछ संक्षिप्त फार्मूले लोगों को समझाना शुरू कर दिए. उन दिनों आज की तुलना में जनसंख्या बहुत ही कम तथा भूमि अत्यधिक थी. वास्तु के अनुसार वैसे तो कोई भी दिशा श्रेष्ठ मानी गई है. उस काल के विद्वानों को यह कल्पना शायद नहीं थी कि समय के साथ जनसंख्या इतनी अधिक बढ जाएगी कि सभी दिशाओं के अभिमुख भवन बनाने पडेगें. चूकिं पूर्व एवं दक्षिण दिशा के अभिमुख भवनों में बायां पक्ष भारी करने से वास्तव में भवन काफी हद तक वास्तुनुकूल हो जाते थे. अतः ’बायां पक्ष ’ भारी रखने की अवधारणा चल पडी. समय के साथ स्थितियां बदल गई परंतु भवन का मुहं चाहे किसी ओर हो, हमारे चलवों ने बायें पक्ष को भारी रखते हुए निर्माण करवाने जारी रखे जिससे न केवल उत्तर एवं पश्चिमाभिन्मुखी भवनों में निवास व व्यवसाय करने वाले लोगों का जीवन कष्टकारी हो गया. वरन् पूर्व और दक्षिण के भवन भी उतने वास्तुनुकूल नहीं बन पा रहे हैं क्योकिं आज मुख्य भवन के भीतर शौचालय, जमीन के अदंर पानी की कुंडी इत्यादि बनाई जाती है जबकि उन दिनों ऐसा प्रचलन नहीं था.

कुछ लोग यह सोचकर निश्ंचत हो जाते है कि भवन किराये का होने अथवा किसी अन्य के नाम से होने के कारण उन पर भी वास्तु लागू होता ही नहीं. यह एक बडी भ्रांति है. विज्ञान के नियम सभी लोगों व स्थानों पर शाश्वत रूप से लागू होते है. अगर किसी वाहन के ब्रेक नहीं लगते तो चाहे उसे उसका मालिक चलाए या कोई अन्य सभी को समान रूप से प्रभावित होना पडता है. उसी प्रकार किसी भवन का मालिक चाहे कोई हो परंतु प्रभावित वहीं होगा जो उसका उपभोग कर रहा है.

कई बार किसी एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात की पुनरावृत्ति होते -होते वह एक धारणा बन जाती है. उदाहरणार्थ कुछ लोगों को लगता है कि छोटे प्लाट पर वास्तु लागू नहीं होता तो कुछ अन्य को लगता है कि दक्षिण दिशा तो अशुभ ही है. सच तो यह है कि वास्तु सभी आकार के प्लाटस पर लागू होता है तथा दक्षिण दिशा भी अशुभ नहीं है. अपने आसपास गौर से देखेगें तो आप पाएगें कि दक्षिणाभिमुख भवनों में निवास या व्यवसाय करने वाले कई लोग पूर्ण सम्पन्न और संतुष्ट है. किसी भी प्लाट को तभी त्यागना चाहिए जब वह केवल 202.5 डिग्री से लेकर 247.5 के भाग को ही देखता हो. अलावा उसके सावधानी से बुरे भूखंड से अच्छे परिणाम तथा असावधानी के कारण अच्छे भूखंड से बुरे परिणाम लिए जा सकते है.

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu