संघर्ष नहीं समन्वय ही विकास का मार्ग

****मिलिंद कांबले****
माजिक जीवन में अपनी पूर्णसहभागिता दर्शानेवाले लोग ही कुछ नया कर दिखाते हैं, इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं पद्मश्री मिलिंद कांबले। पेशे से इंजनियर मिलिंद कांबले का कंस्ट्रक्शन का व्यवसाय हैं। वे अ.भा.वि.प. के कार्यकर्ता भी रहे हैं। उनकी डॉ. बाबासाहब आंबेडकर में गहरी आस्था है। उन्होंने डॉ.बाबासाहब आंबेडकर.कॉम नामक वेबसाइट शुरू की। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका उद्घाटन किया था। प्रखर सामाजिक संज्ञान और महापुरुषों के विचारों की आज की परिस्थति में प्रासंगिकता इन्ही के आधार पर मिलिंद कांबले ने सन २००५ में डिक्की(दलित इंडस्ट्रीज एंड चेंबर ऑफ कामर्स) की स्थापना की। अब संस्था को दस वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इन दस सालों का अनुभव और भविष्य की योजनाओं के संबंध में उनसे विस्तृत चर्चा हुई। प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश-
 
डिक्की की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है?
हम पुरोगामी महाराष्ट्र में रहते हैं। ‘फुले,शाहू और आंबेडकर’ जैसे महापुरुषों का नाम लेकर यहां सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन होते हैं। इन महापुरुषों के चिंतन केवल सामाजिक और राजनैतिक ही नहीं रहे बल्कि उन्होंने आर्थिक और उद्योगों से संबंधित चिंतन भी किये हैं। हांलाकि इस ओर बहुत कम लोगों का ध्यान गया हैं। डॉ.बाबासाहब आंबेडकर स्वयं अर्थशास्त्री थे। उन्होंने इस विषय पर प्रबंध भी लिखे हैं। उनके विचारों की दिशा विकास के पथ पर ले जानेवाली है। राजर्षी शाहू महाराज ने सन १९०२ में अपने संस्थान में ५० प्रतिशत आरक्षण को मान्यता देकर वंचित समाज के लिये विकास के अवसर प्रदान किये। संस्थान में उद्योगों को प्रोत्साहन दिया। महात्मा फुले स्वयं एक बडे ठेकेदार थे। इन तीनों ने वंचित समाज को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिये प्रयास किया। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने संविधान में वंचित समुदाय के लिये विशेष सुविधाएं दी। परंतु उनके पश्चात इस विषय की ओर किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया। सन २००५ से हम इन तीनों महापुरुषों के आर्थिक विचारों के आधार पर काम कर रहे हैं।
डिक्की की पार्श्वभूमि क्या है?
सन २००३ से निजि क्षेत्रों में आरक्षण के लिये आंदोलन शुरु हो चुके थे। तब उद्योगपतियों ने इसका विरोध किया था। तब केंद्र सरकार ने दलित संगठन और उद्योगपतियों के बीच संवाद साधने का कार्य अपने हाथ में लिया। सन २००५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने डॉ. जमशेद ईराणी के नेतृत्व में एक समिति बनाई। उन्होंने गहन अध्ययन के बाद ‘४ई’ नामक अहवाल सरकार के सामने रखा। उसके अनुसार उद्योगपतियों द्वारा दलित समाज की ओर से गुणवत्तापूर्ण काम की अपेक्षा की गयी और जो भी इस अपेक्षा को पूर्ण करेगा उसे काम करने का अवसर दिये जाने का वादा किया। इन्हीं दिनों अर्थात सन २००५ में डिक्की का भी काम शुरु हुआ। दलित समाज के उद्योगपतियों का एकत्रीकरण, पंजीयन और संगठन इन सभी के माध्यम से डिक्की की शुरुआत हुई। सन २०१० में हमारे द्वारा आयोजित किये गये ‘दीप एक्सा’ नामक औद्योगिक प्रदर्शनी के कारण डिक्की की औद्योगिक जगत में नई पहचान बनी। इस प्रदर्शन में टाटा ग्रुप हमारे साथ था। अनेक छोटे-बडे उद्योगपतियों ने इस प्रदर्शनी में हिस्सा लिया था। ‘नौकरी मांगनेवाले नहीं नौकरी देनेवाले बनो’ यह विश्वास हम डिक्की के माध्यम से जागृत कर सके हैं।
पिछले दस सालों की उपलब्धियों के बारे में क्या कहेंगे?
पिछले दस सालों में देश के अठारह राज्यों में डिक्की का विस्तार हो चुका है और इसकी सदस्य संख्या पंद्रह हजार से अधिक है। केन्द्र और राज्य सरकारों के द्वारा डिक्की को औद्योगिक संगठन के रूप में मान्यता प्राप्त है और विविध विषयों पर डिक्की के मत पूछे जाते हैं। इन मतों का उनके निर्णयों पर परिणाम भी होता है। डिक्की के कारण भारत की नवीन क्रय नीति में यह नियम बनाया गया है कि अब ४ प्रतिशत खरीददारी अनुसूचित जाति के उद्योगपतियों के द्वारा की जायेगी। इसके कारण दलित उद्योगपतियों को २४ हजार करोड रुपये का बाजार प्राप्त हो गया है। डिक्की के प्रयत्नों के कारण भारत सरकार ने अनुसूचित जाति के उद्योगपतियों को मदद करने के लिये २०० करोड रुपयों का वेंचर केपिटल फंड बनाया है। साथ ही अनुसूचित जातियों के उद्योगों को बढावा देने के लिये १०० करोड रुपयों की वनबंधु कल्याण योजना निर्माण की है। २०१५-१६ के बजट में सरकार ने मुद्रा बैंक की स्थापना की है जिसमें अनुसूचित जाति-जनजाति के उद्योगपतियों को प्रधानता दी जायेगी। सीआयआय एक महत्वपूर्ण संगठन है और टाटा ग्रुप के साथ डिक्की ने अफरमेटिव एक्शन के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डिक्की ने अभी तक ५०० दलित उद्योगपतियों को अन्य उद्योगपतियों से वेंडर और सप्लायर के रूप में जोडा है। डिक्की ने अभी तक राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनी मुंबई, नागपुर, पुणे और हैदराबाद में लगाई है। उसे उत्तम प्रतिसाद भी मिला है। हालांकि दस साल का कालखंड बहुत कम होता है। परंतु दस सालों में हमने जो कार्य किया वह निश्चित रूप से आगे उपयुक्त होगा।
दशकपूर्ति के अवसर पर आपकी आगे की योजनायें क्या हैं?
डिक्की का उद्देश्य दलित समाज में औद्योगिक प्रेरणा निर्माण करना, नवीन उद्योगपतियों को तैयार करना और उन्हें स्थापित करना है। पिछले दस सालों में हम इस लक्ष्य के बहुत पास पहुंच गये हैं। भारत का पहला इनकुवेशन सेंटर बनाना भी हमारा लक्ष्य है। इसकी शुरुआत हैदराबाद से हुई है और आनेवाले समय में मुंबई, दिल्ली और जमशेदपुर में भी इसकी शुरुआत होगी। जल्द ही हम डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्किल डेव्हलपमेंट काउंसिल की शुरुआत कर रहे हैं। इसके माध्यम से ५० दलित युवकों को कौशल्य विकास का प्रशिक्षन दिया जायेगा। सन २०१७ में पहली अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक प्रदर्शनी आयोजित की जायेगी। डिक्की इस बात के लिये भी प्रयत्न करेगी कि भविष्य में दलित महिलाओं को भी उद्योग जगत में आगे लायें और उन्हें सम्माननीय स्थान प्राप्त हो। समाज के सभी स्तर के घटकों को एकत्रित करके ‘रन फॉर कास्ट फ्री इंडिया’ नामक वार्षिक दौड डिक्की के माध्यम से प्रत्येक शाखाओं द्वारा संचालित की जायेगी। दस सालों की जमापूंजी के आधार पर हमने भविष्य की यह योजना बनाई है।
अब तक की यात्रा और भविष्य की योजनाओं का किन शब्दों में वर्णन करेंगे?
डिक्की के माध्यम से हम एक अभियान चला रहे हैं। हमारा क्षेत्र उद्योग और आर्थिक जगत से संबंधित है। अभी तक के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि अभी तक की हमारी सफलता का श्रेय संघर्ष की अपेक्षा समन्वय को अधिक है। समन्वय के कारण अनेक समस्याओं का हल ढूंढा जा सकता है और हम विकास की प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि संघर्ष करना ही नहीं है। परंतु संघर्ष चिरकालीन नहीं होना चाहिये। मेरा विश्वास है कि समन्वय चिरकालीन होने पर ही विकास अधिक होगा।
– प्रतिनिधि
 

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