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कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी परिपक्व राजनेता का चोला पहनते दिखाई दे रहे थे और लोगों की उनसे अपेक्षाएं भी बढ़ गई थीं। इसका कारण यह है कि लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल का जितना महत्व होता है उससे कहीं ज्यादा ही मजबूत विपक्ष का होता है। दोनों ओर मंजे हुए राजनेताओं की जरूरत होती है। सत्तारूढ़ भाजपा के पास ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन विपक्षी दल कांग्रेस के पास उसका टोटा पड़ गया लगता है। कांग्रेस की इस स्थिति के कारणों और इतिहास पर जाने की आवश्यकता नहीं है, यह तो तटस्थ राजनीतिक विश् ‍ लेषकों और इतिहासकारों का काम है। लेकिन वर्तमान पीढ़ी यह अवश्य जानती है और अपने हिसाब से इसके कारण खोज लेती है। मूलतया इसका कारण एक ही घराने के आगेपीछे कांग्रेस का होना है, यह तो सब को पता है।

इस पृष्ठभूमि को कहने का कारण यह है कि पार्टी के उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी जिस तरह बचकाने और अधकचरे बयान दिया करते थे वे उनके अध्यक्ष बनने के बाद भी कम हुए हो ऐसा नहीं लगता। हां, आस्तीनें संवार कर बोलने का उनका ढंग और सिर चढ़ता दिखाई दे रहा है। अध्यक्ष बनने के बाद उनमें गंभीरता और नीरक्षीर विवेक आने की लोगों की अपेक्षाएं टूटती नजर आ रही हैं। उनके राजनीतिक सलाहकार भी राजनीति और गंभीरता से विवेक का नाता रखते नहीं दिखाई दे रहे हैं। कहां क्या बोलना, क्या नहीं बोलना और कितना बोलना है, कहां चुप हो जाना है, आलोचना का सिक्सर कैसे मारना है यह राहुलजी को अभी सीखने की आवश्यकता महसूस होती है। याने परिपक्वता अभी कोसों दूर है ; अन्यथा विदेश में जाकर भारत में दीनता का प्रचार वे नहीं करते।

हाल के उनके बहरीन के भाषण से ये बातें उभरी हैं। यह भाषण और इसके पूर्व अमेरिका में बर्कले विश् ‍ वविद्यालय में उनका भाषण इसके द्योतक हैं। बर्कले के भाषण को तो लोगों ने आया – गया कर दिया ; क्योंकि उस समय वे दोयम दर्जे के नेता माने जाते थे। अब चूंकि देश की सब से बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं इसलिए उनका हर कथन पार्टी की भूमिका के रूप में देखा जाता है। सब से अहम मुद्दा यह है कि देश में हम सत्तारूढ़ और विपक्ष की भूमिका में होते हैं और सत्तारूढ़ दल को आड़े हाथ लेना विपक्ष का काम ही होता है – कभी कभी यह आलोचना नकारात्मकता तक बढ़ जाती है, फिर भी हम सह लेते हैं। लेकिन विदेश में चाहे सत्तारूढ़ दल का नेता हो या विपक्ष का – उनकी समान भूमिका होती है, होनी चाहिए। वह राष्ट्र की भूमिका होती है, भारत की भूमिका होती है। विदेश की भूमि पर हमें अपने देश की बात कहनी है। देश में हम मोदीजी से चाहे लड़ लें, उनकी सरकार पर छींटाकशी कर लें ; लेकिन विदेश में वह हम सबके प्रधान मंत्री हैं, इस देश के प्रधान मंत्री हैं और उनकी सरकार महज भाजपा की नहीं, हम सब की सरकार है, भारत सरकार है। इसका विस्मरण होना दुखदायी है, यह राहुलजी को कोई क्यों नहीं समझाता ? विदेशों में किए जाने वाले भाषण भारत की भूमिका को विशद करते हैं। यह भारत में होने वाली कोई टुच्ची जनसभा नहीं है, जहां मन में आया वह बकते चलें और लोग तालियों की गड़गड़ाहट करते रहे।

जिन्होंने राहुलजी का बहरीन का भाषण सुना नहीं या ठीक से पढ़ा नहीं वे कहेंगे कि पहले बताओ तो क्या हुआ कि आप भी आलोचना में जुट गए। तो सज्जनों, सुनिए उनके कुछ जुमले –

– भारत इस समय गंभीर समस्या से जूझ रहा है और उसमें आप जैसे लोगों ( अनिवासी भारतीय ) की सहायता जरूरी है।

– सरकार पूरी तरह विफल हो चुकी है। त्रासदी यह है कि वास्तविक समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान नहीं है। विभिन्न समुदायों में आपस में विद्वेष बढ़ाया जा रहा है। सहनशीलता नहीं रही है। ( बर्कले भाषण में भी राहुलजी ने कहा था कि दलितों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। इस तरह दलित और मुस्लिम के वोट बैंक पर नजर रख कर ही वे बोलते हैं। सिक्खों को न्याय दिलाने की बात भी वहां उन्होंने की थी।)

– पत्रकारों और महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई कर रहे जजों की संदेहास्पद स्थितियों में मौतें हो रही हैं।

– हमारा आग्रह है कि १९४७ में ब्रिटिशों से लड़ने में आपने जिस तरह हमारा साथ दिया, वैसा इस सरकार को हटाने में हमारा साथ दें।

– हम शक्तिशाली पार्टी हैं। हमने ब्रिटिशों को पराजित किया, हमने आधुनिक भारत की नींव रखी और उसे अपने पैरों पर खड़ा किया। आप साथ दीजिए तो हम भाजपा को २०१९ के चुनाव में हरा देंगे।

अब इसके एक – एक जुमले पर गौर करें तो पता चलेगा कि ये बयान कितने गैरजिम्मेदाराना हैं। ऐसी कौनसी यहां आफत आ पड़ी है, और वे ही महज तारणहार हैं इसे उन्हें भारत में जनता को समझाना चाहिए। इसकी लिटमस टेस्ट कई बार हो चुकी है और आगे २०१९ में भी होनी है। फिर बहरीन के अनिवासी भारतीय बेचारे क्या करेंगे ? वे तो अपना कर्तव्य देश में विदेशी मुद्रा भेज कर पूरा कर ही रहे हैं। क्या राहुलजी चाहते हैं कि वे अपना काम – धंधा छोड़ कर भारत आए, कांग्रेस का पल्लू पकड़े और प्रचार में जुट जाए ?

अब इतिहास की सब से बड़ी भूल – १९४७ में जिस तरह आपने साथ दिया, उस तरह साथ दीजिए। १९४७ में तो भारत स्वतंत्र हो गया था। इसके ९० साल पहले याने १८५७ से ही स्वाधीनता की लड़ाई आरंभ हो गई थी। तब तो उनकी दादी का भी जन्म नहीं हुआ था। पता नहीं राहुलजी कितने पढ़े हैं, भारतीय इतिहास का ज्ञान उन्हें कितना है। यदि हो तो उन्हें जान लेना चाहिए कि स्वाधीनता आंदोलन का संचालन करने वाली उस समय की कांग्रेस, आज की कांग्रेस नहीं थी। उस कांग्रेस में समाज के सभी वर्ग थे और वे कंधे से कंधा मिला कर लड़े। स्वाधीनता कांग्रेस के गिनेचुने किन्हीं दो – चार नेताओं के कारण नहीं मिली। यह वास्तविक इतिहास है। लगता है, राहुलजी को इतिहास के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में जाना चाहिए।

राहुलजी के इस भाषण पर केंद्रीय विधि मंत्री रवि शंकर प्रसाद की टिप्पणी माकूल है, ‘‘ इस भाषण से विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच राहुल गांधी खाई पैदा कर रहे हैं और वहां के विभिन्न भारतीय समुदायों में विद्वेष फैलाने का काम कर रहे हैं।’’ इस टिप्पणी का जिक्र इसलिए नहीं किया वे भाजपा के मंत्री हैं, बल्कि इसलिए किया कि ऐसे भाषणों से विदेशों में हमारे बीच जो भाईचारा है, उसमें चिनगारी पड़ने का खतरा है। जो विदेश में रह चुके हैं, वे जानते हैं कि वहां पहुंचते ही हम तमिल, मराठी, सिक्ख, बौद्ध, हिन्दू नहीं रह जाते और हर व्यक्ति अपने भारतीय होने का गौरव अनुभव करता है। मिलते ही पहले यही सवाल किया जाता है, ‘ आर यू इंडियन ?’ हां कहते ही फिर राज्य, जिला, गांव आदि पूछा जाता है। धर्म, जाति तो आती ही नहीं। उसकी वहां उपयोगिता भी नहीं है। यह एका हमारी आवश्यकता है, और पूंजी भी है। इस पूंजी को गंवाना और विभेद की दीवार पैदा करना मूर्खता की हद होगी।

बात विद्वेष फैलाने की आई तो कांग्रेस के राज में क्या हुआ, इसे भी जान लीजिए। अभी तिहरे तलाक पर कांग्रेस की भूमिका क्या है ? लोकसभा में उसने समर्थन कर दिया और राज्यसभा में संशोधन पेश कर विधेयक को लटका दिया। यह मुस्लिम समाज की आधी दुनिया से स्नेह है या विद्वेष ? यही क्यों, शाहबानो मामला सब को याद है। तलाक के मामले में भरणपोषण के उसके अधिकार को जब सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया, तब मुस्लिम तुष्टीकरण के तहत संसद में एक विधेयक लाकर इस फैसले को ही उलट दिया गया। तब कांग्रेस सत्ता में थी और राहुलजी के पिता प्रधान मंत्री थे। तिहरा तलाक विधेयक हो या फिर शाहबानो मामला – दोनों में कांग्रेस क्योंकर दुहरी चाल चल रही है, इसका जवाब उन्हें अपने सलाहकारों से पूछ कर तैयार रखना चाहिए।

मुद्दा यह है कि स्वदेश में राजनीति और विदेश में कूटनीति किसी भी देश के महत्वपूर्ण पहलू हैं। माने यह कि आप स्वदेश में सच्चे – झूठे आरोप – प्रत्यारोपों पर उतर भी जाएं परंतु विदेश में जाकर वही बरगलाना स्वीकार नहीं हो सकता। परिपक्व राजनेता यह जानता है। यहां तक कि राहुलजी के पिता और दादी ने भी विपक्ष में रहते समय इस तरह की बातें की हो यह स्मरण में नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी – चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में – विदेश में भारत की बात करते थे, पार्टियों या यहां की राजनीति की नहीं। देश की छवि सब से अहम होती है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत और विदेशों के सम्बंधों में नया दौर शुरू करने के लिए आरंभ से अथक विश् ‍ व सफर किया। उन्होंने वहां देश की ही बात की, राजनीति और पार्टियों की नहीं। भारतीय मूल के २७० सांसदों के सम्मेलन में उन्होंने केवल भारत और विदेशों के सम्बंधों को मजबूत बनाने का आग्रह किया था।

यह महज राहुलजी की आलोचना के लिए नहीं लिखा गया है, परंतु राहुलजी अधिक परिपक्वता दिखाए, अधिक सतर्क हो इस शुभकामनाओं के लिए !

मोबा . ९९३०८००४५३

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