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जेट के सर्वेसर्वा नरेश गोयल ने बाजार पर गौर नहीं किया। गलत निवेश करते रहे और खर्च चलाने के लिए कर्ज लेते रहे। इस स्थिति में कम्पनी का पतन तो होना ही था। मुश्किल में फंसे जेट के बीस हजार कर्मचारी, जो रातोंरात बेरोजगार हो गए।

जेट एयरवेज का अचानक बंद होना सभी के लिए आश्चर्यजनक और जोरदार झटका था। देखते ही देखते भारत में यह चर्चा का प्रमुख विषय बन गया। लोग कहने लगे कि आखिर कैसे मुनाफा कमाने वाली और यात्रियों से अधिक किराया वसूल करने वाली यह एयरवेज बंद हो गई? तथा 119 विमानों से देश-विदेश के 56 शहरों को हवाई मार्ग से जोड़ने वाली एयरलाइन का पतन कैसे हो गया? आखिरकार कैसे भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी एयरलाइन रही जेट एयरवेज खस्ताहाल पर आ गई?

आइए जानते है …

जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल ने ही इसे बुलंदियों पर पहुंचाया था और उनकी गलत नीतियों ने ही उसे डूबा भी दिया। जानकारों के अनुसार 2006 में जब खस्ताहाल एयर सहारा को मार्केट रेट से बेहद अधिक और वह भी 50 करोड़ डॉलर की रकम नगद देकर खरीदा गया था तब से ही जेट एयरवेज के बुरे दिन शुरू  हो गए थे। अपने सहयोगियों की राय को नजरअंदाज कर नरेश गोयल ने सबसे बड़ी गलती की थी। एयर सहारा को जेटलाइट का नाम दिया गया था लेकिन वह भी 2015 में पूरी तरह से डूब गया। इसके साथ ही जेट एयरवेज का पूरा निवेश भी डूब गया। वह अधिग्रहण जेट के गले की हड्डी अब भी बना हुआ है। जिसका खामियाजा आज जेट एयरवेज के बीस हजार से अधिक कर्मचारियों को भी भुगतना पड़ रहा है। उनकी नौकरियां संकट में पड़ गई हैं।

गौरतलब है कि भारत के विमानन क्षेत्र में बहुत प्रतिस्पर्धा है। समय के अनुकूल सुधार नहीं करने के कारण जेट एयरवेज को इंडिगो, स्पाइस जेट एवं गो एयर जैसी बेहद सफल व सस्ती एयरलाइनों ने चुनौती दी थी। बावजूद इसके जेट ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और न ही स्वयं की नीतियों में बदलाव किया। उक्त तीनों कम्पनियां 2005 -2006 के बीच शुरू हुईं। इन कम्पनियों ने अपनी कीमतें कम रखीं और दूसरे ऐसे हवाई मार्गों पर सेवा मुहैया कराई जहां पहले हवाई यात्रा की सुविधा नहीं थी। शुरुआती दिनों में जेट मैनेजमेंट ने उन्हें हल्के में लिया। जेट एयरवेज केवल कॉरपोरेट ग्राहकों को सेवा देने में रुचि ले रहा था और वह समझने में विफल रहा कि सस्ती एयरलाइनें उन ग्राहकों को लुभा रही थी जो कीमतों का ध्यान रखते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले परिवर्तन पर भारत की एयरलाइनें संवेदनशीलता बरतती हैं और उसके अनुरूप ही कार्यशैली में समय-समय पर बदलाव भी करती हैं। क्योंकि अधिकतर तेल आयात होता है। जैसे ही रुपया कमजोर होता है वैसे ही तेल का खर्च अधिक बढ़ जाता है। एयरलाइन कम्पनियों के लिए तेल का खर्च सबसे बड़ा है और गत एक वर्ष में रुपया कमजोर रहने से कच्चा तेल महंगा रहा है।

इससे इंडिगो व स्पाइस जेट को नुकसान तो हुआ लेकिन उन्होंने अपने खर्च को सीमित रख कर इससे पार पा लिया। वहीं दूसरी ओर जेट एयरवेज और अधिक कर्ज में डूब गया तथा अपनी बैलेंस शीट को संभालने में नाकाम साबित हुआ। परिणामतः वह उद्योग के चक्रिय बदलावों में फंस गया।

लंबे समय तक उपयुक्त सुधार व बदलाव नहीं करने के कारण कोई भी कम्पनी भारी निवेश करने को तैयार नहीं हुई। इससे एयरलाइन का घाटा बढ़ता ही चला गया। टाटा के साथ चल रही वार्ता विफल हो गई और एतिहाद एयरवेज ने भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने से इनकार कर दिया। कम्पनी के कर्ताधर्ता गोयल के होने के कारण अन्य कम्पनियों ने उसमें निवेश न करने में ही अपनी भलाई समझी। अंततः गोयल को अपना नियंत्रण छोड़ना पड़ा। इसके बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले कर्जदाताओं ने नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।

नरेश गोयल की प्रबंधन शैली और कार्यप्रणाली पर कई बार आरोप लगते रहे हैं। इनमें प्रमुख आरोप यह था कि निर्णय एक ऐसी टीम करती थी जिसका नेतृत्व वह स्वयं करते थे। जेट के सारे कामकाज का निर्णय इसी टीम के हाथ में था, जो सबसे बड़ी गलती थी। इसके बजाय मुख्य सेवा और सस्ती सेवाओं के लिए अलग-अलग प्रबंधन की आवश्यकता थी।

किन्हीं कारणों से गोयल गलत निवेश कर रहे थे और कम्पनी की माली हालत को संभालने के लिए और अधिक कर्ज ले रहे थे तथा उसी पर पूरी तरह से निर्भर हो गए थे। कुल मिला कर देखा जाए तो यह कहना ही ठीक होगा कि उनकी कमाई से अधिक उनका खर्च था और खर्च करने हेतु वह कर्ज पर निर्भर थे।

बहरहाल देश के नागरिक विमानन नियामक ने जेट एयरवेज से एक ’ठोस और विश्वसनीय पुनरुद्धार योजना’ प्रस्तुत करने को कहा है, ताकि एयरलाइन द्वारा स्थगित परिचालन को फिर से बहाल किया जा सके। नियामक ने अपने एक बयान में कहा है कि डीजीसीए (नागरिक विमानन निदेशालय) नियमों के तहत कंपनी को पुनर्जीवित करने के लिए हर संभव सहायता प्रदान करेगा।

 

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