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* वरवरा राव को जमानत नही

माओवादी संगठनों से जुड़े कवि वरवरा राव की जमानत याचिका 29 अप्रैल  को कोर्ट ने खारिज कर दी। यदि सब को जमानत दी गई तो वे भूमिगत हो सकते हैं। राव प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के वरिष्ठ तथा सक्रिय सदस्य हैं। वर्तमान में वे अत्यंत गंभीर तथा देशद्रोह के आरोप में न्यायालयीन अभिरक्षा में जेल में बंद हैं।

सत्य की खोज में एवं अपनी पुस्तक के संदर्भ में मैं माओवादियों के संपर्क में था, ऐसी स्वीकारोक्ति 15 अप्रैल को माओवाद समर्थक गौतम नवलखा द्वारा न्यायालय में दी गई। माओवादी एवं सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका गौतम नवलखा द्वारा निभाई गई थी, ऐसे व्यक्ति पर माओवाद को बढ़ावा देने का आरोप कैसे लग सकता है? ऐसा सवाल उनके वकील द्वारा पूछा गया था।

माओवाद समर्थकों के वकीलों द्वारा किया गया इस प्रकार का दावा क्या ठीक है? हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि माओवादी संगठनों पर देश में अनेक वर्षों से प्रतिबंध हैं। ऐसे प्रतिबंधित संगठनों से कोई भी भारतीय संपर्क रख सकता है क्या? यह कार्य देशद्रोह की श्रेणी में है या नही?

*भटके हुए बुद्धिजीवी, मानवाधिकार संस्थांओं का दुष्प्रचार एवं शहरी माओवादी

संविधान आधारित भारतीय लोकतंत्र को उद्ध्वस्त कर माओवाद को प्रस्थापित करना, यह माओवादियों का लक्ष्य है। माओवाद कोई राजनीतिक आंदोलन नही है क्योंकि हमारी व्यवस्था में हिंसा को स्थान नही है। परंतु माओवादी समर्थक शहरी बुद्धिजीवियों की ओर से उनका जानबूझकर समर्थन किया जाता है एवं आपरेशन “ग्रीन हंट” रोककर उनसे वार्ता की जाये, इस तरह की मांग की जाती है। ये बुद्धिजीवी दबावतंत्र का उपयोग करते हैं। समाचार पत्र, सामाजिक संस्था, विश्वविद्यालयों इ. का उपयोग कर समाज में वैचारिक भ्रम फैलाना इनकी कार्यशैली का अंग है। इस तरह ये बुद्धिजीवी निरपराध आदिवासियों की हत्या में भी शामिल हैं। समाज इन बुद्धिजीवियों को बड़ा लेखक, पत्रकार, एवं विचारशील व्यक्ति के रूप में बहुत आदर देता है परंतु ये मानवतावादी कहलाने वाले देश का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं। माओवादियों द्वारा निर्दोष आदिवासियों की हत्या पर उनकी लेखनी हमेशा खामोश रहती है। इन लोगों के पीछे पाकिस्तान, चीन और अनेक भारतविरोधी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का हाथ है। सारांश माओवादियों की क्रूरता को ये लोग प्रोत्साहन देने का काम कर रहे हैं। इन बुद्धिजीवियों की अगली पीढ़ी अर्थात उनके लड़के-बच्चे कभी भी इन लड़ाइयों में शामिल नही होते है। वे अक्सर या तो अमेरिका या विदेश के अन्य देशों में काम कर रहे होते हैं या पढ़े रहे होते हैं।

*जंगल के सशस्त्र माओवादियों की अपेक्षा शहरी माओवादी ज्यादा खतरनाक

देश के दुर्गम भागों, जंगलों में चल रही माओवादियों की कुटिल कार्रवाईयों को शहरी बुद्धिजीवी वैचारिक आधार देने का काम करते हैं। यही शहरी माओवाद कहलाता है। जंगल के सशस्त्र माओवादियों की अपेक्षा ये शहरी माओवादी ज्यादा खतरनाक हैं। सरकार पर दबाव डालने हेतु, उपचार हेतु सहायता, अर्थ व्यवस्थापन, मीडिया का ध्यान आकर्षित करने हेतु, विदेशों से संपर्क के लिए माओवादियों का शहर से होने वाला यह संपर्क उपयोगी रहता है। माओवादियों के समर्थन में विविध पोस्ट लिखी जाती हैं। इन सबका समाज पर विशेषकर नौजवानों पर अलग प्रभाव पड़ता है। माओवादियों की ओर से दलितों का गलत उपयोग किया जाता है।

  • सीपीआई (माओइस्ट) अर्बन परस्पेक्टिव्ह

साधारणत: 2001 के आसपास से माओवादियों ने अपने पैर शहरों की ओर फैलाना प्रारंभ किया। माओवादी नेता कोबाड घँडी के व्यापक संपर्क के कारण “अर्बन परस्पेक्टिव्ह” शीर्षक से एक दस्ताऐवज तैयार किया गया। ग्रामीण भाग के सशस्त्र संघर्ष को शहरों से समर्थन दिलाने के काम की रणनीति का खुलासा इस दस्ताऐवज में सार्वजनिक रूप से किया गया। आदिवासी इलाकों में चलाएं जाने वाले सशस्त्र संघर्ष को मानव बल के साथ-साथ सामग्री, गुप्त कार्रवाई हेतु आश्रय स्थान, हिंसक घटनाओं में जख्मी होने वालों के लिए उपचार व्यवस्था इ. काम नगरी माओवादियों के गुटों की ओर दिये जाते हैं। शहरों मे जो काम किए जाने हैं उनमें “शत्रु संगठनों में प्रवेश करने का काम” भी अधिकृत रूप से शामिल है। माओवादियों के शहरी समर्थक सोशल मीडिया का भी प्रभावी उपयोग करते देखे जा सकते हैं। भीमा-कोरेगांव की घटना में जिन पांच नेताओं को गिरफ्तार किया गया, उसके विरोध में अमेरिका, स्पेन, केन्या, इंडोनेशिया, जर्मनी, नॉर्वे इ. देशों से किए गए ट्वीट यह दर्शाते हैं कि नगरी माओवादियों के अंतर्राष्ट्रीय संबध कितने फैले हुए एवं मजबूत हैं। सामान्य लोगों को क्रांति के लिये प्रोत्साहित करना एवं इस काम को मजदूर, अर्धकुशल मजदूर, विद्यार्थी, मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा वर्ग एवं बुद्धिजीवी इनके माध्यम से पूर्ण कराना यह इनका मुख्य काम है।

  • पांच–छह लोगों को पकड़ना याने बड़े पर्वत के शिखर

बहुत पहले से माओवादियों ने शहरी भागों में अपनी जड़ें फैलाई हैं। कुछ नेताओं की गिरफ्तारी से समाज में फैले ये विषाणु समाप्त हो गये हैं ऐसा समझना भूल है। क्योंकि ये पांच–छह तो इस पर्वत के शिखर मात्र हैं। अभी भी प्रकाश में न आए हुए तथा पुलिस की पकड़ से बाहर सैकड़ो की संख्या में ये शहरी माओवादी हमारे आसपास घुम रहे होंगे। उन पर कार्रवाई कब होगी? इन शहरी माओवादियों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। पुलिस ने यह काम शुरू किया है परंतु उनके लिए भी यह उतना सहज साध्य नही है।

माओवादियों की तुलना में शासक की सशस्त्र शक्ति अधिक है, फिर भी इस समस्या का समाधान नही हो रहा है। समस्या के मूल में जाने से यह दिखता है कि संख्या में भले ही कम हो फिर भी माओवादी अपने “ध्येय” से प्रेरित हैं जबकि  हम नही।

  • क्या करें-कौन करें!

माओवाद से संबंधित व्यक्ति एवं संगठनों पर कानूनी कार्रवाई आवश्यक है। सभी राज्य सरकारों द्वारा इन पर कार्रवाई अपेक्षित है। राजनीतिक दलों को यह समझाना अत्यावश्यक है कि माओवादियों का उद्देश समाज में अराजकता मचाना है। इसे रोकने के लिए सभी राजनीतिक दलों को कठोर भूमिका अपनानी होगी। विदेश से उनके लिए आने वाले पैसे पर प्रतिबंध लगाना होगा। छात्रावास, विश्वविद्यालय, शैक्षणिक संस्थाए, महाविद्यालय के युवाओं में माओवादी गतिविधियों में शामिल होने हेतु बरगलाया जाता है। इससे युवाओं को दूर रखने के लिए उनका उद्बोधन आवश्यक है। झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के संगठन, मजदूर इ. को समझाना आवश्यक है। शहरी माओवादियों को जड़ से उखाड़ फेंकना आवश्यक है।

     माओग्रस्त क्षेत्रों से जातीयवाद, उंच-नीच का भेद मिटाकर देशभक्ति, राष्ट्रीय शिक्षा एवं चरित्र तथा लोकतंत्र की जड़े मजबूत करना आवश्यक है।

     माओग्रस्त क्षेत्रों से बेरोजगारी दूर करना जिससे बेरोजगार युवक माओवाद की ओर अग्रसर ना हों।

     शहरों से माओग्रस्त क्षेत्रों में जानेवाले व्यक्तियों एवं संगठनों की निगरानी आवश्यक है।

     बढ़ते शहरीकरण के कारण शहरों में आने वाले अलग-अलग वर्ग के लोगों को मार्गदर्शन देकर माओवादी प्रभाव में जाने से रोकना होगा।

     सभी संदिग्ध व्यक्तियों का संपूर्ण डाटा सरकार एवं सुरक्षा एजेन्सियों के पास होना आवश्यक है।

     समाज में नुक्कड़ नाटक, सभा, पोस्टरों एवं अन्य साधनों द्वारा माओवाद के विरूद्ध जन-जागृती आवश्यक है।

     समाज के वंचित वर्ग के लोगों से सतत चर्चा जिससे वे कुमार्ग की ओर न बढ़े। समाज में सर्वधर्म समभाव की भावना निर्माण करना आवश्यक है।

     माओवाद के मार्ग पर बढ़ने वाले युवकों की निगरानी एवं वहां जाने से पूर्व ही उनका मार्गदर्शन कर उन्हे उस मार्ग पर जाने से रोकना होगा।

  • शासन एवं माओग्रस्त क्षेत्रों में दूरी कम एवं सुसंवाद बढ़ाना

     माओवादी कार्रवाई करने वाले और उन्हे सहायता देने वालों पर कठोर कार्रवाई करना। माओवादियों की हलचल पर नजर रखने हेतु गुप्तचर संगठन स्थापित करना।

     माओवादियों की जानकारी देने वालों को पुरस्कृत करना।

     दुर्गम इलाकों में काम करने वाले उद्योगपतियों पर ध्यान रखना क्योंकि इनमें से अनेक माओवादियों को पैसा देते हैं।

     माओग्रस्त क्षेत्रों से बाहर आनेवाली एवं इस भाग में जाने वाली सभी गाड़ियों की अनिवार्य चेकिंग जिससे अवांछित सामान आ जा न सके एवं संदिग्ध व्यक्तियों की गिरफ्तारी हो सके।

     सोशल मीडिया पर पैनी निगाह रखकर माओवाद की ओर मुड़ने वाले युवकों को पहले ही रोकना।

     उपरोक्त दिए हुए उपायों के अतिरिक्त भी अन्य अनेक उपाय अमल में लाए जा सकते हैं। इन उपायों पर सतत् चर्चा कर और अच्छे नए उपाय खोजें जा सकते हैं।

शहरी माओवादी समाज में अपना प्रभाव बढ़ाने हेतु अलग-अलग प्रकार की  कार्रवाईयां करते हैं। इनकी निगरानी कर उन्हे योग्य उत्तर देने हेतु उपाय करना आवश्यक है। हमें माओवादियों से एक कदम आगे रहने की आवश्यकता है, तभी हम उनका बढ़ता हुआ प्रभाव रोक पाएंगे ।

 

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