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संदर्भ : केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह का डार्विन के सिद्धांत पर दिया बयान –

डार्विन की आत्मकथा में उल्लेख है कि बिगल जाहज पर यात्रा शुरू करने के पहले ही उन्होंने वैदिक साहित्य का अध्ययन कर लिया था। दशावतार और डार्विन के विकासवाद में समानता होने का जिक्र स्वामी विवेकानंद और जवाहरलाल नेहरू भी कर चुके हैं। ऐसे में केंद्रिय मानव संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह का डार्विन के मानव उत्पत्ति संबंधी बयान को तूल दिया जाना व्यर्थ है।

महाभारत में कहा गया है कि भगवान धर्म की रक्षा के लिए हर युग में पृथ्वी पर अवतार के रूप में जन्म लेते हैं। इस मान्यता के अनुसार ही दशावतार हैं। पहला अवतार मछली के रूप में आया। विज्ञान भी मानता है कि जीव – जगत में पहला जीवन – रूप पानी के भीतर ही विकसित हुआ। दूसरा अवतार कच्छप हुआ, जो जल और जमीन दोनों स्थलों पर रहने में सक्षम था। तीसरा वराह ( सुअर ) था, जो पानी के भीतर से धरती की ओर बढ़ने का संकेत था। अर्थात पृथ्वी को जल से मुक्त करने का प्रतीक है। चौथा, नरसिंह अवतार, जानवर से मनुष्यावतार में संक्रमण को प्रतिबिंबित करता है। यहां डार्विन से महज फर्क इतना है कि डार्विन मानव के पूर्वज बंदर को बताते है। पॉंचवां, वामन – अवतार, लघु रूप में मानव जीवन के विकास का प्रतीक है। विष्णु का छठा, परशुराम स्वरूप मनुष्य के संपूर्ण विकास का अवतरण है। इसी अवतार के माध्यम से मानव जीवन को व्यवस्थित रूप में बसाने के लिए वनों को काटकर घर बसाने और बनाने की स्थिति को अभिव्यक्त करता है। परशुराम के हाथ में फरसा इसी परिवर्तन का द्योतक है। सांतवें अवतार राम का धनुष – बाण लिए प्रगटीकरण, इस बात का संकेत है कि मनुष्य मानव बस्तियों की दूर रहकर सुरक्षा करने में सक्षम चुका था। आठवें अवतार बलराम हैं, जो कंधे पर हल लिए हुए हैं। यह मानव सभ्यता के बीच कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विकास को इंगित करता है। नवें अवतार में कृष्ण हैं। कृष्ण मानव सभ्यता के ऐसे प्रतिनिधि हैं, जो गायों के पालन से लेकर दूध व उसके उत्पादों से मानव सभ्यता को जोड़ने व उससे अजीविका चलाने के प्रतीक हैं। कृष्ण ने अर्जुन को कुरूक्षेत्र में गीता का जो उपदेश दिया है, उसे उनका दार्शनिक अवतार भी कहा जा सकता है। दसवां, कल्कि एक ऐसा काल्पनिक

अवतार है, जो भविष्य में होना है। इसे हम ‘ कलियुग ‘ अर्थात कल – पुर्जों के युग अथवा यंत्रवत संवेदनहीन युग से भी जोड़कर देख सकते हैं। दरअसल सफेद घोड़े पर सवार तलवार लिए कल्कि की जो परिकल्पना पुराणकारों ने की है, उस रूप में कल्कि अवतरित होना किसी भी दृष्टिकोण से संभव नहीं है। इसलिए इसे प्रतीकों और रूपकों से ही समझा जा सकता है।

वैदिक धर्म व दर्शन अंधविश् ‍ वास से दूर जिज्ञासा और ­ प्रज्ञा पर आधारित है। प्रज्ञा ( ज्ञान ) और जिज्ञासा ही बौद्धिकता के वे मूल – भूत स्रोत हैं, जो ब्रह्माण्ड में स्थित जीव – जगत के वास्तविक रूप की अनुभूति और आंतरिक मर्म ( रहस्य ) को जानने के लिए आकुल – व्याकुल रहते हैं। इस वैज्ञानिक सोच को उपनिषद् काल में यूँ व्यक्त किया गया है,

यदा चर्मवदाकाशम् वेष्टयिस्यन्ति मानवा :

तदा देवम् अविज्ञाय् दु : खस्यान्तो भविष्यति।

अर्थात, जिस दिन लोग इस आकाश को चटाई की तरह लपेट कर अपने हाथ में ले लेंगे यानी ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जान लेंगे, उस दिन ईश् ‍ वर को जाने बिना मानवता के दु : खों को अंत हो जाएगा। फलत : दशावतार कवियों की कोरी कल्पना नहीं बल्कि जैव विकास – गाथा का पूरा एक कालक्रम हैं, इतिवृत्त हैं।

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