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मीरा की शादी को चार साल हो गये, लेकिन अभी तक वह मां नहीं बन सकी है. ऐसा नहीं है कि उसमें या उसके पति में शारीरिक रूप से कोई कमी है, फिर भी गर्भावस्था को लेकर मीरा के मन का डर उसे गर्भ धारण करने से रोक रहा है. दरअसल मीरा कम उम्र में मां बनने वाली अपनी एक सहेली की गर्भावस्था में होनेवाली परेशानियों को देख कर काफी डर गयी थी. उसका यह डर समय के साथ-साथ ‘टोकोफोबिया’ में बदल गया था.

  ‘टोकोफोबिया’ अर्थात् महिलाओं के मन में गर्भावस्था को लेकर असामान्य भय होना.

टोकोफोबिया को मनोवैज्ञानिकों ने एक तरह का पैथोलॉजिकल फियर यानी बीमारी से जुड़ा डर माना है. आमतौर पर यह किसी महिला के अंदर उस वक्त पैदा होता है, जब वह किसी अन्य महिला को बच्चे को जन्म देते हुए देखती है और वह उस वक्त महसूस होनेवाले दर्द और तकलीफ के बारे में सोच कर इतना घबराने लगती है कि वह खुद बच्चा पैदा करना ही नहीं चाहती है. अगर किसी तरीके से वह तैयार हो भी गयी, तो डिलीवरी के समय वह महिला अपने लिए डॉक्टर से सिजेरियन की मांग करती है.

 दुनिया की सात फीसदी महिलाएं प्रभावित

आजकल सोशल मीडिया पर भी कई लोग प्रेग्नेंसी से जुड़े अपने व्यक्तिगत अनुभवों को शेयर करते हैं. उन्हें पढ़ने के बाद भी कई महिलाओं के मन में गर्भावस्था को लेकर डर पैदा हो जाता है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में करीब सात फीसदी महिलाएं टोकोफोबिया से पीड़ित हैं. वर्ष 2000 में इस बीमारी के बारे मे लोगों को तब पता चला जब  ब्रिटिश जनरल ऑफ साइकेट्री में पहली बार टोकोफोबिया को दिमागी बीमारी मानकर इस पर चर्चा की गयी.

कितने तरह का होता है टोकोफोबिया

टोकोफोबिया को मूलत: दो कैटेगरी में वर्गीकृत किया गया है- प्राइमरी और सेकंडरी. 

ऐसी महिला, जिसने खुद कभी बच्चे को जन्म न दिया हो, लेकिन बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं की तस्वीरें देखकर परेशान हो जाये, उन्हें प्राइमरी कैटिगरी में रखा जाता है. प्राइमरी टोकोफोबिया और पीटीएसडी पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिज्ऑर्डर के लक्षणों में काफी समानता देखने को मिलती है. 

सेकंडरी टोकोफोबिया के लक्षण तब दिखाई देते  है जब कोई महिला खुद किसी तरह के ट्रॉमैटिक बर्थ एक्सपीरियंस जैसे- मिसकैरेज या स्टिलबर्थ से गुजर चुकी हो. इस तरह की परिस्थिति किसी भी महिला के अंदर ट्रॉमा जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकती है. इस स्थिति में गर्भवती महिला को अचानक से पैनिक अटैक आ सकता है, उसे रात में बुरे सपने आ सकते हैं, आदि.

क्‍यों होता है टोकोफोबिया

कई महिलाएं प्रसव को लेकर इतनी अधिक डरी होती हैं कि वे 40 तक की उम्र पार होने के बाद भी गर्भवती नहीं होना चाहती. कुछ महिलाएं अपनी बॉडी शेप को लेकर इतनी फिक्रमंद होती हैं कि वे किसी भी कीमत पर इसे खोना या इस संबंध में कोई रिस्क लेना नहीं चाहती हैं. वहीं कुछ महिलाओं के मन में यह डर रहता है कि मां बनने के बाद उनके पार्टनर उन्‍हें पहले जैसा प्‍यार नहीं करेंगे. कुछ को लगता है कि उनकी जिंदगी में एक नया मेहमान आने से उनका कैरियर प्रभावित हो जायेगी. सबसे ज्यादा डर महिलाओं को प्रसव के दौरान होनेवाले दर्द से होता है.

मां बनना एक खूबसूरत एहसास है, और घर में एक नये मेहमान के आने से खुशियां भी बढ़ जाती हैं. दिन-प्रतिदिन बेहतर होती मेडिकल सुविधाओं ने प्रसव के दर्द को काफी कम कर दिया है. फिर प्रेग्‍नेंसी को लेकर यह फोबिया क्‍यों !

क्या है टोकोफोबिया का इलाज

– किसी भी महिला में टोकोफोबिया के लक्षण दिखते ही उसे काउंसेलर के पास ले जायें. उन महिलाओं से बात करना भी इस समस्या से उबरने में कारगर साबित हो सकता है, जो इस दौर से गुजर चुकी हों.

– टोकोफोबिया से प्रभावित महिलाओं को इस स्थिति से बाहर निकालने में उनके पार्टनर की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है. उन्हें चाहिए कि अपनी महिला साथी की हर तरह से मदद करें. उनके साथ प्यार से पेश आयें और जब भी मौका मिले, उन्हें यह समझाएं कि मां बनना हर महिला के जीवन का एक खुबसूरत एहसास है, इसलिए वह खुद को सकारात्मक रखते हुए अपनी सेहत पर ध्यान दें. 

– महिलाओं को चाहिए कि गर्भावस्‍था से लेकर प्रसव तक के बारे में सभी प्रकार की जानकारी इकट्ठा करें. इस बारे में अन्य लोगों से पूछने के बजाय टीवी या अच्‍छी किताबों से जानकारी प्राप्‍त करें. याद रखें, कई लोग इस खुशी की अनुभूति करने के लिए तरसते हैं. ऐसे में अगर आपको यह मौका मिला है, तो इसके लिए आप ईश्वर को शुक्रिया करें और अपनी गर्भावस्था को हर तरीके से भरपूर एंजॉय करें.

 

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