हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

प्राचीनकाल में हमारे महर्षियों ने वास्तु शास्त्र के विषय में जानकारी दी है, उस पर आज वास्तुविद शोध कर आम जनमानस की समस्या का निदान करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। प्राचीन काल से ही भगवान विश्‍वकर्मा को वास्तुदेवता की संज्ञा दी गयी है। भारतीय वास्तुशास्त का आधार पंचतत्वों एवं जीव का शरीर भी पांचों तत्वों के मेल से ही बना है।वास्तव में इन तत्वों के अनुसार गृह निर्माण एवं रहना श्रेयस्कर माना गया है।सूर्य द्वारा प्राप्त उर्जा से सुख-समृद्धि एवं शांति प्राप्त किया जा सकता है।

प्राचीन काल से ही मानव ही नहीं बल्कि सभी जीव प्रत्येक स्थान को अपने अनुकूल बनाने का अथक प्रयास करते हुए दिखायी देंगे। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो प्रयास द्वारा धीरे-धीरे तेज गति से ज्ञान को अर्जित करता है।इसी कारण अपनी तीक्ष बुद्दि के प्रभाव से मानव अपने आवासीय भवन को उत्तम बनाने में सफल हुआ। वास्तव में वस्त्र-भोजन-मकान सभी के लिये महत्वपूर्ण है। इसके बिना जीवन जीना दुष्कर हो जाता है।

चारों वेदों में ऋग्वेद से ही वास्तु का जन्म हुआ है। इस वेद में आवासीय वस्तु की रचना का वर्णन मिलता है। वैसे वैदिक काल में वैदिक विधि से कराये जाने वाले यज्ञ वेदियों की संरचना एवं यज्ञशाला के निर्माण इत्यादि में होता था। समय बदलने के साथ ही इसका प्रयोग देवालय एवं भवन निर्माण में होनेे लगा जो श्रेष्ठ साबित भी हुआ। भारतीय वास्तु के शीर्ष में भगवान विश्‍वकर्मा का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

शास्त्र में वर्णित है कि वास्तु पुरुष की उत्पत्ति शिव से मानी जाती है। शंकर के साथ अन्धकासुर के साथ युद्ध के परिणामस्वरूप पसीने से वास्तु देवता के उदभव का क्रम माना जाता है जिसे संसार के विकास का प्रथम क्रम की संज्ञा दी गई है। वेद एवं पुराण में भी वास्तु के दर्शन वास्तु भवन के रूप में होते रहे हैं।

गौशाला,पाकशाला,मन्दिर,राजमहल इत्यादि इसके उदाहरण हैं। वास्तु का जितना महत्व पुराने समय में था उससे कहीं ज्यादा आधुनिक युग में है।

वास्तुशास्त्र आवासीय सहित विभिन्न भवनों, स्कूल,कार्यालयों इत्यादि के निर्माण के विषय में बताता है बल्कि सुव्यवस्थित जीवन व्यतीत करने का सुलभ साधन भी बताता है, वास्तुशास्त्रके अनुकूल, सुंदर, कलात्मक,उर्जा से युक्त बन कर सिद्ध होता है। वास्तव में प्रत्येक मनुष्य को वास्तु का पूरा लाभ उठाना चाहिये। यदि हम यह कहें कि वास्तु न केवल भवन निर्माण व सुन्दरता, अनुकूलता बल्कि पंचतत्वों को संतुलित करने की पूर्ण शक्ति वास्तव में वास्तु ज्योतिष से ही उत्पन्न कहा गया हैं। वास्तु को वेद में नेत्र कहा गया है। महर्षियों द्वारा वेदों का प्रयोग केवल अभिष्ट फल की प्राप्ति एवं अनिष्ट के निवारण के लिये किया गया था। ज्योतिष शास्त्र द्वारा किसी घटना के घटित होने का अनुमान पूर्व में ही लगाया जा सकता है। इसी प्रकार वास्तुशास्त्र सभी सिद्धांतों को अपनाकर सुन्दर एवं उपयोगी भवन इत्यादि का निर्माण किया जा सकता है जिसमें निवास करने वाला मनुष्य सुनिश्‍चित लाभ प्राप्त कर सकता है।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu
%d bloggers like this: