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गाय काटने वाले कसाई अगर कल को “गाय बचाओ” रैली निकालें, तो आपको कैसा लगेगा ? कल कोई डाकू अगर “डकैती रोको, जनता को बचाओ” जैसी कोई रैली निकाले तो? मुंबई का माफिया अगर अचानक उठकर “हफ्ता रोको, बिल्डर बचाओ” के नारे लगाने लगे तो, आप क्या समझेंगे ? मुंबई में 26 जनवरी को “संविधान बचाओ” रैली” निकाली गई। इस रैली में शरद पवार, हादिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, सुप्रिया सुले, राजू शेट्टी, शरद यादव जैसे लोग शामिल थे। यह रैली देखकर आप के दिमाग में क्या ख़याल आये ? मेरे दिमाग में जो ख्याल आये वो मैंने पहले तीन वाक्यों में बयाँ किये हैं।

एक अच्छी बात ये थी, ये एक मूक रैली थी। कोई भाषणबाज़ी नहीं हुई। अगर हुई होती तो संविधान का अध्ययनकर्ता होने के नाते मेरा बड़ा मनोरंजन होता। हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी की तो इतनी उम्र भी नहीं की वे संविधान को समझ सकें। संविधान नामक कोई दस्तावेज़ है और उसी के आधार पर देश की सारी राज्यव्यवस्था चलती है, इतना भी उन्हें पता हो तो बहुत है। संविधान का अर्थ क्या है ? लिखित संविधान क्या होता है ? उसे क्यों बनाना पड़ता है ? उसमें बदलाव किये जा सकते हैं या नहीं ? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो संविधान के संबंध में पैदा होते हैं। शरद पवार, सुशीलकुमार शिंदे, शरद यादव, डी.राजा, आदि वरिष्ठ नेताओं को तो शायद इन प्रश्नों के उत्तर पता होंगे। लेकिन बाकी लोगों का क्या ?

“संविधान बचाओ रैली” का उद्देश्य ये बताया गया था कि संविधान खतरे में है। किसके कारण खतरे में है ? भारतीय जनता पार्टी और उसके शासन के कारण खतरे में है। महाराष्ट्र में फडनवीस सरकार है और केंद्र में मोदी सरकार है। फडनवीस सरकार के कारण संविधान कैसे खतरे में आया, इस सवाल का जवाब रात भर सोचने पर भी मुझे नहीं मिल पाया। ये सरकार जनता ने चुनी है। वो अपना काम कर रही है। शिवसेना साथ है। वो रोज झगडा कर रही है। घर में कोई झगडालू पत्नी हो, तो घर में जो माहौल बनता है, वैसा ही कुछ चल रहा है। लेकिन उससे संविधान तो खतरे में नहीं आता। हाँ, सरकार जरुर खतरे में पड़ सकती है और अगर खतरे में पड़ती भी है तो संवैधानिक मार्ग से ही जायेगी।

महाराष्ट्र में कानून और व्यवस्था की स्थिति संतोषजनक है। कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं है। संविधान पूरी तरह से लागू है। कोई ये नहीं कह रहा कि संविधान महाराष्ट्र में लागू नहीं है। यहाँ तक कि राज्यपाल भी नहीं। राज्य में संविधान के अनुसार चले, ये देखना राज्यपाल का ही काम है।

केंद्र के बारे में सोचें, तो नरेंद्र मोदी शासन संविधान के दायरे के बाहर कुछ नहीं कर रहा। संविधान के मूल सिद्धांतों में बदलाव करने का उनका कोई इरादा नहीं दिखता। संविधान के सामाजिक पहलुओं को, सामाजिक न्याय की संकल्पना को वे अपनी तरफ से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। संसदीय लोकतंत्र को भंग करने का उनका कोई इरादा नहीं दिखता। उनका ऐसा भी कोई प्रयास नहीं रहा कि देश के सारे संवैधानिक अधिकार केवल हिंदुओं को ही मिलें, अन्य धर्म के लोगों को नहीं। उल्टा वे संसदीय मर्यादाओं और नीतियों का कड़ाई से पालन करते हुए ही नज़र आते हैं। उनके राजकाज में सारी जनता खुशहाल है, ये तो कहना मुश्किल है। किसानों के प्रश्न हैं, रोजगार की समस्याएँ हैं, महँगाई है, आर्थिक विकास में सबको शामिल करने का प्रश्न है। लेकिन ये सारे प्रश्न शासन की कार्रवाइयों और नीतियों से संबंधित है। उनका संविधान से कोई सीधा संबंध नहीं है। इन प्रश्नों का हल अगर नहीं निकाला जाता है तो उसके परिणाम 2019 में भुगतने होंगे।

लेकिन कहीं भी संविधान पर कोई खतरा नज़र न आने के बावजूद, संविधान को बचाने के नारे देने के पीछे क्या कारण है ? कारण साफ़ है। दलगत राजनीती। ऐसा कोई आरोप तो लग नहीं सकता कि भाजपा की सरकार भ्रष्ट है, हमारी ही तरह उन्होंने काला पैसा इकट्ठा कर रखा है, हमारी ही तरह उनके अपराध जगत से संबंध है, हमारी ही तरह उन्होंने किसानों को बर्बाद कर दिया है। तब इन वामपंथियों ने अकल लगाई और लगे नारे लगाने – “संविधान खतरे में है”। ये बांग सुनकर सारे जिहादी इकट्ठा हो गए। बोलने के लिए तो कुछ था नहीं, इसलिए मूक रैली निकाली।

जिग्नेश, हार्दिक, उमर, सुप्रिया, आदियों की उम्र को देखते हुए कहा जा सकता है कि शायद उन्हें यह पता नहीं होगा कि 1976 में काँग्रेस पार्टी ने 42वाँ संविधान संशोधन किया था। “मिनी कॉंस्टीट्युशन – लघु संविधान”, इन शब्दों में इस संशोधन का वर्णन किया जाता है। इस संशोधन के माध्यम से समाजवाद और सेकुलरिज्म शब्द जबरन घुसाए गए। संविधान बनाते समय डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इन शब्दों का सख्त विरोध किया था। उन्होंने उस समय जो कहा उसका सार इस प्रकार है – “संविधान का काम राज्य के विविध अंगों को नियंत्रित करना है। किसी विशेष व्यक्ति या दल को सत्ता पर बैठाना संविधान का काम नहीं है। शासन की नीतियाँ, समाजव्यवस्था, अर्थव्यवस्था आदि के निर्णय परिस्थिति के अनुसार जनता को ही करने हैं। संविधान में इस प्रकार के बंधन रखना संभव नहीं है। इसका अर्थ लोकतंत्र का विनाश करने के समान है।” जिस काँग्रेस पार्टी ने ये संशोधन किया, आज उसी पार्टी के नेता अशोक चव्हान, उसी पार्टी में पले-बढे शरद पवार, सुशीलकुमार शिंदे, आज संविधान बचाने की रैली कर रहे हैं। जैसे कसाई खुद ही गाय बचाने की रैली कर रहे हों।

संविधान के संदर्भ में 42वाँ संशोधन इतना भयावह था कि हम जैसे अलग विचार रखने वाले लोग तो शायद जिंदा भी नहीं बचते। इस संशोधन ने संसद को संविधान में असीमित बदलाव करने की छूट दे दी थी। इन बदलावों की समीक्षा करने का न्यायालयों का अधिकार भी छीन लिया। राज्यों के अधिकारों पर भी कुठाराघात किया गया। केंद्र के पास भरपूर अधिकार दिए गए। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और लोकसभा के अध्यक्ष के खिलाफ कोई मुक़दमा दायर ना हो सकने का प्रावधान किया गया था। इसका मतलब, ये तीनों मिलकर चाहे जो भी खुराफात करें, क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। जिन देशों में अधिनायकवाद था, उन देशों में ऐसे कानून अधिनायक खुद ही बनाता था। लेकिन लोकतंत्र में ऐसे कानूनों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिस काँग्रेसी संस्कृति में ये सभी लोग पले-बढ़े हैं, उसमें उन्हें “संविधान बचाओ” जैसी बातें कहने का कोई हक़ नहीं है।

दरअसल वे कहना चाह रहे हैं – “हमें बचाओ”। ये सभी अपनी विश्वसनीयता गँवा चुके हैं। महाराष्ट्र भर में कहीं भी कोई गड़बड़ हो, कोई भ्रष्टाचार हो, तो गृहिणी से लेकर सब्जीवाले तक हर नागरिक किसका नाम लेता है? जातिवाद का जहर जब फैलता है तब किसका नाम लिया जाता है ? इन सवालों के जवाब किसी से छिपे नहीं हैं। शरद यादव का तो, महिलाओं के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने का लंबा इतिहास रहा है। हमारा संविधान न तो भ्रष्टाचार करने के लिए कहता है न ही महिलाओं पर अश्लील टिपण्णी करने के लिए। जब इस तरह के लोग “संविधान बचाओ” रैली निकालते हैं तो लगता है मानों चोर-डाकू ही लोगों की सम्पति की रक्षा की चिंता में सड़क पर उतरे हैं।

भारत में संविधान लागू हुए आज 69 वर्ष हो चुके हैं। दुनिया का कोई भी संविधान परिपूर्ण नहीं होता। हमारा भी नहीं है। जब जब आवश्यकता पड़ी, उसमें 120 से अधिक संशोधन किये गए हैं। संविधान के दो भाग हैं। एक भाग में राज्यसंस्था और उसके विविध अंगों का कार्य सुचारू रूप से कैसे चले, उनका आपसी तालमेल कैसा हो, आदि के बारे में नियम हैं। ये तो हुआ तकनीकी भाग। दूसरा भाग संविधान की आत्मा है। संविधान किन मूल्यों पर आधारित है, यही संविधान की आत्मा होती है। अमेरिकी विद्वान ग्रीनविले ऑस्टिन ने संविधान की आत्मा का वर्णन में बहुत ही सरल और सुंदर भाषा में किया है। उन्होंने एक पुस्तक लिखी है – “इंडियन कॉंस्टीट्युशन : कॉर्नर स्टोन ऑफ़ अ नेशन”।

हमारा संविधान हजारों वर्ष पुराने जीवन मूल्यों पर आधारित है। ये जीवनमूल्य हैं – उदारवाद, सर्वसमावेशी, आम सहमती बनाकर निर्णय लेना, समन्वय, मतभेदों का आदर, सभी उपासना पंथों का सम्मान, व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता, महिलाओं का सम्मान, सत्य एक है किन्तु उसे प्रस्तुत करने के मार्ग भिन्न हैं और सभी मार्ग अंततः सत्य तक ही पहुँचते हैं। भारतीय मानसिकता कभी अतिवादी विचार नहीं करती। दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं को भी समन्वय के माध्यम से जोड़ने का प्रयास करती है। एक हिंदू बहुल देश का यही स्वभाव है। हिंदू का अर्थ है भारत में पैदा हुए सभी धर्म। ये स्वभाव जब तक रहेगा, तब तक संविधान की आत्मा संविधान को छोड़कर नहीं जा सकती।…और ये स्वभाव बदलने का सामर्थ्य भारत में क्या, दुनिया की किसी भी ताकत के पास नहीं है। इसलिए आत्मतत्व से हमारा संविधान चिरंजीवी है। संविधान के तकनीकी भाग में परिस्थिती के अनुसार, तत्कालीन पीढ़ी के सामने खड़ी चुनौतियों के अनुसार, परिवर्तन होते रहेंगे। प्रश्नों के उत्तर ढूँढे जाते रहेंगे। यही हमारे संविधान की शक्ति है। उस पर कुठाराघात करने की ताकत न किसी व्यक्ति में है और न किसी संगठन में।

संविधान के आत्मतत्व का जो भाग है उसपर, विदेशी, मुस्लिम और अंग्रेज़ आक्रमणकारियों ने बहुत आघात किये हैं। अभी “पद्मावत” फिल्म चर्चा में है। अल्लाउद्दीन खिल्जी की तलवार ने हमारे आत्मतत्व पर हमला किया। इसी तलवार ने पद्मिनी को जौहर करने पर मजबूर किया। “अल्लाउद्दीन” नाम का ये कलंक हमारे माथे पर लगा हुआ है। हमारे इस आत्मतत्व पर कुठाराघात करने का सामर्थ्य केवल अभारतीय विचारों और आक्रमणों में है। इस विचारधारा और इस मनोवृत्ति का सेकुलरिज्म के नाम पर समर्थन करने वाले कई विद्वान राजनेता हैं। ये सब अल्लाउद्दीन खिल्जी की औलादें हैं। संविधान को और देश को असली खतरा इन्हीं खिल्जी की औलादों से है। इसलिए हमें जागरूक रहना होगा। हमारी संविधान सभा ने लंबी चर्चा कर, डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने दिन-रात एक कर, बड़े परिश्रम से इन खिल्जी की औलादों को समाप्त करने वाला संविधान हमें दिया है। उसकी पवित्रता बनाए रखना हमारा कर्तव्य है।

-हिंदी अनुवाद : अमोल दामले, 9730070023, amoldamle2000@gmail.com

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