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नौ हज़ार एक सौ बत्तीस दिन। यानि पच्चीस साल। मानव के जीवन में ये अवधि बहुत ज्यादा होती है, लेकिन एक संस्था के जीवन में ये बहुत कम है। यमगरवाडी परियोजना को इस साल पच्चीस वर्ष पूर्ण हो गए। 27 अप्रैल 1990 को मैं, गिरीश प्रभुणे, दादा इदाते, सुखदेव नवले, चंद्रकांत गडेकर, मधुकरराव व्हटकर, आदि कार्यकर्ता, श्री रमेश चातुफलेजी द्वारा दान की गई अठारह एकड़ भूमि को देखने के लिए यमगरवाडी आये थे। कड़क गर्मी के दिन थे। खुले मैदान में एक बड़ा बेर का पेड़ था। उसी पेड़ की छाँव में हम लोग बैठे थे। बेर कहते ही शबरी की याद आ जाती है। ये शबरी के बेर दिन-ब-दिन मीठे होते चले जायेंगे, ये हमने कभी सोचा नहीं था। सवाल था कि आखिर इस भूमि का किया क्या जाए ?

गिरीश प्रभुणे के मन में आदिवासी बच्चों के लिए एक छात्रावास शुरू करने का विचार था। छात्रावास शुरू करने के लिए कमरे बनवाना पड़ेंगे। उनके भोजन की व्यवस्था करनी पड़ेगी। उनके स्वास्थ्य की चिंता करनी पड़ेगी। शिक्षा की चिंता करनी पड़ेगी। ये सब काम हम कैसे कर पायेंगे ? ये सारे विचार स्वाभाविक रूप से हमारे मन में आने लगे। लेकिन वहाँ बैठा हुआ हर व्यक्ति कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं था। वो संघ-कार्यकर्ता था। हमारे साथ संघ आएगा। इस बारे में किसी को शंका नहीं थी। हमने निर्णय लिया। हम काम शुरू करते हैं। संघ हमारा साथ जरुर देगा और हुआ भी ऐसा ही।

इस भूमि पर एक बेर का पेड़, एक टूटा कुआँ और टूटी झोपडी थी। उसी स्थान पर आज चार सौ बच्चों का विद्यालय, बच्चियों का एक छात्रावास, लड़कों का एक छात्रावास, शिक्षकों और कर्मचारियों के सुंदर निवास स्थान, सेवाव्रती कार्यकर्ताओं के रहने की स्वतंत्र व्यवस्था, आदि है। यह भव्य संकुल 25 वर्षों में खड़ा हुआ है। प्रभुणे चलते रहे। घूमते रहे। तुकाराम माने और सरस्वती माने, ये दंपति अपना गाँव का घर छोड़कर इस मैदान में रहने आ गए। एक ऐसा मैदान जो साँप-बिच्छुओं का प्राकृतिक निवास स्थान था। पशु-पक्षी बिरले ही नज़र आते थे। आज इस मैदान में बगीचे बने हुए हैं। भटकेश्वर का मंदिर है। भरपूर पेड़ हैं। चौबीस घंटे पानी देने वाला बोरवेल है। एक बड़ा-सा कुआँ है। 27 अप्रैल 1990 को इसका कोई चित्र हमारी आँखों के सामने नहीं था।

आँखों के सामने था तो आदिवासी समाज। उस समाज में जिनका जन्म हुआ, उन्हें इस समाज की पीड़ाएँ पता थी। मुझ जैसे शहरी कार्यकर्ता को तो इस बारे में शून्य जानकारी थी। गिरीश प्रभुणे तो ग्रामीण भाग में और वनों में बहुत घूमते थे। वे भले उस समाज के नहीं थे, लेकिन उस समाज से वे पूरी तरह से समरस हो चुके थे। उस समाज के दुःख, कष्ट उन्होंने बहुत करीब से देखे थे। आदिवासी समाज के लिए तो सुख नाम का कोई शब्द ही नहीं था। अनिकेत अवस्था में रहना, पेट भरने के लिए भटकना, असहाय जीवन जीना, पुलिस की नज़रों से बच कर रहना, गाँव के गुंडों से मार खाना, अकिंचन जीवन जीना, कोई सम्मान नहीं, कोई सुरक्षा नहीं, कोई सहानुभूति नहीं। यही उनका भाग्य था।

राष्ट्र को वैभवशाली बनाने के लिए हमारे सभी बंधुओं को हमारे साथ लेकर चलना होगा। इसी को हमने अपना कर्तव्य समझा और यही हमारे काम की प्रेरणा थी।

एक समय हमारा राष्ट्र वैभव के शिखर पर था। विश्व के सकल उत्पाद में हमारी भागीदारी 25 से 30% थी। घर की जरुरत पूरी होने के बाद सारा पूरा माल बाजार में बेचने के लिए रख दिया जाता था और दुनिया भर से सोने और चाँदी का प्रवाह भारत में आ रहा था। इसलिए भारत माता का वर्णन स्वर्णभूमि शब्द से किया जाता था। इसी सोने के लालच में विदेशी लोग आक्रमणकारी बनकर भारत को लूटने के लिए आये। ये सोने का प्रवाह भारत में कौन लाया ? ये प्रवाह भारत में उन्हीं अकिंचन, अनिकेत और असहाय बंधुओं ने लाया। उनके हाथों में कला है। कौशल है। असीमित मेहनत करने के लिए सदा तैयार रहते हैं। समूह में रहने के आदत है। सैंकड़ों सालों की उपेक्षा के कारण कुछ अंधविशवास, कुछ बुरी रूढ़ियों के शिकार बन गए हैं। अंग्रेजों ने अपनी सरकार पर खतरा टालने के लिए इनमें से कुछ जातियों को अपराधी जाति घोषित कर दिया। भारत की बहुत बड़ी श्रम-शक्ति और उत्पादन-शक्ति अंग्रेजों ने नष्ट कर दी।

छात्रावास शुरू हुआ। प्रारंभ के पाँच-छः वर्षों में कई मुसीबतें आयीं। कोई और संस्था होती तो कब की इस योजना को छोड़ देती। कई लोग सोचते थे कि ये अपने बस का नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र की संघ-शक्ति ने ऐसा कुछ नहीं होने दिया। मैंने “विवेक” के माध्यम से सभी पाठकों को अपील की। वार्षिक शुल्क 150/- के साथ केवल 1/- इस परियोजना के लिए दें। कई पाठक कहते थे कि माँगा भी तो केवल एक रूपया ? किसी भी पाठक ने एक रूपया नहीं दिया। जिसने भी दिया सौ, हजार और लाख में दिया। किसी से छात्रावास के बच्चों के लिए अनाज माँगने जाओ तो उत्तर मिलता था – “सिर्फ अनाज से क्या होगा? तेल-नमक-मिर्ची भी ले जाओ।” बिना माँगे “विवेक” के पाठकों ने भरपूर दिया।

मुझे कल्पवृक्ष की याद हो आती थी। कई बार मुझे ऐसे अनुभव आये हैं कि हमारा समाज एक बहुत विशाल कल्पवृक्ष है। जो भी इच्छा हो। इससे कुछ भी माँगो, ये भरपूर देता है। एक बार इस प्रकल्प को देखने सतीश हावरेजी आये। बिन माँगे उन्होंने एक लाख रुपये का चेक दे दिया। जयलक्ष्मी मुंडकरजी तो, स्वयं को पैसो की जरुरत होते हुए भी, “विवेक” के दफ्तर में आयीं और बिना माँगे चेक मेरे हाथ में रख दिया। डोंबिवली के अन्ना नाबरजी ने विवेकानंद विद्यालय के विद्यार्थियों की मदद से पूरा एक ट्रक अनाज भेज दिया। डोंबिवली के गणेश मंदिर ने उतना ही अनाज, धन और तेल के डब्बे भेजे। अगर हर अनुभव यहाँ लिखूँ तो ये लेख न जाने कितने पन्नों का होगा। संघ के साथ कोई संबंध न होते हुए भी मेरे बड़े दामाद ने बिना माँगे लाखों रुपये इस प्रकल्प के लिए दिये। तब मुझे गीता के एक वचन की याद हो आयी – “थोडासा धर्मकार्य भी बहुत महान परिणाम देता है।”

पुराने कार्यकर्ता चले गए। उनका स्थान नए कार्यकर्ता लेते गए। विनोद पेंढारकर, अप्पा लातुरे, बिपिन शाह, जैसे लोगों ने इस प्रकल्प के निर्माण कार्य के लिए जो परिश्रम किये और जो धन खड़ा किया वो सचमुच प्रशंसा के योग्य है। उन्हीं के परिश्रम से यमगरवाडी का यह संकुल पुरी शान से खड़ा है। कई कार्यकर्ता “इदम् न मम” कहते हुए बाहर चले गए। यह इतना आसान नहीं होता। कार्यकर्ता के मन में कब अहंभाव आ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। सब मेरे कारण हो रहा है, कोई भी सोच सकता है। लेकिन संघ के संस्कारों की विशेषता कुछ और ही है। श्रीगुरूजी ने सभी कार्यकर्ताओं को, इस जन्म में तो क्या हर जन्म में काम आने वाला, एक मंत्र दिया है – “मैं नहीं। तुम।”

श्री माधवराव गायकवाड, चंद्रकांत गडेकर, रावसाहेब कुलकर्णी, मधुकर व्हटकर, जैसे कार्यकर्ताओं का क्या वर्णन करूँ !! बालासाहेब देवरस के शब्दों में कहूँ तो, सभी देवदुर्लभ कार्यकर्ता हैं। पहले दिन से इस प्रकल्प के लिए अपार परिश्रम कर रहे हैं। अपेक्षा शून्य। धन की अपेक्षा का तो प्रश्न ही नहीं। मान, सम्मान, पुरस्कारों की भी अपेक्षा नहीं। मिल जाये तो आनंद है, न मिले तो कोई दु:ख नहीं।

पच्चीस साल के इस सफ़र का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव आया 13 फरवरी को महाशिवरात्रि मिलन के समय। अब यमगरवाडी प्रकल्प के सारे सूत्र प्रो.डॉ.सुवर्णा रावल और उनके सहयोगी डॉ.अभय शाहपुरकर, नरसिंह झरे, शालीवाहन, उमाकांत मिटकर, गिरीश कुलकर्णी, जैसे कई कार्यकर्ताओं के हाथ में है। इस प्रकल्प में हम और क्या बेहतर कर सकते हैं, बस यही विचार सुवर्णाजी के मन में रहता है। हमारे विद्यालय में दसवीं तक शिक्षा का प्रबंध है। आगे क्या होगा ? शुरू में विचार था कि पहली से सातवीं तक की शिक्षा का प्रबंध किया जाए। लेकिन सातवीं के बाद क्या होगा ? बस यही सोचकर हाईस्कूल तक की व्यवस्था की। अच्छे शिक्षक भी मिले। संस्था जो भी वेतन दे दे, उसी में काम करने वाले समर्पित शिक्षक मिले। अब हाईस्कूल की मान्यता भी मिल चुकी है। अब फिर वही प्रश्न है। दसवीं के बाद, आगे क्या होगा ?

नए कार्यकर्ताओं को उत्तर भी जल्द मिल गया। कौशल प्रशिक्षण का उपक्रम शुरू किया जाए। उस पर चर्चाएँ शुरू हुई। संघ के अधिकारीयों ने भी मान्यता दी। अध्यात्म और योगविद्या के आदि पुरुष श्रद्धेय लाहिरी गुरूजी से संपर्क हुआ। उन्होंने सारी जानकारी ली और “विश्वकर्मा औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र” के नाम से यह कार्य शुरू करने का निर्णय हुआ। लाहिरी गुरूजी ने अपने शिष्यों में से कुछ तकनिकी के जानकार लोगों, व्यवसायियों को भी इस प्रकल्प के साथ जोड़ा। पंधरा-बीस करोड़ की भव्य परियोजना सभी कल्पनाओं से आकार में आने लगी।

इतनी बड़ी परियोजना के लिए शासन का सहयोग तो आवश्यक है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से इस बारे में बातचीत शुरू हुई। यमगरवाडी की ख्याति उन तक पहुँच चुकी थी। हमने कहा कि हम महाशिवरात्रि के दिन संस्था के पास तुलजापुर के पास स्थित भूमि पर शिलान्यास का कार्यक्रम कर रहे हैं। उसमें आपको आना ही होगा। उन्होंने अपना अनुमोदन दिया और 13 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन “विश्वकर्मा औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र” की परियोजना के शिलान्यास का भव्य कार्यक्रम संपन्न हुआ।

जिनके कौशल और परिश्रम के बल पर किसी समय स्वर्णभूमि भारत तैयार हुआ था, उनके ऋण को कुछ हद तक कम करने के लिए एक छोटा-सा प्रयास महाशिवरात्रि के दिन शुरू हुआ। फिर वही। पहले दिन की ही भांति स्थिति आयी। काम शुरू करना था पर साधन नहीं थे। आज संस्था के पास क्या है ? समर्पित कार्यकर्ताओं का एक समूह, कल्पवृक्ष की भाँती खड़ा सदैव तत्पर समाज और देशव्यापी संघ का पुण्य। मुख्यमंत्रीजी और नितिन गडकरीजी ने सभी प्रश्नों से संबंधित संबोधन दिया। सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने भी मार्गदर्शन किया। अब धीरे-धीरे निर्माण कार्य शुरू होगा। भटकने वाले आदिवासी समाज के बच्चे यहाँ वस्त्रोद्योग, धातुकार्य, बढई कार्य, चिनाई कार्य, जैसे आधुनिक प्रशिक्षण लेंगे। पारंपरिक कौशल को आधुनिकता का समर्थन मिलेगा। आधुनिक औजार और कम्प्यूटर की ही मदद होगी।

नौ हज़ार एक सौ बत्तीस दिन के इस सफ़र पर लेख लिखते-लिखते एक दिन और हो गया है। भगवान् शंकर इस समाज के आराध्य हैं। भगवान् शंकर का अर्थ है लगातार भ्रमण, भगवान् शंकर का अर्थ है कला और ज्ञान का भंडार, भगवान् शंकर अस्त्रों के जनक हैं, योगविद्या के जनक हैं। कहते हैं कि शिव की पूजा शिव होकर ही की जा सकती है। अर्थात जिसकी भक्ति करें उसके जैसा बनने का प्रयत्न करें। पूरी तरह वैसा बन जाना तो संभव नहीं है। लेकिन उस दिव्यता का एक छोटा-सा अंश भी अगर हम अपने अंदर जागृत कर सकें तो भी कम नहीं है। तुलजापुर का ये भूमिपूजन, पूर्णत्व का अंशरूप से पूजन करने का एक छोटा-सा प्रयास है। इस संकल्प में अपने स्वभाव और प्रथा के अनुसार “विवेक” के पाठक भी भागीदारी करेंगे, इसमें कोई शंका नहीं। क्योंकि ये प्रकल्प और ये संकल्प हम सभी का है।

-रमेश पतंगे

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