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सूर्य

  इंट्रो : जीवन के हर पहलू का
भरोसेमंद उत्तर भारतीय ज्योतिष में मिलता है. सभ्यता की शुरुआत से ही यहां के ऋषियों
ने ब्रह्माण्ड के तमाम ग्रहों के हमारे जीवन पर पड़ने  वाले प्रभाव का सार्थक अध्ययन किया है. वर्षों की
गवेषणा के बाद यह निर्णय निकला कि पृथ्वी पर रहने वाले मानवों के जीवन पर नौ ग्रहों
तथा उनकी गति का प्रभाव पड़ता है. ये ग्रह हैं – सूर्य, चंद्र, गुरु, बुध, शुक्र, मंगल,
शनि, राहु और केतु. अगले कुछ हफ़्तों तक हम “ज्योतिषाचार्य और काशीविश्वनाथ मंदिर के न्यासी” पंडित प्रसाद दीक्षित द्वारा मनाव जीवन पर सभी ग्रहों के सकारात्मक और नकारात्मक
प्रभावों की सार्थक विवेचना पढ़ेंगे,

इसी क्रम में आज हम ग्रहों का राजा कहे जाने वाले प्रथम ग्रह “सूर्य” के प्रभावों का वाचन करेंगे.

ब्रह्मांड में अपनी आकाशगंगा जैसे अनेक तारामंडल हैं l सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते रहते हैं l यह सभी सूर्य की निरंतर परिक्रमा करते रहते हैं l हमारी पृथ्वी भी सौरमंडल की एक सदस्य l है और वह सूर्य से आकर्षित होकर अनवरत उसकी परिक्रमा करती रहती है l पृथ्वी में भी आकर्षण शक्ति है, जिसके कारण सूर्य उसे प्रकाश, ताप इत्यादि भेंट करता रहता है l इसके फलस्वरुप पृथ्वी की जीव धारियों में प्राण एवं शक्ति का संचार होता है l ग्रहों में जो ग्रह सूर्य से जितना निकट होता है उसका वेग सूर्य के प्रभाव से उतना ही तेज हो जाता है l सूर्य पूर्व दिशा का स्वामी, आत्मपरक, अग्नि तत्व प्रधान प्रकृति का, पुरुष प्रधान एवं क्षत्रिय गुणों से युक्त होता है l इसका स्वरूप कालिमा के साथ रक्तिम बहुल वर्ण लिए हुए, भव्य गंभीरता लिए हुए प्राकृतिक गुणों से संपन्न, ओजस्वी मुखमंडल, चेहरा लंबाई की अपेक्षा चौड़ाई लिए हुए, बात में मधुर किंतु शीघ्र उग्र स्वभाव का होना, पराक्रम से कार्य करने वाले, प्रतिशोध लेने की क्षमता अत्यंत तीव्र होती है l सूर्य की दृष्टि किसी भी ग्रह पर पड़ने से वह ग्रह Chail वह आगरा क्षीण हो जाता है l सूर्य की उच्च राशि मेष एवं नीच राशि तुला है l अपनी उच्च राशि मेष के सूर्य के साथ बुद्ध के अलावा कोई भी ग्रह बैठा हो तो वह अस्त हो जाता है l बुद्ध को राजकुमार कहते हैं, अगर बुद्ध सूर्य के साथ हो तो सूर्य की महादशा काल एवं अंतर्दशा काल बुध + आदित्य योग बनाकर विशेष फलदाई होता है l यदि अपनी उच्च राशि का सूर्य एकादश भाव में हो तो राजयोग बनाता है l यदि अपनी नीच राशि का सूर्य किसी भी ग्रह के साथ बैठा हो तो सूर्य तथा साथ में बैठे ग्रह का प्रभाव बढ़ता है और साथ में बैठने वाला ग्रह अपने अनुकूल अथवा प्रतिकूल फल प्रदान करने में पूर्ण सक्षम होता है l

सूर्य हड्डी, ह्रदय और नेत्र का प्रमुख कारक ग्रह होता है l कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अन्य ग्रहों के योग से एक नए रोग को उत्पन्न कर देते हैं l सूर्य एवं चंद्र की युक्ति यदि रोग स्थान में हो तो हृदय रोग अथवा जलंधर रोग को उत्पन्न करता है l छठे भाव में सूर्य मंगल और केतु की युक्ति से अथवा सूर्य चंद्र के एक साथ होने से भेंगापन अथवा दृष्टि दोष होता है l इसी भाव में सूर्य शुक्र की युक्ति से गुप्त रोग अथवा गुप्तांग रोग, सूर्य मंगल की युक्ति से जोड़ों में दर्द, सूर्य – राहु – बुध की युति से स्त्रियों का रोग, शनि की युक्ति सूर्य के साथ कुंभ राशि अथवा मकर राशि में हो तो वायु विकार, सूर्य एवं राहु की युक्ति लग्न, छठे एवं अष्टम भाव में हो तो हार्टअटैक होना सुनिश्चित है l सूर्य, राहु एवं शनि तीनों पाप ग्रह एक साथ रोग स्थान अथवा छठे भाव में हो तो पोलियो की शिकायत का होना सुनिश्चित है l कर्क राशि का सूर्य शनि की दृष्टि से युक्त हो तो बवासीर की बीमारी, अष्टम भाव अर्थात मृत्यु स्थान में बैठा सूर्य मंगल एवं शनि से दृष्ट हो एवं साथ ही चंद्र राहु से ग्रसित हो अथवा प्रभाव में हो तो मिर्गी रोग का होना सुनिश्चित है l यदि लग्न अशुभ, सूर्य शत्रु क्षेत्रिय तो सूर्य की महादशा काल में एवं शुक्र की अंतर्दशा काल में सिर पीड़ा, कुष्ठ रोग, गुप्तांग रोग इत्यादि रोग से ग्रसित होना निश्चित है l सूर्य के मित्र ग्रह गुरु, मंगल, चंद्र एवं बुध हैं जबकि शत्रु ग्रह शनि, शुक्र, राहु एवं केतु हैं l सूर्य मित्र के घर अथवा मित्र ग्रह के साथ बैठा हो तो उत्तम शुभ फल देता है, जबकि शत्रु के घर अथवा शत्रु ग्रह से युक्त हो तो निर्बल होकर फल प्रदान करता है l

जन्मांग कुंडली के बारहवें भाव में सूर्य का शुभ अथवा अशुभ फल इस प्रकार होता है – प्रथम भाव अथवा लग्न में सूर्य हो तो जातक साहसी, दृढ़ इच्छाशक्ति वाला, नेत्र रोगी, यात्रा प्रेमी, पुरुष प्रधान प्रकृति का, तेज आवाज का धनी, पराक्रमी, उग्र स्वभाव, संयुक्त रोग से ग्रसित, लाल वर्ण लिए हुए होगा l द्वितीय भावस्थ सूर्य जातक को त्यागी, भाग्यशाली, पशुपालन में लाभ प्राप्त कराने वाला, धातु व्यवसाय से लाभ, सम्मानित, ओजस्वी वक्ता किंतु अपने परिवार में दुखी रहने वाला बनाता है l तृतीय भावस्थ सूर्य जातक को पराक्रमी एवं प्रतापी बनाता है l भाइयों से विरोध, बुद्धिमान, धनवान भाग्यशाली, विख्यात, परोपकारी, अध्ययन – अध्यापन में रुचि रखने वाला बनाता है l चतुर्थ भावस्थ सूर्य जातक को हड्डी संबंधित कष्ट से युक्त, भाई – बहन से युक्त, शत्रु को परास्त करने वाला एवं दयालु प्रकृति का बनाता है l पंचम भावस्थ सूर्य जातक के लिए शुभता का प्रतीक होता है l जातक बुद्धिमान, ज्ञानी, 22 वें वर्ष में उन्नति करने वाला, अल्प संतति वाला बनता है l षष्ट भावस्थ सूर्य जातक को सरकार से सम्मान दिलाने वाला, मित्रों पर खुलकर पैसा खर्च करने वाला, वीर, साहसी, शत्रुता, कर्तव्य पालक, चतुर, स्किन संबंधित बाधाओं से युक्त करता है l सप्तम भावस्थ सूर्य पत्नी को रोगी, शारीरिक कष्ट देने वाला, सरकार अथवा राज्य से पीड़ित, कामुक, अति क्रोधी, गुप्त शत्रु अथवा कई शत्रुओं से युक्त एवं अभिमानी पत्नी की प्राप्ति कराता है l अष्टम भावस्थ सूर्य जातक जातक को चिंतित, रोगों से युक्त, पीड़ा से अल्प संतति वाला, धन को चोरी कराने वाला, मृत्यु के समय प्रसिद्धि में सहायक होता है l नवम भावस्थ सूर्य जातक को तपस्वी, योगी, भाइयों से पीड़ित, नौकरी से युक्त, पिता से विरोध, सभी धर्मों में आस्था रखने वाला एवं पिता का सुख अल्पकाल तक प्राप्त कराता है l दशम भावस्थ सूर्य जातक को पिता के धन से दुखी अथवा पारिवारिक मुकदमे को लड़ाने वाला, किंतु प्रभावशाली, यशस्वी, भाग्यवान, राज्य अथवा सरकार से लाभ प्राप्त कराने वाला बनाता है l एकादश भावस्थ सूर्य सूर्य ग्रह जातक को महान, अकस्मात धन प्राप्त करने वाला, शत्रु का विनाश करने वाला, स्वयं शनै – शनै धनवान बनाने वाला, सुखी, सदाचारी, उच्च महत्वाकांक्षी एवं लोकप्रिय बनाता है l यदि एकादश भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि मेष का हो तो जातक स्वत राजा के समान सुख भोगने वाला होता है l बारह भाव में सूर्य एकादश भाव का प्रमुख कारक ग्रह होता है l द्वादश भावस्थ सूर्य जातक को बुद्धिहीन, ब्रह्मर्षि, पिता का विरोधी, धन का व्यय कराने वाला, समाज में अपमानित होने वाला, यौन l अवस्था से ही उदर कष्ट का शुरू हो जाना और अपयश का मिलना निश्चित है l इन सब बातों के विपरीत अपनी नीच राशि तुला का सूर्य द्वादश भाव में उत्तम शुभ फल प्रदान करता है l

उक्त विवेचना से स्पष्ट है कि कुंडली में सूर्य आपके लिए शुभ है अथवा अशुभ l यदि सूर्य उत्तम न हो तो सूर्य का मंत्र ” ॐ घृणि सूर्याय नमः ” मंत्र का सात हजार जप करना श्रेयस्कर होता है l सूर्य ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा हो तो माणिक कदापि धारण ना करें क्योंकि ऐसा करने से सूर्य और तेज होगा और उसी प्रकार ज्यादा से ज्यादा नुकसान भी करेगा l सूर्य ग्रह से आप अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए सूर्य ग्रह की वैदिक धर्म से शांति कराकर सूर्य यंत्र धारण करें तो श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होता है l यदि सूर्य कुंडली में उत्तम स्थान में बैठा हो और अन्य शत्रु ग्रहों से युक्त होकर उत्तम फल प्रदान न कर पा रहा हो तब उत्तम फल प्राप्ति के लिए आप अपनी अनामिका उंगली में स्वर्ण में अथवा चांदी में माणिक धारण कर सकते हैंइससे सर्वोत्तम लाभ अवश्य प्राप्त होगा l

( पंडित प्रसाद दीक्षित, ज्योतिषाचार्य एवं न्यासी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी l

मोबाइल नंबर – 98390 57336)

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