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इंट्रो : दोनों देशों के बीच बाकायदा औपचारिक राजनयिक सम्बंध होने के बावजूद पाकिस्तान जिस तरह सीमा रेखा पर लगातार तनाव बनाए रखना चाहता है उससे यह साबित होता है कि उसकी नीयत भारत को लगातार परेशान करने की है और उसी दहशतगर्दी को पनाह देने की राह पर चलने की है जिसे पूर्व फौजी हुक्मरान जनरल जियाउलहक ने ईजाद किया था कि भारत को हजार जख्म दो।

 

केसर की घाटी हिन्दुस्तानी लहू से नहाई हुई है। रोजाना शहीदों की तस्वीरों के साथ खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। हर रोज शहादत, हर रोज शोक संदेश, हर रोज श्रद्धा सुमन। मुल्क की आम अवाम बेचैन और स्तब्ध है। शहीदों के परिजनों के करूण क्रंदन की गूंज समूचे देश को झकझोर रही है। विदित हो कि २०१७ में पाकिस्तान ने ७८० बार सीजफायर का उल्लंघन किया है। दुस्साहस का आलम तो यह है कि पाक रेंजरों ने राजौरी और पुंछ में एलओसी पर भारतीय चौकियों को निशाना बना कर एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल तक दागी है।
 
कई जानकारों का मत है कि आपरेशन आल आउट ने कश्मीरी आतंकियों के बड़े नामों को मौत की नींद सुला दिया है जिससे बौखला कर आतंकी हमलों में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। स्वयं के वजूद की शिनाख्त को जिंदा रखने के लिए आतंकियों की आक्रामता बढ़ी है। दरअसल पाकिस्तान की ओर से संचालित किए जा रहे आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी और सब्जार अहमद की मौत के बाद पाकिस्तान को गहरा आघात लगा है। कारण पाकिस्तान ने इन दोनों को ही कश्मीर घाटी में युवाओं को बरगलाने का ठेका दे रखा था। बदले में पैसा, हथियार और ऐशो आराम का सामान इन आतंकियों को भेजा जाता रहा है।
 
पाकिस्तान घाटी के उन युवाओं, नौजवानों को भारतीय सेना के विरुद्ध खड़ा करना चाहता है, जो कल के कश्मीर का उज्ज्वल भविष्य गढ़ सकते हैं। पाकिस्तान जहां एक ओर आतंकियों की घुसपैठ करा कर कश्मीर को हथियाने का प्रयास कर रहा है, वहीं स्थानीय युवाओं को लालच और भयभीत कर भारतीय सेना के खिलाफ बंदूक उठाने के लिए भी जोर लगा रहा है। बिना शक भारतीय सेना की तरफ से भी बराबर की जवाबी कार्रवाई की गई है और पाकिस्तान को सबक सिखाने का भरपूर प्रयास किया गया है मगर इसके नतीजे में हालात में किसी तरह का बदलाव नहीं आया। यहां तक कि भारत की जांबाज सेनाओं ने पाक अधिकृत कश्मीर में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक भी की किन्तु उसके बाद भी पाक ने सीमा पर किसी प्रकार का शांतिपूर्ण वातावरण बनाने की कोशिश नहीं की और वह बार-सीमा रेखा का उल्लंघन करता रहा।
 
दोनों देशों के बीच बाकायदा औपचारिक राजनयिक सम्बंध होने के बावजूद पाकिस्तान जिस तरह सीमा रेखा पर लगातार तनाव बनाए रखना चाहता है उससे यह साबित होता है कि उसकी नीयत भारत को लगातार परेशान करने की है और उसी दहशतगर्दी को पनाह देने की राह पर चलने की है जिसे पूर्व फौजी हुक्मरान जनरल जियाउलहक ने ईजाद किया था कि भारत को हजार जख्म दो। यह पूरी दुनिया को मालूम है कि पाकिस्तान एक पुख्ता और मुकम्मल लोकतंत्र नहीं है और वहां की फौज का उसकी विदेश नीति तय करने में अहम किरदार रहता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि पाकिस्तान में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का कोई औचित्य नहीं। वहां वास्तविक शक्तियां मजहबी जुनून से प्रेरित सेना और कट्टरपंथियों के हाथों में है। पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक हुसैन हक्कानी की पुस्तक ‘बिटवीन द मॉस्क एंड द मिलिट्री’ और क्रिश्चियन फेयर की पुस्तक ‘फाइटिंग टू द एंड- द पाकिस्तान आर्मी वे ऑफ वार’ में पाकिस्तानी सेना और मुल्लाओं की सांठगांठ का विस्तार से विवरण है। उनका सार यही है कि पाकिस्तान का इकलौता निशाना केवल भारत है।
 
दरअसल पाक फौज की रोजी-भारत से दुश्मनी पर मयस्सर करती है जिसकी वजह से उसने कश्मीर को पाक की अवाम के लिए एक जस्बाती और इज्जत का मुद्दा बना रखा है। हमें समझना चाहिए कि पाकिस्तानी हुक्मरान कभी भी पाक सेना या अपनी नीतियों को गलत नहीं कहते हैं। कश्मीर समस्या तो उनके वजूद की बुनियाद है, लिहाजा पाक की दोनों तंजीमें कश्मीर मसले को हर हाल में जिंदा रखना चाहती हैं। पाकिस्तानी हुकूमत के भारत विरोध की गहराई को यूं समझा जा सकता है कि वह पाकिस्तान जो अपने जन्म से ही कथित ‘काफिर’ भारत के विरुद्ध प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से युद्ध छेड़े हुए है और जो कश्मीर में पत्थरबाजों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई और शेष भारत में मुसलमानों की प्रताडऩा से जुड़ा इक्का-दुक्का मामलों पर गला फाडऩे से नहीं थकता वह चीनी मुस्लिमों के सरकारी उत्पीडऩ पर न केवल मौन है, बल्कि वैश्विक राजनीति में चीन का सहभागी भी बना हुआ है।
 
आखिर क्यों? सिर्फ इसलिए क्योंकि दोनों देशों का भारत विरोधी साझा एजेंडा है। अर्थात भारत विरोध के लिए किसी भी स्तर पर समझौता कर सकता है इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान। भारत विरोध में अंधा होकर पाकिस्तान ने तालिबानियों, जेहादियों और सभ्य सेना के बीच की लकीर को भी धुंधला कर दिया है। पाकिस्तानी सेना जेहादियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने में सभ्यता के सबक भी भूल गई है। जब कश्मीर ही विवाद का मूल है तो अब किसी भी प्रकार का संवाद कश्मीर समस्या के समाधान के बाद ही होना चाहिए। खैर चार-युद्धों का कारण बन चुके पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीदें रखना बेमानी है। जब उसकी हरकतें एक जिम्मेदाराना मुल्क की बजाय लुटेरों और डाकुओं जैसी होने लगी हैं तो भारत सरकार ने भी ‘सठे साठ्यम् समाचरेत’ का अनुगमन करते हुए उसके साथ सख्त व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया है। किसी शायर ने कहा भी है कि ‘अमन चाहता हूं मगर जुल्म के खिलाफ अगर जंग लाजिमी है तो जंग ही सही।’
 
अब स्थितियां काल के कपाल पर दुष्ट के विनाश का मृत्यु गीत की प्रस्तावना लिखने लगी हैं। २०१७ में २०० से अधिक आतंकियों को मौत के घाट उतार कर भारतीय सेना ने दुश्मन को उसके संभावित अंजाम से रूबरू करा दिया है। यह भारत सरकार की नीतियों का ही परिणाम है कि पत्थरबाज की पहचान धारण कर चुके कश्मीरियों के मध्य से अनेक युवा आईएएस अफसर बन रहे हैं व अखिल भारतीय सेवाओं में दर्जनों की संख्या में कश्मीरी युवा चयनित हो रहे हैं। वैश्विक स्तर पर पाक अकेला पड़ चुका है। सार्क देशों में उसकी साख खत्म हो चुकी है। अमेरिका, रूस समेत अनेक प्रभावशाली मुल्क जिस तरह सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से भारत के समर्थन में उतरे हैं वह भारत की वैदेशिक नीति की विजय ही है। और, खाड़ी देशों में मिल रहा समर्थन उसका विस्तार है।
 
भारत ऐसा कुछ नहीं करना चाहता कि पाक एक बार फिर खंडित हो जाए लेकिन यदि संघर्ष ही विकल्प है तो पाकिस्तान की शर्तों पर चलते रहने का भी कोई मतलब नहीं। आचार्य चाणक्य ने कहा भी है, ‘सिंहाननैव, गजाननैव, व्याघ्राननैव च नैव च, अजा पुत्रं बलिम ददाति देवो दुर्बलरू घातक:’ अर्थात शेर, हाथी और बाघ के बच्चों की बलि कभी नहीं दी जाती है, मतलब देवता भी दुर्बल के लिए घातक होते हैं। हमें यह समझना होगा कि कभी-कभी शक्ति का प्रदर्शन अनेक युद्धों को टाल देता है। युद्ध के काले बादल सिर्फ उमड़- उमड़ के बिना बरसे ही चले जाते हैं। अपनी दुष्टता के चलते भारत पर चार-युद्ध थोपने वाला पाकिस्तान ऐसी ही कार्यवाही की प्रतीक्षा में है। वह सर्प की भांति है जिसका फन कुचले बिना उसके विषदंत से रक्षा नहीं की जा सकती है। सुखद है वर्तमान भारत सरकार ऐसे विषदंत धारियों के फन को कुचलना ढंग से जानती है। फिलहाल तो मोदी सरकार की नीतियां पाक के लिए यही संदेश दे रही हैं कि-
 
                                                               अमन चाहता हूं मगर जुल्म के खिलाफ
                                                                    गर जंग लाजमी है तो जंग ही सही।

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