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                                                     डॉ. प्रकाश आमटे, अनिकेत आमटे समेत परिवार
 
इंट्रो : सेवाव्रती बाबा आमटे से मिले समाज सेवा के व्रत के उनके पुत्रों प्रकाश और विकास ने तो सम्हाला ही, अब पौत्र अनिकेत आमटे के रूप में तीसरी पीढ़ी सेवा के क्षेत्र में उतर गई हैं। समय के साथ सेवा के क्षेत्र बदले हैं और उनमें आधुनिकता के साथ गति भी आ गई है। वे अब हेमलकसा के पास के गांवों में शिक्षा, पर्यावरण रक्षा, जल संचयन आदि में जुटे हुए हैं। इस सम्बंध में श्री अनिकेत आमटे से हुई प्रदीर्घ बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश पेश हैं –
 

बाबा आमटे जी के विचार आकाश को छूने वाले थे। उनके संदर्भ में आपके क्या विचार हैं?

बाबा आमटे का स्वभाव था कि यदि उन्होंने कोई काम अपने हाथ में लिया है तो वे उसे पूरा करने के पहले रुकते नहीं थे। जब उन्होंने अपने आपको समाज कार्य में झोंक दिया तो फिर कभी पीछे मुड कर नहीं देखा। सन १९४९ में बाबा ने कुष्ठ रोगियों के लिए काम करना प्रारंभ किया। उसके बाद वे समाज के अन्य उपेक्षित घटकों के लिए भी काम करने लगे। वे हमारे लिए प्रेरणा स्रोत रहे। निष्ठा क्या होती है यह हमने बाबा से सीखा। हम अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझते हैं कि हमने उनके परिवार में जन्म लिया। उनके द्वारा स्थापित किए हुए ट्रस्ट को ७० साल हो गए और वह अभी चल रहा है।
 आमटे परिवार की दो पीढ़ियों की विरासत आपको मिली है। आप उनके प्रति कृतज्ञता कैसे व्यक्त करेंगे?
इन लोगों ने हमारे सामने एक उदाहरण रख दिया है। मेरे पिताजी प्रकाश आमटे ने हेमलकसा गांव में वनवासियों के लिए एक नया कार्य प्रारंभ किया। उनके लिए अस्पताल चलाए। हमारा जन्म भी वहीं हुआ है। हम वहीं बडे हुए, बचपन से अपने माता-पिता को देखते आ रहे हैं। जब तक हम बच्चे थे तब तक उनके काम के बारे में हमें कुछ नहीं समझता था। परंतु जब हम धीरे-धीरे दुनिया को समझने लगे तो हमें जानकारी हुई कि हमारे माता-पिता कुछ अलग काम कर रहे हैं। वहां उन लोगों ने वनवासियों को होने वाली ऐसी बीमारियों का इलाज किया जो कि शहरों में नहीं हो सकती, जैसे भालू या सांप का काटना आदि। उनके ट्यूमर अत्यधिक बढ जाते हैं क्योंकि वनवासी उस ओर अधिक ध्यान नहीं देते।
आप आमटे परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं। विगत सात दशकों से जो सेवा कार्य आपके परिवार के द्वारा किया जा रहा है उसमें अब आप क्या परिवर्तन महसूस करते हैं?
निश्चित रूप से परिवर्तन हुआ है और परिवर्तन होना भी चाहिए; क्योंकि परिवर्तन ही विकास की ओर कदम बढ़ाने का सूचक है। जिन लोगों के लिए हम लोग काम कर रहे हैं उनके जीवन में भी बहुत परिवर्तन आया है। उनके बच्चे अब शिक्षा प्राप्त करके नौकरी-व्यवसाय कर रहे हैं। जिन परिवारों ने अपनी पूरी जिंदगी में पचास हजार रुपए देखे थे उनके बच्चे अब महीने के पचास हजार रुपए कमा रहे हैं। हमने भी सेवा करने के तरीकों में बदलाव किए हैं। बाबा आमटे ने अपने सेवा कार्य झोपड़ी में किए थे परंतु अब हम वैसा नहीं करते। हम भी सर्वसुविधायुक्त सेवाएं वनवासियों को प्रदान करते हैं। चूंकि हमें उन्हें आज के समाज के साथ खड़ा करना है इसलिए उन्हें सारी बातों से अवगत करना होगा। हमारे विद्यालय के बच्चे इंटरनेट से भी पढ़ाई करते हैं।
आप अपने प्रगतिशील विचारों के साथ समाज के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए किस तरह कार्य करना चाहते हैं?
हम सब से अधिक बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दे रहे हैं। क्योंकि अच्छे बुरे की पहचान होने के लिए शिक्षित होना जरूरी है।
लोक बिरादरी प्रकल्प के माध्यम से प्रकाश आमटे जी ने जो कार्य किया है उसकी व्याप्ति स्पष्ट करें।
सन १९७३ में सब से पहले एक दवाखाना खोला गया क्योंकि माता-पिता दोनों डॉक्टर थे। परंतु उन्हें यह ध्यान में आया कि शिक्षा के अभाव के कारण लोग बीमारियों का इलाज नहीं कराना चाहते। अत: १९७६ में काफी प्रयत्न करने के बाद एक विद्यालय खोला गया। जंगल पर पूरी तरह से निर्भर होने के कारण वनवासी कंद-मूल, फल यहां तक कि इंसानों को छोड़ कर अन्य सभी जानवरों को भी मार कर खाते थे। उनकी औसत आयु ४०-५० के बीच होती थी। परंतु अब शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने के कारण वे जानने लगे हैं कि क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए। अब वनवासियों की औसत आयु ८० वर्ष के आसपास है।
शिक्षा के अतिरिक्त हमने कुछ ऐसे प्रयास किए जिससे वनवासियों के द्वारा खेती की उपज को बढ़ाने में मदद मिले।
वे लोग पहले केवल धान की खेती करते थे। फसल कटने के बाद पूरे साल अन्य कोई पैदावार नहीं होती थी क्योंकि खेती के लिए आवश्यक पानी नहीं मिलता था। अब हम धीरे-धीरे तालाबों का निर्माण कर रहे हैं जिससे वहां पूरे साल पानी उपलब्ध रहे और अन्य फसलों की खेती की जा सके। अब वे लोग सब्जी भी उगा रहे हैं।
महुआ के फूल जंगलों में बहुत मिलते हैं। वह औषधीय गुणों से परिपूर्ण है परंतु वनवासी लोग उसका उपयोग शराब बनाने में करते हैं। हमने उन्हें विकल्प के रूप में उसके लड्डू बनाने के लिए कहा। इन लड्डुओं के लिए बाजार उपलब्ध कराए। अब इन लड्डुओं को १० रु. प्रति लड्डु के हिसाब से बाजार में बेचा जाता है।
सेवा के क्षेत्र में हेमलकसा लोगों के लिए दीपस्तंभ का कार्य कर रहा है। इसका क्या कारण है?
इसका सब से बड़ा कारण है उसकी निरंरतरता। जब से कार्य शुरू हुआ है तब से एक बार भी खंडित नहीं हुआ। इस कारण वनवासियों का हम पर विश्वास बढ़ रहा है। जिस तरह हमारी तीन पीढ़ियां वहीं रहीं, उन्हीं के जैसा हमारा जीवन स्तर रहा, उन लोगों के बीच हमारा परिवार घुलमिल गया, यह सारी बातें उनकी भी तीन पीढ़ियों ने देखीं। हमारे परिवार ने कभी वनवासियों से कोई अपेक्षा नहीं रखी। अत्यंत धीरज के साथ हम वहां कार्य करते रहे। हम जानते थे कि यहां परिवर्तन जल्दी नहीं होगा, विद्यालय में आने वाला पहला बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन जाएगा, फिर भी हम उन लोगों के साथ रहे।
आज राजनीति की चमक हर जगह दिखाई देती है, क्या इस चमक-दमक में मेहनतकश लोगों को न्याय मिल रहा है?
निश्चित रूप से आज की राजनीति के कारण समाज का बहुत नुकसान हो रहा है। पार्टियां बस एक दूसरे पर कीचड़ उछालती रहती हैं परंतु समस्या का समाधान नहीं निकलता। भ्रष्टाचार बहुत अधिक है। हर साल केंद्र तथा राज्यों के बजट में वनवासियों के लिए कुछ निश्चित रकम का प्रावधान किया जाता है। परंतु यह रकम वनवासियों तक पूरी पहुंचती नहीं है। कहीं कहीं तो फर्जी अस्पताल और मरीज कागज पर दिखा कर सरकार से रकम ले ली जाती है, पर जब मरीज है ही नहीं तो खर्च क्या होगा। वह सारी रकम जिसे मिलती है वह अपनी जेब में डाल लेता है।
दिल्ली में होने वाला सत्ता परिवर्तन क्या सेवा कार्यों को प्रभावित करता है?
मुझे नहीं लगता कि कुछ ज्यादा प्रभावित करता है; क्योंकि मंत्रियों का इन कामों से कोई लेनादेना नहीं होता। उन्हें तो पूरा देश देखना होता है। ये सारी बातें नौकरशाहों के हाथों में होती है। वे जो बात मंत्रियों को बताते हैं उसी पर मंत्री विचार करते हैं। इसलिए मैं तो यही कहूंगा विगत ७० सालों में हमें किसी सरकार ने कोई तकलीफ नहीं दी। अगर थोड़ी बहुत कुछ तकलीफ हुई तो वह भी नौकरशाही के कारण ही हुई।
बाबा आमटे, प्रकाश आमटे, विकास आमटे ये बहुत बड़े नाम हैं। क्या इसका आप पर कोई मानसिक दबाव रहा?
नहीं। मानसिक दबाव रहने का कोई कारण नहीं है क्योंकि हमारे बीच किसी तरह की कोई प्रतियोगिता नहीं है। हम यहां अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर रहे हैं। यह काम करने के लिए किसी ने हम पर कोई दबाव नहीं डाला। वनवासियों के लिए काम करने में मन:शांति मिलती है इसलिए हम यहां काम कर रहे हैं। हां, थोड़ा दुख तब जरूर होता है जब लोग हमारे काम की तुलना उन लोगों से करने लगते हैं। वे सोचते हैं कि जैसा बाबा आमटे ने काम किया, प्रकाश आमटे कर रहे हैं वैसा हम क्यों नहीं करते। परंतु लोग पीढ़ी के अंतर के बारे में नहीं सोचते। अब जब कंप्यूटर मोबाइल जैसी चीजें भी पुराने तरीकों पर काम नहीं करतीं तो इंसान कैसे पुराने ढर्रे पर काम करेगाद्य हमें अगर दुनिया के साथ कदम मिलाना है तो गति बढ़ानी ही होगी, तरीके बदलने ही होंगे।
बाबा आमटे आपको किस रूप में याद हैं और आपको उनसे कौन से जीवन मूल्य प्राप्त हुए हैं?
बाबा का प्रभाव तो संस्था के सभी लोगों पर रहा है। उनका अनुशासन स्वयं के लिए और दूसरों के लिए भी सख्त था। चार बजे उठ कर अपने सारे काम खत्म कर वे आनंदवन के लोगों से मिलने चले जाते थे। उनका यह दिनक्रम कभी नहीं टूटा। वहां के लोग बाबा का बेसब्री से इंतजार करते थे, क्योंकि बाबा ने ही उन कुष्ठ रोगियों को आधार दिया था। उनके अपने घरवालों ने तो उन्हें निकाल दिया था। बाबा ने उन रोगियों के मन में आत्मविश्वास जगाया। उनको भीख मांगने के लिए नहीं वरन स्वावलंबी बनने की ओर प्रेरित किया। आनंदवन और हेमलकसा बनाने में इन लोगों ने भी बाबा की मदद की। हमारे लिए ये सारी सकारात्मक बातें ग्रहण करने का वह समय था। वे स्वयं देर रात तक बैठ कर सारा हिसाब देखते थे। हमने बाबा को कभी आम दादाजी की तरह नहीं देखा। हम उनके लिए परिवार के सदस्य थे। वे हमसे प्यार भी करते थे परंतु वैसा ही जैसा वे महारोगियों के बच्चों को करते थे। उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया। उनका परिवार बहुत बड़ा था।
आज देशभर में आमटे परिवार का नाम है, ख्याति है। उस नाम को संभालने के लिए आपको क्या करना पड़ रहा है?
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है हमारे कामों की तुलना नहीं होनी चाहिए। हम भी समाज हित में, वनवासियों के हित में ही काम कर रहे हैं। २००३ से हमने काम की शुरुआत की थी। आज पंद्रह सालों में २ या ३ प्रतिशत लोगों ने ही हमारे काम की आलोचना की होगी। बाकी लोगों ने तो हमें प्रोत्साहित ही किया। आज भी हमारा काम लोगों के दान के आधार पर ही चल रहा है। लोग हमारा काम देख कर ही दान देते हैं।
भविष्य में हेमलकसा का नया रूप क्या होगा?
वास्तव में हेमलकसा जो हमारा केंद्र है अब वहां अधिक प्रगति के अवसर नहीं है। वहां का अस्पताल और विद्यालय अपनी अधिकतम सीमा पर कार्य कर रहे हैं। हम अब उसके आसपास के गांवों की उन्नति करना चाहते हैं। अब लगभग ५० अन्य गांवों से हमारे पास निवेदन आए हैं जो कि पानी के नियोजन के लिए हमारी सहायता मांग रहे हैं। तालाबों के निर्माण से हुई गांवों की प्रगति को देख कर अन्य गांव भी अब इस कार्य के लिए प्रयत्नशील हैं। इन गावों में स्वास्थ्य सुविधाएं देने का भी हमारा प्रयत्न है। हम वहां पर ऐसे लोगों को भी भेजेंगे जो साधाराण बीमारियों का इलाज कर सकेंगे। जानवरों के बच्चे जो हमें वनवासियों ने लाकर दिए हैं उनके लिए हम कुछ प्राकृतिक कुछ नैसर्गिक प्राणी उद्यान बनाना चाहते हैं। शिक्षा के कारण अब वहां शिकार भी कम होने लगी है।
क्या आपको कभी राजनीति में आकर कुछ परिवर्तन करने की इच्छा है?
नहीं, यह इच्छा तो मन में कभी नहीं आई। हम जो कर रहे हैं वही करना चाहते हैं। वैसे भी कोई एक व्यक्ति देश नहीं बदल सकता है। सारे समाज का जागृत होना आवश्यक है।
विगत सात दशक से आपका परिवार वनवासियों के लिए कार्य कर रहा है। उन लोगों के मन में इस कार्य के प्रति क्या भावना है?
हालांकि हमने कभी भी उनकी किसी भावना के लिए कार्य नहीं किया परंतु वे मिलने आते हैं। वे बोलते नहीं हैं परंतु उनकी आंखों में दिखाई देता है। कई बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक बन गए हैं। वे जब मिलने आते हैं तो उनके मन में उनकी आंखों में हमारे लिए सम्मान और आनंद होता है। वही देख कर हमें अधिक कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
आपके कार्य के कारण नक्सलवाद में कमी आई है ऐसा कहा जाता है। क्या यह सच है?
नक्सलवाद से हमारा कोई सीधा सम्बंध नहीं रहा, परंतु उन्होंने हमें कभी कोई तकलीफ भी नहीं दी। स्वास्थ्य से सम्बंधित अथवा अन्य किसी कार्य में उन्होंने कोई बाधा नहीं डाली।
आप अपनी पहचान आमटे परिवार के सदस्य के रूप में ही रखना चाहते हैं या अलग नई पहचान बनाना चाहते हैं?
वास्तव में मैं कुछ बनाना नहीं चाहता। परिवार में किसी ने भी ठान कर नई राह नहीं बनाई। वे बस काम करते रहे और राह बनती गई। बाबा ने प्रकाश आमटे को हेमलकसा का पूरा कार्यभार सौंप दिया। उसे उन्होंने अपने तरीके से आगे बढ़ाया। मैंने और मेरी पत्नी ने आसपास के गांवों में शिक्षा का प्रसार करने का निर्णय लिया है। लोगों को उसका महत्व समझाया। अब वे लोग ही हमारे पास विद्यालय शुरू करने का निवेदन लेकर आते हैं।
समाजसेवक शब्द के प्रति लोगों के मन में गलत धारणाएं भी बन रही हैं। उसका कारण क्या है?
इसका एक कारण यह हो सकता है कि आजकल देश में बहुत सारे फर्जी एनजीओ बन गए हैं। सेवा के नाम पर गलत काम करने वाले एनजीओ की संख्या बढ़ रही है। ऐसे लोगों का समाज में कोई काम नहीं होता है परंतु वे कागजों पर काम दिखा कर लोगों से पैसा लूट लेते हैं। साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि सभी को एक जैसा समझना भी गलत है। अगर आपको किसी ने धोखा दिया है तो जरूरी नहीं कि दूसरा भी वैसा ही हो। कई सेवाभावी संस्थाएं समाज को आगे बढ़ाने का कार्य भी ईमानदारी से कर रही हैं।
सेवाभावी संस्थाओं के लिए नियम सरकार ने कुछ कड़े किए हैं। इस संदर्भ में आपके क्या विचार हैं।
मेरे खयाल से जो लोग ईमानदारी से कार्य कर रहे हैं उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। और जिनके कागज पत्र तथा काम वैध होंगे उनका सरकार भी कुछ नहीं करेगी। इसलिए नियम कड़े होने से डरने का कोई सवाल हीं पैदा नहीं होता।
युवा पीढ़ी को किस प्रकार सेवा कार्यों की ओर प्रेरित किया जा सकता है?
युवाओं को प्रेरित करने के लिए विद्यालयों से अच्छी कोई चीज नहीं हो सकती। यदि विद्यालयों में तथा माता पिता के द्वारा बचपन में ही इस तरह के सेवा प्रकल्पों को दिखाया जाएगा तो निश्चित ही बच्चों को ये सेवा कार्य समझ में आएंगे। अगर अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों में बिठा कर अमेरिका के सपने दिखाए जाएंगे तो बच्चे कभी इस तरह की सेवा के लिए प्रेरित नहीं होंगे।
 
आमटे परिवार ने जिन संस्कारों को उपहार के रूप में आपकी अंजुलि में डाला है, उनका स्वीकार करके आप आगे क्या करना चाहेंगे?
जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि इस काम के लिए हम पर किसी प्रकार का दबाव नहीं था। हमने स्वेच्छा से यह क्षेत्र चुना है। हमने परिवार के सभी लोगों को काम करते ही देखा है। अतः काम करने के संस्कार ही हमें उपहार स्वरूप मिले हैं। इसी काम को निरंतर अपनी गति के अनुरूप और समय के साथ तालमेल बना कर करते रहना चाहेंगे।

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