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सेवा के संदर्भ में अपने विचार स्पष्ट कीजिए।
सेवा को तो हिंदुस्थान में एक श्रेष्ठ मूल्य माना गया है। हमारे पूर्वजों ने इसे व्यक्ति-व्यक्ति के सुख दुःख के साथ जोड़ा है। जो भी पीड़ित, अभावग्रस्त, वंचित हैं; सृष्टि के ऐसे समस्त व्यक्तियों को उन्नति विकास के मार्ग पर चलाना, सबके साथ लाना ही सेवा है। इसीलिए जो श्रेष्ठ चिंतन हमारे पूर्वजों ने किया है उसको हम दोहराते हैं-
सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:ख भागभवेत॥
इसको साकार करने का एक मार्ग, एक माध्यम ही सेवा है।
भारतीय तत्वज्ञान का सारांश सेवा कार्य में दिखाई देता है। इसके पीछे का मूल कारण क्या है?
हमारे तत्वज्ञान में वेदकाल से लेकर अब तक हम जो प्रार्थना करते हैं, उस प्रार्थना को प्रत्यक्ष व्यवहार में लाने के लिए तथा सामान्य जनों द्वारा दूसरों को सुखी करने के लिए जो भी कार्य किया जा सकता है, वह सेवा है। अपने यहां दूसरों को सुखी करने के प्रयास को स्वयं की सुख प्राप्ति का एक श्रेष्ठ मार्ग कहा गया है। इस मार्ग पर चलने से सारा समाज सुखी हो जाएगा अर्थात् मैं भी सुखी हो जाऊंगा। संघ का भी चितंन यही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय कार्य हेतु देश में कार्य कर रहा है। पर सेवा कार्य को संघ ने किस कारण अपनाया?
स्वयंसेवक शब्द में ही सेवा होने के कारण सेवा करना संघ में आने वाले प्रत्येक स्वयंसेवक का कर्तव्य माना गया है। १९२५ मे संघ का जब प्रारंभ हुआ तब से ही संघ के स्वयंसेवक समय-समय पर सेवा कार्य करते आए हैं। क्योंकि यह समाज मेरा है, समाज का सुख दु:ख मेरा, समाज की पीड़ा मेरी है इसलिए इस समाज को सुखी करना मेरा कर्तव्य है। संघ में यही संस्कार सिखाया जाता है। उसी के कारण स्वयंसेवक सर्वत्र सेवा करते रहते हैं, व्यक्तिगत स्तर पर तथा सामूहिक भी। और अलग अलग संस्थाएं बना कर भी करते हैं। १९२५ से ही स्वंयसेवकों के सेवा कार्य करने वाले उदाहरण संघ में मिलते हैं। १९९० में डॉ. हेडगेवारजी के जन्मशती वर्ष में उसको एक कार्यविभाग के रुप मे नया आयाम दिया गया।
भारत एक विशाल राष्ट्र है। इस विशाल राष्ट्र में सेवा कार्य की आवश्यकता की स्थिति को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग ३०/३५% समाज ऐसा है जो गरीबी रेखा के नीचे है। इनकी सामान्य आवश्यकता भी पूरी नहीं होती। जैसे शरीर का एक अंग भी दुर्बल होने पर उस व्यक्ति को विकलांग कहते हैं, भले ही उसके बाकी सारे अंग कितने भी सक्षम क्यों न हों। वैसे समाज का भी एक वर्ग अगर दुर्बल, पी़ड़ित, वंचित व अभावग्रस्त है तो समाज कभी सक्षम नहीं कहलाएगा। इसलिए संपूर्ण समाज को सक्षम करना है तो दुर्बल, पीड़ित, वंचित तथा अभावग्रस्त हिस्से को सक्षम करना आवश्यक है। और उसको सक्षम करने का मार्ग सेवा है।
वनवासी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से बड़ी मात्रा में कार्य चलाते हैं। उस संदर्भ में बताइए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं कोई सेवा कार्य नहीं करता। संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। सामान्यतया देश के ऐसे तीन हिस्से ऐसे माने गए, जहां सेवा की आवश्यकता है। पहला नगरीय क्षेत्र का स्लम एरिया है, जहां बहुत ही गरीब पिछड़ा हुआ वर्ग रहता है। दूसरा कुछ दुर्गम ग्रामीण क्षेत्र और तीसरा ट्राइबल या वनवासी जिसे सरकारी भाषा में आदिवासी कहते हैं। यह भी दस करोड़ की आबादी वाला समाज आज जंगलों में रहता है तथा विकास और प्रगति से कोसों दूर है। इन तीनों वर्गोर्ं में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। अलग-अलग संस्था के नाम से ये सेवा कार्य किए जाते हैं।
वनवासी क्षेत्र में चलने वाले विविध सेवा कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उस समय डॉ. हेडगेवार जी ने काफी वैचारिक मंथन किया कि इतनी बड़ी जनसंख्या के होने के बावजूद हम लंबे समय तक गुलाम क्यों रहे तथा दिन-ब-दिन अध:पतित होते चले गए, तो यह समझ में आया कि कुछ योग्य गुणों के अभाव के कारण हम पीछे रह गए। संघ का कार्य ही उन विशिष्ट गुणों को आम जन के बीच समावेशित करना रहा है। संघ का स्वयंसेवक इसी प्रबल भावना के तहत कार्य करता है। और संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण का होने के कारण स्वयंसेवक सारे सेवा कार्य कर रहे हैं।
आपने कहा कि संघ कोई सेवा कार्य नहीं करता बल्कि संघ के स्वयंसेवक करते हैं। इस विचार के पीछे की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
वनवासी क्षेत्र में शिक्षा का अभाव है। जंगलों में रहने के कारण शिक्षा की सुविधा नहीं है और माता-पिता में शैक्षिक जागृति न होने के कारण उनको भी अपने बच्चों की पढ़ाई के बारे में उतना महत्व ध्यान में नहीं आता। ऐसे बच्चों के लिए आज देश के विभिन्न भागों में हजारों छात्रावास चल रहे हैं। वहां की दूसरी समस्या स्वास्थ्य की है। उनके स्वास्थ्य की व्यवस्था करना, शिविर करना और वहीं के युवकों को शिक्षण देकर आरोग्य मित्र के नाते खड़े करना और उन सब का स्वास्थ अच्छे रखने का प्रयास करना जैसे काम भी किए जाते हैं। संस्कार के बारे में तो चिंता नहीं है। वनवासी क्षेत्र में सब से अच्छे संस्कार आज भी हमें देखने को मिलते हैं। वनवासी कल्याण आश्रम वनवासी क्षेत्र में इस प्रकार के लगभग १८,००० से अधिक सेवा कार्य कर रहा है। और अन्य जो संस्थाएं हैं वे भी कुछ मात्रा में वनवासी क्षेत्र में काम करती हैं इसकी संख्या भी लगभग १०,००० तक है।
कन्वर्जन की आड़ में होने वाले सेवा कार्य का दिखावा वनवासी क्षेत्र की सब से बड़ी समस्या है। उसे रोकने के लिए सेवा विभाग के माध्यम से कौन से प्रयास हो रहे हैं?
सेवा तो मनुष्य की आवश्यकता है इसलिए उस सेवा के माध्यम से हम मनुष्य को स्वावलंबी, स्वाभिमानी, परिश्रमी बना कर खुद के पैरों पर खड़ा करेंगे ताकि वह भी सब के साथ आ जाएगा। मन में अपनी संस्कृति, परंपरा, धर्म आदि के बारे में और अभिमान जागृत करेंगे। ये काम संघ कार्य करता है, कन्वर्जन को रोकने के लिए सेवा कार्य करना संघ की दृष्टि नहीं है लेकिन इस पद्धति से कार्य करने के कारण अपने आप मतांतरण की प्रक्रिया में रुकावट आती है, ऐसा अनुभव है।
कन्वर्जन करने वाली संस्थाओं के प्रतिकार हेतु आप लोगों को प्रेरित करने के लिए क्या करते हैं?
संघ के स्वयंसेवक कन्वर्जन करने वाली संस्थाओं के खिलाफ कार्य नहीं करते बल्कि वे अपने आदिवासी बंधुओं में स्वाभिमान की भावना के जागरण का कार्य करते हैं। यदि कन्वर्जन करने वाली संस्थाओं द्वारा रुकावटें खड़ी की जाती हैं तो उनका प्रतिकार स्थानीय लोग करते हैं, न कि हमारे लोग। किसी को रोकने के लिए हम सेवा नहीं करते। सेवा मनुष्य की आवश्यकता है इसलिए करते हैं।
शिक्षा का अभाव और उसके कारण उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी के समाधान के लिए उद्योग का होना आवश्यक है, उद्योग निर्माण के लिए सेवा विभाग से क्या कुछ कार्य किए जाते हैंै?
सेवा विभाग की ओर से कुछ संस्थाओं के माध्यम से कई रोजगार के प्रकल्प चलते हैं। हम चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति स्वावलंबी होना चाहिए। जैसे महाराष्ट्र की ‘घुमंतू जातियां’ अंग्रेजों के विरोध के कारण गांवों से बाहर कर दी गई थीं। वे जगह-जगह घूमते थे, रोजगार नहीं, शिक्षा नहीं, कोई अन्य प्रकार की सुविधा नहीं। फलतः वे गलत कामों में लिप्त हो गए थे। लेकिन गत २४ वर्षों से शिक्षा तथा संस्कार मिलने के कारण उनके सारे गलत काम बंद हो गए और आज वे लोग अपने सामर्थ्य पर स्वाभिमान से खड़े हैं। पारधी, कोल्हाटी, गोपाल समाज जैसे तमाम समाज भी हैं। नगरीय क्षेत्र में झोपड़ियों में रहने वाली बहनों के लिए सिलाई, क़ढ़ाई, बुनाई प्रशिक्षण देते हैं। वर्तमान केंद्र सरकार की कौशल विकास की जो योजनाएं आ रही हैं उनका उपयोग करते हुए कुछ संस्थाओं ने प्रशिक्षण देने की शुरुआत की है और आज ३० हजार से भी अधिक स्वावलंबन के सेवा कार्य भारत भर में चल रहे हैं।
कौशल विकास के माध्यम से जो कार्य चल रहे हैं, उनकी विस्तार से जानकारी दीजिए।
कौशल विकास के प्रयोग अपने देश में पहले से चल रहे हैं। जो कौशल आत्मसात करता है, सीख सकता है; उसको सिखाना और उसको उसमें प्रवीण बनाना और प्रवीण बनाने के बाद उसको रोजगार दिलवाने में मदद करना हमारा उद्देश्य है। देश भर में कंप्यूटर सेंटर चलते हैं, कुछ आईटीआई के कोर्स भी हैं, महिलाओं के लिए जो अलग अलग प्रकार की सरकार की योजनाएं तथा प्रशिक्षण हैं, उसे देने का प्रयास करते हैं। आजकल सरकार द्वारा स्किल डेवलपमेंट की योजना आने के कारण काफी गति आ गई है।
कौशल विकास के कार्यक्रमों को वनवासी क्षेत्रों तक कुशलतापूर्वक पहुंचाने तथा उनकी योग्यता को समाज के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
वनवासी क्षेत्र की कार्यकुशल महिलाएं जो कुछ चीजें बनाती हैं उसकी मार्केटिंग का काम अपनी सेवा संस्था के कार्यकर्ता करते हैं। जैसे दीपावली के समय अलग अलग वस्तुएं बाजार में मिलती हैं। वहां के युवक रोजगारोन्मुख होते हुए भी परंपरागत खेती करते हुए, अपना जीवनयापन चला रहे हैं। उसके साथ साथ स्किल का प्रशिक्षण लेने के कारण उन युवकों में कुछ कर गुजरने का भाव बढ़ रहा है।
सेवा विभाग द्वारा पूरे देश में चलाए जाने वाले उपक्रमों की कुल संख्या कितनी है?
संघ के स्वंयसेवक विभिन्न प्रकार की संस्थाएं बना कर सेवा कार्य करते हैं। इनमें से विश्व हिंदू परिषद, विद्याभारती, वनवासी कल्याण आश्रम, भारत विकास परिषद, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश में दीनदयाल शोध संस्थान है, आरोग्य भारती जैसे लगभग ९ संगठन हैं जिसको मातृ संगठन कहते हैं। जो अलग-अलग सेवा कार्य करते हैं। इसके अलावा प्रांतों में संस्थाएं बनाई गई हैं। महाराष्ट्र में जनकल्याण समिति है, उत्तर भारत में बड़ी मात्रा में सेवाभारती नाम से चलती है। कर्नाटक में हिंदू सेवा प्रतिष्ठान राष्ट्रोत्थान परिषद के नाम से चलती है। अलग-अलग लगभग दो हजार से अधिक संस्थाएं आज इसमें काम कर रही हैं। ये सब मिल कर एक समूह संस्था बन गई है, जिसका नाम राष्ट्रीय सेवा भारती है। इस प्रकार राष्ट्रीय सेवा भारती लगभग ८० हजार सेवा कार्य करती है। ९० हजार सेवा कार्य मातृ संस्था करती है। सब मिल कर वर्तमान में एक लाख सत्तर हजार सात सौ सेवा कार्य देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा स्वयंसेवक कर रहे हैं।
इन तमाम संस्थाओं को उद्देश्य की ओर सफलता पूर्वक ले जाने के लिए किस प्रकार का समन्वय करते हैं?
प्रत्येक संस्था स्वतंत्र, स्वायत्त व स्वावलंबी है और उनकी अपनी एक रचना, पद्धति है। इन सबके बीच समन्वय करना, मार्गदर्शन करना, संगठित बनाना, प्रशिक्षण की व्यवस्था करना जैसे काम राष्ट्रीय सेवाभारती करती है। वैसे संस्थाओं के द्वारा कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण, विविध नए सेवा कार्यों का प्रारंभ, व्यवस्थापन, अर्थ संकलन की व्यवस्था प्रत्येक संस्था स्वयं करती है। इसी प्रकार बाकी जो ‘मातृसंस्था’ के अंतर्गत की संस्थाएं हैं वे भी अपना अपना कार्य करती हैं।
प्राकृतिक आपदा के समय सेवा विभाग क्या भूमिका अदा करता है?
८० वर्षों से हम अनुभव करते हैं कि जब जब आपत्ति आती है, तब-तब स्वयंसेवक दौड़ कर जाते हैं। उसके लिए स्वयंसेवकों को न संकेत देना पड़ता है, न प्रेरित करना पड़ता है, न मार्गदर्शन करना पड़ता है। भूकंप, बाढ़, अकाल या बड़ा कोई हादसा हो; मनुष्य निर्मित हो या प्राकृतिक। ऐसे कई सारे उदाहरण हैं। जैसे कि केदारनाथ घाटी में प्रलय आया, गुजरात का भूकंप हुआ, चेन्नई में बाढ़ आई, सुनामी के देश में तीन स्थानों पर बड़े संकट आए। सब जगह स्वंयसेवकों ने अपना स्वभावगत कार्य किया। लोगों को संकट से निकाल कर अपने पैरों पर खड़ा कर जीविकोपार्जन के लिए अच्छी सहायता की। जैसे सुनामी का संकट आया था। तमिलनाडु, केरल, आंध प्रदेश, अंडमान-निकोबार में ज्यादा नुकसान हुआ था। लातूर में १९९३ में भूकंप आया था। मैंने कहा कि केवल तात्कालिक सहायता ही नहीं करनी है बल्कि उसके बाद उनके रहने के लिए घर बना कर देना, शिक्षा की व्यवस्था करना, आवश्यक हो तो रोजगार की व्यवस्था करना, स्वास्थ्य की व्यवस्था करना सब का जीवन पूर्ववत करना, किसानों को खेती के लिए पुन: सहायता करते हुए सभी संसाधन उपलब्ध करवाना जरूरी है॥समाज से सहायता लेकर सभी स्थानों पर नए घर बना कर दिए हैं। लातुर जिले में रेबी चिचोेली गांव में १२५ नये घर बनाकर दिये है। कई स्थानों पर अस्पताल बनाए। आज भी लातुर में जनकल्याण समिति द्वारा हारंगुळ नामक स्थान पर एक जनकल्याण निवासी विद्यालय है उसमें उस समय के पी़ड़ित परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं।
सेवा विभाग में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण एवं समन्वय का कार्य कैसे करते हैं?
शिक्षा, स्वावलंबन, स्वास्थ्य, संस्कार के कार्य कर रहे स्वयंसेवकों को समुचित प्रशिक्षण देने की पद्धति विकसित की गई है। एक पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जिसके माध्यम से कोई छोटा सा सेवा कार्य हो, संस्कार केंद्र, बालवाड़ी, आरोग्य केंद्र से लेकर जो बड़े बड़े केंद्र चलते हैं उनका प्रशिक्षण देने की एक पद्धति विकसित हो गई है। कार्यकर्ताओं के लिए ऐसे प्रशिक्षण कार्य नियमित अंतराल पर आयोजित किए जाते हैं।
संघ कार्य का पूरे विश्व में विस्तार हुआ है। सेवा कार्य भी विभिन्न देशों तक पहुंचा है। उन संस्थाओं की कार्य पद्धति कैसी है?
भारत के बाहर जो कार्य चलता है, वे संस्थाएं अलग हैं। ज्यादातर उनके कार्य हिंदू स्वंयसेवक के नाम से चलते हैं। वे सब वहां की रजिस्टर्ड आर्गनाइजेशन हैं। नैरोबी में अफ्रीकी समाज बड़ी मात्रा में है। आज भी वह समाज बहुत पिछड़ा है। वहां के ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में बच्चों को भोजन देने का बड़ा कार्य करते हैं। वहां २० हजार बालकों को वे अलग अलग स्थानों पर नियमित रूप से भोजन देते हैं। भोजन के कारण ही बच्चों की स्कूल में उपस्थिति बढ़ रही है, ऐसा वहां के अध्यापक कहते हैं। और केवल उपस्थिति ही नहीं पढ़ाई में रुचि भी बढ़ रही है। नेपाल में भी अच्छी संख्या में एकल विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, छात्रावास, रोजगार प्रशिक्षण चलते हैं। नेपाल में भूकंप के पश्चात सेवा कार्यों की संख्या और भी बढ़ गई है।
सेवा कार्य करते हुए किस प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है?
सब से बड़ी मुश्किल कार्यकर्ताओं की होती है। ऐसे कार्यकर्ता मिलें जो समर्पण भाव से सेवा कार्य कर सकें, इसके लिए प्रयास होता है। संघ के स्वंयसेवक में संस्कार के कारण सेवा का गुण विकसित हुआ है। साथ ही संघ के बाहर समाज में इस प्रकार का बहुत बड़ा वर्ग है जिनके मन सेवा के प्रति आकर्षण होता है, उनसे भी संपर्क करना और उनके माध्यम से पहले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पूरी करना सब से बड़ी चुनौती है। उस चुनौती को दूर किया जाता है। बाकी, आर्थिक सहयोग समाज से काफी मात्रा में मिलता है।
इतने बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रकल्प चलाने के लिए किस प्रकार आर्थिक समन्वय करते हैं?
संघ की नीति रही है कि सरकारी धन पर सेवा कार्य नहीं चलाना है। किसी भी सेवा कार्य के लिए सरकार से निरंतर धन नहीं लेना है। वन टाइम फंडिंग अर्थात् भवन निर्माण, केंद्र प्रारंभ करने इत्यादि के लिए सरकार की योजना से अगर कुछ मिलता है तो ले लेना पर उससे भी अधिक समाज से प्राप्त करना है। समाज सेवा कार्यों को अच्छी मात्रा में धन देता है। इसलिए अभी तक पैसे के अभाव के कारण एक भी सेवा कार्य बंद नहीं हुआ, ऐसा संघ का अनुभव है।
स्वयंसेवकों द्वारा चलाई जा रही ये संस्थाएं स्वायत्त हैं। क्या स्वावलंबी भी हैं?
सभी संस्थाएं स्वावलंबी हैं। वे अपने क्षेत्र विशेष से ही धन संकलन करती हैं। संसाधनों को जुटाती हैं तथा सेवा कार्य करती हैं। बाहर से उनको धन देने की आवश्यता नहीं पड़ती।
आर्थिक स्वावलंबन तो ठीक है। पर क्या वे रोजगार परक भी हैं?
सारे देश में संस्थाओं के द्वारा जो प्रकल्प चलते हैं उससे अच्छा रोजगार प्राप्त होता है जिसका स्वयंसेवक अच्छी तरह मार्केटिंग की व्यवस्था करते हैं। उससे जो धन मिलता वह उन परिवारों को मिलता है। साथ ही संस्था को भी कुछ धन मिलता है परंतु संस्थाओं के लिए समाज से धन इकट्ठा करने का प्रयास ही ज्यादा करते हैं।
जैसा कि आपने पहले उल्लेख किया कि सरकार से धन लेकर कार्य नहीं करते, इसके पीछे की प्रेरणा कहां से आई?
यदि मूल में जाएंगे तो पता चलता है कि हमारे देश का चिंतन प्रारंभ से ही है कि समाज कभी भी राजा अवलंबी न रहे, सरकार पर अवलंबित नहीं रहे। पुराने समय से ही लोग अपने अपने स्थान पर रह कर अपने परिश्रम से अपना परिवार चलाते थे। गांव के सारे लोग एकसाथ आकर गांव के विकास की चिंता करते थे। अपने गांव में कोई भूखा, पी़डित, अस्वस्थ न रहे, इसकी चिंता समाज करता था। इसीलिए ऊपरी स्तर पर आक्रमण होते गए लेकिन निचले स्तर पर समाज सुचारू रूप से चलता रहा। जो समाज स्वावलंबी होता है वही स्वाभिमानी होता है। और जो स्वाभिमानी होता है वही प्रगति करता है। संघ लोगों में उसी भाव को जगाने का प्रयास करता है। सीधे जुड़ाव के कारण समाज के मन में भी उस कार्य के प्रति अपनत्व का भाव आता है। प्रत्यक्ष स्वाभिमान सेवा कार्य करने वालों के मन में भी रोपित होता है और सेवित जनों के बीच में भी। यह भारत की हिंदू चिंतन की प्राचीन पद्धति रही है जिसके कारण हम बचे रहे।
सेवा विभाग के माध्यम से या सेवा भारती के माध्यम से देश-विदेश में सेवा कार्य होते रहते हैं। देश के अन्य समाजसेवियों के साथ किस प्रकार समन्वय करते हैं?
हर जिले के स्वयंसेवक इस प्रकार का समन्वय करने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। सेवा कार्यों के लिए किए गए १० सालों के भारत भ्रमण के अनुभव के आधार पर मुझे लगता है कि स्वयंसेवक आज १ लाख सत्तर हजार सात सौ सेवा कार्य करते हैं। साथ ही समाज में संघ के बाहर १० लाख से भी अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं। इसलिए इन सब के बीच में समन्वय तो होना ही चाहिए। इन सब को संगठित करना चाहिए। इसके लिए प्रयास भी चलते हैं। हर जिले में वर्ष में एक बार सेवा कार्य करने वाली सारी संस्थाएं एक साथ आती हैं। एक दूसरे के कार्य का अनुभव प्रदान करते हैं, जानकारी लेते हैं। जानकारी के माध्यम से अपनी कठिनाइयां दूर करने हेतु मार्गदर्शन लेते हैं। और सब मिल कर और क्या कर सकते हैं, इसका चिंतन करते हैं। यही कार्यक्रम प्रदेश स्तर पर पांच साल के बाद ‘सेवा संगम’ के नाम से चलते हैं। उससे आत्मविश्वास बढ़ता है। सेवा कार्य करते समय स्वयंसेवकों के मन में अगर निराशा आई होगी तो ‘सेवा संगम’ के कार्यक्रम के प्रभाव के कारण वह निराशा समाप्त होती है। अखिल भारतीय स्तर पर बंगलोर में पहला सेवा संगम का कार्यक्रम तथा दूसरा दिल्ली में हुआ था।
समाज की जरूरतों के बारे में अपेक्षा में परिवर्तन आ रहा है। क्या सेवा कार्यों में भी परिवर्तन की आवश्यकता है?
परिवर्तन को संसार का नियम कहते हैं। परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किया जाता है। पर सेवा कार्य में परिवर्तन करने से परिवर्तन नहीं होता बल्कि समाज में परिवर्तन से। मनुष्य के अंदर जो दोष और विकृतियां होतीं हैं, उसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता है। इसलिए हम इस उद्देश्य को सामने रख कर काम करते हैं तथा अनुभवों के आधार पर नए सेवा कार्य प्रारंभ करते हैं। इसलिए कार्यों में और करने वाली पद्धति में काल, साधन, वातावरण के अनुसार परिवर्तन करना पड़ता है।
भविष्य में सेवा कार्य के विस्तार के बारें में क्या योजनाएं हैं?
इस समय देश में एक लाख सत्तर हजार सात सौ सेवा कार्य चल रहे हैं। हमारी सोच है कि आने वाले दस वर्षों में सेवा कार्य सर्वव्यापी एवं सर्वस्पर्शी होना चाहिए। सर्वव्यापी का मतलब नगरीय क्षेत्र में एक भी झोपड़ी सेवा बस्ती ऐसी न हो कि जिसमें पीड़ित वर्ग हो और कोई सेवा कार्य न हो। आने वाले दस वर्षों में सभी नगरीय क्षेत्र की सभी सेवा बस्तियों में जाकर वहां की आवश्यकता को ध्यान देते हुए सेवा कार्य करने हैं। सभी गांवों में और सभी वनवासी क्षेत्रों में अपने सेवा कार्य का जाल बिछाएंगे। सब लोगों तक अपनी सेवा पहुंचाने का प्रयास करेंगे। दूसरा शब्द ‘सर्वस्पर्शी’ जिसका मतलब कि समाज में कोई जनजाति ऐसी न हो जिसे विकास का अवसर न मिले।
इन भावनाओं को लेकर आप समाज के जिस वर्ग के साथ कार्य कर रहे हैं, उस वर्ग के साथ आपके अनुभव कैसे रहे हैं?
बहुत ही अच्छा अनुभव रहा है; क्योंकि जहां पीड़ा होती है वहीं संवेदना होती है। हमारा भी चिंतन ऐसा है कि हमें दो वर्गों का निर्माण नहीं करना है कि एक जीवन भर सेवा लेता रहे और दूसरा सेवा करता रहे। आज का सेवित कल का सेवक बने, ऐसा अपना उद्देश्य है। जैसे वनवासी कल्याण आश्रम में जो छात्र छात्रावास में रह रहे थे, उनमें से कुछ छात्रावास के व्यवस्थापक हो गए कुछ पूर्वकालीन कार्यकर्ता बने जबकि बहुत सारे आध्यापक, डॉक्टर इत्यादि बन कर उस क्षेत्र में आश्रम को अपनी सवाएं दे रहे हैं। कर्नाटक में अबला आश्रम नाम से अनाथ लड़कियों का आश्रम चल रहा है। इसमें से अधिकतर लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद कम से कम दो तीन साल के लिए सेवावर्ती बन कर ग्रामीण क्षेत्र में काम करती हैं। तत्पश्चात् उनका पारिवारिक जीवन में प्रवेश होता है। अपना अनुभव है कि समाज में जो सेवित जन हैं, उनके मन में भी दूसरों की सेवा करने की इच्छा जागृत होती है।
क्या सेवा विभाग के द्वारा पुरस्कार का वितरण होता है?
वैसे तो संघ के सेवा विभाग द्वारा कोई पुरस्कार नहीं दिया जाता परंतु कुछ सेवा भाव की संस्थाओं द्वारा ऐसे पुरस्कार दिए जाते हैं जैसे कि केशवसृष्टि द्वारा युवा पुरस्कार, जनकल्याण समिति द्वारा श्री गुरुजी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश में भाऊसाहब देवरस पुरस्कार आदि।
आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत सारे बाबाओं द्वारा सेवा कार्य का दुरुपयोग किया जा रहा है। इस पर आपकी क्या राय है?
ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े से हैं। अपितु देश में बड़ी मात्रा में संत, धर्माचार्य, धार्मिक संस्थाएं सेवा कार्य कर रही हैं। जैसे कि सत्य साई बाबा ट्रस्ट, जिन्होंने कर्नाटक-आंध्र के सात सौ अकालग्रस्त गांवों में पानी की व्यवस्था की है। रोड बनाए हैं। शिक्षा का काम कर रहे हैं। माता अमृतानंदमयी के द्वारा भी हजारों सेवा कार्य भारत भर में अलग अलग हिस्सों में हो रहे हैं। स्वामी नारायण मंदिर भी बड़ी मात्रा में सेवा कार्य कर रहा है। गलत कार्यों वाले उदाहरण बहुत ही थोड़े हैं जैसे चावल में कंकड़ की ही भांति। अर्थात् सारे चावल कंकड़ हैं, ऐसा कहना गलत है। हमारा आकलन ऐसा है की आध्यात्मिक क्षेत्र के साधु-संत मठ मंदिर जैसी धर्म की संस्थाएं उच्च कोटि का सेवा कार्य कर रही हैं। उनको भी संगठित कर समाज में चलने वाले उनके सेवा कार्य को सामने लाने का प्रयोग चल रहा है।
समाज में सेवाकार्य के क्षेत्र में सजगता लाने हेतु क्या संदेश देंगे?
जिन लोगों ने ईश्वर की कृपा और अपने परिश्रम के बल पर जीवन में समृद्धि पाई है उन्हें आगे आना चाहिए। पीड़ा से ही संवेदना उत्पन्न होती है। यही संवेदना व्यक्ति को सेवा करने के लिए प्रेरित करती है। इन लोगों को अपने आसपास के क्षेत्रों एवं बस्तियों में जाकर उनके दु:खों की अनुभूति कर उनकी पीड़ा को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही, देश भर में लाखों सेवा कार्य हो रहे हैं। उन्हें जाकर उन सेवा कार्यों का अवलोकन करना चाहिए ताकि उनके मन में भी सेवा भाव पैदा हो सके। पैसे के अलावा हर व्यक्ति को अपना कुछ कीमती समय निकाल कर सेवा कार्य करना चाहिए। व्यक्ति केे अंदर यह भाव आना चाहिए कि उसने भी दीन दुखियों की सेवा की है। इस तरह की भावना वाला समाज ही संगठित हो पाता है। देशभर में लाखों लोग इस तरह के कार्य कर रहे हैं। आगे भी होता रहे, यही भावना है।
एक लाख सत्तर हजार से भी अधिक की संख्या में चल रहे सेवा कार्यों के संचालन हेतु मानव संसाधन कैसे जुटाते हैं?
शाखा में आने वाले जो संघ के स्वंयसेवक हैं उनके मन में भी सेवा भाव जागृत होते हैं। उसके अलावा सेवा कार्य में जुटने वाले को लोगों की पीड़ा, समस्या का दर्शन कराने के लिए प्रत्येक शाखा स्वंयसेवकों का समूह काम करता है। मलीन बस्ती में नियमित रूप से जाकर अनुभव करें और धीरे धीरे सेवा कार्य करने लगे। दूसरा, जैसे लोग तीर्थ क्षेत्र में जाते हैं वैसे ही सेवा कार्य भी हमारे लिए तीर्थक्षेत्र ही हैं। तीसरा, जिनके मन में सेवा की रुचि जागृत हुई हो ऐसे लोगों के लिए सेवा के व्यावहारिक प्रशिक्षण का नियमित काम भी चलता है। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण जिसमें रुचि है वैसा कार्य कर सकते हैं। या जो सेवा करने वाली जनता है उनके साथ जुड़ कर कार्यकताओं की संख्या बढ़ती है।

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