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इंट्रो : मोदी सरकार ने अवांछित कार्य में लगे स्वैच्छिक संगठनों (एनजीओ) और विदेश धन पाकर अपना उल्लू सीधा करने वालों के खिलाफ शिकंजा कसा है। कई अच्छे स्वैच्छिक संगठन हैं, जो जन-जन की सेवा में लगे हुए हैं और उन्हें प्रोत्साहन देने की जरूरत है। लेकिन, गलत काम करने वालों को कड़ाई से रोकना भी आवश्यक है।
 
NGO यानी नॉन गवर्नमेंटल आर्गेनाइजेशन याने गैर सरकारी संगठन या अलाभकारी संगठन। NGO व्यक्तियों, कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों, वालेंटियर्स और सामाजिक कल्याण में जुटे लोगों का एक ऐसा समूह होता है, ऐसा सामाजिक संगठन होता है, जिस के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता, व्यक्तियों का समूह, समुदाय, नागरिक, समाज के कल्याण और विकास के लिए कार्य करते हैं। इसका विकास अमेरिका से हुआ।
 
यदि व्यक्तियों का समूह या कोई समुदाय, सामाजिक परिवर्तन पर या किसी ऐसे ही मुद्दे पर कार्य करना चाहता है तो वह बिना रजिस्ट्रेशन किए भी यह कार्य कर सकता है। बिना पंजीकरण कराए भी कोई समूह, संस्था, समाज सेवा का कार्य कर सकती है। सरकार अथवा अनुदानदाता संगठनों से आर्थिक सहायता अनुदान लेने के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया जरूरी है। हां, यदि कोई समूह अनुदान नहीं लेना चाहे, तो पंजीकरण कराना जरूरी नहीं है। फिर भा, रजिस्टर्ड संस्था की अपनी अलग पहचान होती है। एक बार पंजीकरण हो जाने के बाद संस्था को सभी प्रकार की सहायता एवं अनुदान प्राप्त हो सकता है। संस्था पर कानूनी प्रक्रिया के दायरे से सरकारी नियंत्रण होता है। इसके साथ ही गैर सरकारी संगठनों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए स्थायी या अस्थायी प्रमाण पत्र एफसीआरए वित्त मंत्रालय से लेना पड़ता है।
 
प्राय: स्वयंसेवी संस्थाएं सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्तर पर समाज में पिछड़े वर्ग की उन्नति, बेहतरी और विकास के लिए कार्य करती हैं ताकि उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। गैर सरकारी संगठन लोगों की सहभागिता के लिए जाने जाते हैं और लाभकारी संस्था के रूप में कार्य करने वाली संस्थाएं संगठन के रूप में आयोजित नहीं कर सकते। गैर सरकारी संगठन के सारे मिशन, विजन और उद्देश्य और लक्ष्य मानव जीवन और सभ्यता के विकास के लिए होते हैं।
 
वर्तमान समय में २० लाख से अधिक NGO सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत एक्टिव हैं जो कई क्षेत्रों में छोटा-बड़ा योगदान कर रहे हैं। इसमें से ३% ग्रामीण क्षेत्रों में, १% ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट के क्षेत्र में, सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण और एक अन्य सेक्टर में कार्यरत हैं किंतु पिछले कुछ दशकों में अर्थ प्राप्ति की अंधी दौड़ में एनजीओ भी शामिल हो गए। भलाई का ढोंग कर मलाई खाने वाले, सेवा के बदले मेवा खाने वाले, कुछ गैर सरकारी संगठन देशी या विदेशी ऋणदाताओं से प्राप्त समाज कल्याण अर्थ राशि को व्यक्तिगत कार्य खर्च में व्यय करने लगे हैं।
 
हिंदुस्तान में बहुत सी फॉरेन फंडिंग वाले एनजीओ काम करते हैं जो समाज की भलाई का काम कम ही करते हैं। कुछ तो धर्म परिवर्तन का काम करते हैं तो कुछ राष्ट्र विरोधी काम में लगे हैं। प्रधान मंत्री कार्यालय के निर्देश पर गृह मंत्रालय ने फॉरेन फंडिंग वाले एनजीओ पर शिकंजा कसना शुरू किया है। इंटेलिजेंस ब्यूरो यह कदम उठा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक देश की सुरक्षा के हित में पीएमओ चाहता है कि नया सिस्टम १५ जून तक तैयार हो जाए।
 
ऐसे नियम २०११ को पिछली यूपीए सरकार की तरफ से लाए गए थे और एफसीआर एक्ट- २०१० में बना था। अब इन नियमों को और सशक्त बनाया जा रहा है। प्रस्तावित बदलावों के तहत पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए NGO इकाइयों को ४८ घंटे के अंदर फॉरेन फंडिंग के बारे में जानकारी देनी पड़ सकती है। अधिकारी ने बताया इसके लिए लिए ऐसी वेबसाइट रखनी जरूरी होगी जहां विदेशी राशि हासिल करने पर ४८ घंटे में विस्तार से जानकारी देनी होगी। वर्तमान सरकार ने गैर सरकारी संगठनों पर कड़ी कार्रवाई करते हुए २०,००० एनजीओ के विदेशी चंदा नियमन कानून के अंतर्गत लाइसेंस रद्द किए हैं। इस कार्रवाई के बाद अब सिर्फ १३००० एनजीओ कानूनी रूप से मान्य हैं।
 
५० प्रतिशत से ज्यादा पर कार्रवाई करते हुए मोदी सरकार ने इस साल उनका एफसीआरए लाइसेंस रद्द किया है। सरकार द्वारा ३३,००० में से १ साल में २०,००० एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए हैं। ये सभी अवैध गतिविधियों में शामिल थे। इनमें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का कबीर संगठन व दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। समाज की भलाई करने का उद्देश्य और लक्ष्य लेकर खुले इन गैर सरकारी संगठनों में से कुछ संगठन देश विरोधी कार्य तक में लिप्त पाए गए। जैसे ग्रीन पीस फाउंडेशन एवं गुजरात की सामाजिक कार्यकर्ता कही जाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ एवं उसके पति जावेद आनंद का एनजीओ सबरंग ट्रस्ट NGO ने एफसीआरए के नियमों का उल्लंघन किया है जिसमें प्रमुख रूप से विदेशी धन के व्यक्तिगत खर्च का मामला है। इसके अलावा इलाहाबाद के जाकिर नाइक पर देश के खिलाफ अवैध गतिविधि, धार्मिक एवं नस्लीय आधार पर विभिन्न पक्षों के बीच नफरत फैलाने का भी आरोप है। इस NGO को सरकार ने ५ वर्ष के लिए प्रतिबंधित किया है। अभी कुछ वर्ष पूर्व रोहतक का एनजीओ ‘अपना घर’ सुर्खियों में था। मासूम बेसहारा गरीब शोषित निराश्रित दुखद विपरीत परिस्थितियों की शिकार महिलाओं को आश्रय देने वाले इस NGO में महिलाओं से जबरन देह व्यापार से लेकर बाल यौन शोषण, निर्मम पिटाई कर बाल मजदूरी, बच्चों की खरीद-फरोख्त जैसे सभी अनैतिक कार्य हो रहे थे।
 
आज प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से अधिक लोग गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। इनमें से कई संस्थानों ने निःस्वार्थ भाव से सेवा करते हुए देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया है। जैसे पर्यावरण के क्षेत्र में सुनीता नारायण को, बाल अधिकार हेतु कैलाश सत्यार्थी को, सुदूर जंगलों में जन सेवा करते बाबा आमटे, जल संरक्षण में उल्लेखनीय कार्य करते राजेंद्र सिंह उर्फ पानी बाबा जैसी हस्तियां अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के कारण ही देशभर में जानी गई हैं। इसी तरह मानव अधिकारों में संलग्न एमनेस्टी इंटरनेशनल, पल्स पोलियो अभियान को सफल बनाने में रोटरी इंटरनेशनल, एड्स व टीबी के विरुद्ध जन जागरूकता फैलाने में क्लिटंन फाउंडेशन जैसे एनजीओ देश को आगे बढ़ाने में सहायक हैं। इसके साथ ही सर्व सेवा संघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारत सेवाश्रम संघ, रामकृष्ण मिशन, हरिजन कल्याण संघ, कश्मीर मूवमेंट, भारत तिब्बत मैत्री संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, जन कल्याण परिषद, शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाउंडेशन, सुरभि शोध संस्थान, दीनदयाल शोध संस्थान, इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन जैसे संगठन समाज सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। इन्होंने सेवा का कीर्तिमान स्थापित किया है। प्रकाशन क्षेत्र में गीता प्रेस तथा ठाकुर प्रसाद सन्स बुकसेलर ने प्रकाशन के माध्यम से सेवा बढ़ाने का कार्य किया है।
 
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ स्थित समाज कार्य संकाय के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात गांधीवादी चिंतक प्रोफेसर रामप्रकाश द्विवेदी का कहना है कि भारत में समाज सेवा का लंबा इतिहास रहा है। कुछ समय के बाद सरकार एवं प्रबुद्ध लोगों ने यह अनुभव किया कि समाज सेवा के स्थान पर यदि समाज कार्य को बढ़ावा दिया जाए तो समाज के निचले वर्ग के लोगों की समस्या को हल किया जा सकता है। इस दृष्टि से भारत में ‘समाज कार्य’ नामक शैक्षणिक विचारधारा का विकास हुआ। समाज कार्य विभाग से बीएसडब्ल्यू और चडथ करने वाले विद्यार्थी समाज के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ स्थित समाज कार्य संकाय भारत का श्रेष्ठ समाज कार्य संस्थान है। मेरे अनेक विद्यार्थी राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सेवा कर रहे हैं लेकिन कुछ गैर सरकारी संगठनों को देख कर दुख होता है। अतः सरकार और समाजसेवी लोगों का यह दायित्व बनता है कि वे इसके नियंत्रण का प्रयास करें तथा इसे राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करें।

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