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 वर्तमान में फर्जी एनजीओ और छद्म धर्माचार्यों की बाढ़ सी दिखाई देती है। कई ढोंगी पकड़े गए है; कई पकड़े जाने की राह में है। इसी तरह गड़बड़ी करने वाले एनजीओ के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। यह अंकुश आवश्यक है ताकि अध्यात्म और सेवा के क्षेत्र को नए बाजार में तब्दील होने से बचाया जा सके।
हमारे बनारस के बारे में एक कहावत बहुत मशहूर है-
रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी।
इनसे बचे तो सेवै कासी॥
 
अगर इन चारों की विवेचना करें तो तीनों सजीव सेवा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। पर पुरनियों ने तीनों से ही संभल कर रहने की बात कही है। अर्थात् जीव सेवा के साथ ही साथ उन संक्रमणों से भी बचने की बात पर जोर दिया गया है जो समाज के मेरुदंड को तहस-नहस कर सकते हैं। दुनिया भर के धर्मशास्त्र व ऐतिहासिक तथा साहित्यिक रचनाकर्म बताते हैं कि मानव सेवा की परंपरा की ही तरह उसके नाम पर की जाने वाली धोखाधड़ी का इतिहास भी लगभग उतना ही पुरातन है। तमाम धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से दिखने वाली अच्छाई व बुराई की लड़ाई वास्तव में वास्तविक मानव सेवियों तथा जीव सेवा के नाम पर धोखाधड़ी व शोषण करने वालों के बीच ही रही है। इस लड़ाई की सब से बड़ी विशेषता रही है कि हर काल में सच्चे जनसेवकों की संख्या शोषकों से कम ही रही है। पर बहुधा जीत प्रथम भाव वालों की ही होती रही है। सम्भवतः सत्य की ताकत ही उनके मनोभावों को खाद देती रही है।
 
कुछ ऐसे ही भावों की आवश्यकता वर्तमान समय में भी है। कई स्वयंभू स्वामी यौन शोषण, हत्या जैसे जघन्यमामलों में सीखचों के पीछे जा रहे हैं। तमाम एनजीओ के ऑडिट में धोखाधड़ी हो रही है। आखिर ऐसा क्यों है? जाहिर सी बात है, हमेशा की ही तरह अन्य बहुत से क्षेत्रों की ही भांति यहां भी बहुत सारे छद्म लोगों की बाढ़ आती रही है। पर पहले की स्थिति की अपेक्षा वर्तमान काफी भयावह है। पहले इस तरह के छद्मवेशियों की पहुंच समाज के ऊपरी हिस्से तक ही थी पर वर्तमान समय में इनकी पहुंच समाज के निचले वर्ग तक हो चुकी है।
 
इसका सब से बड़ा कारण है, आम लोगों के रहन-सहन का स्तर ऊपर उठना। पहले, जबकि आम जनों का जनजीवन उतना विलासितापूर्ण न था जितना आज है, छद्म सेवाभावियों की नजर ऊपरी तबके पर ही लगी रहती थी क्योंकि उनके लिए धन ही सर्वोपरि था। जबकि समाज के गरीब तबके तक केवल वास्तविक सेवाभावी लोगों की ही पहुंच थी क्योंकि उनके लिए, लोकसेवा ही सर्वोपरि धन था। समय के साथ आम लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठा तो बहुत सारे नए धर्मगुरु पैदा हो गए। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण ऊंची जातियों द्वारा सदियों से किया गया भेदभाव भी काम कर रहा था। आर्थिक सम्पन्नता ने उन्हें भी धर्म कार्यों में उचित भागीदारी के लिए प्रेरित किया पर ‘ब्राह्मणवाद’ ने यहां भी अपने पांव पसारे, पर एक अलग रूप में। इस बार का ब्राह्मण इनके बीच से आया था। इस नवेले ब्राह्मण ने गरीब उच्च वर्ग को भी अपनी ओर आकर्षित किया। इस आंदोलन ने आम लोगों की धार्मिक पहुंच तो बढ़ाई, साथ ही पुराने व नए धर्माचार्यों की दृष्टि एक नए बाजार तक भी गई। गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह नए-नए स्वघोषित धर्माचार्य पनप उठे। इनके पीछे काम कर रही थी नव धनाढ्य वर्ग की टैक्स चोरी की लिप्सा। संतों की खाल में काम पिपासु तथा विलासी जन सामने आने लगे जिसके कारण सच्चे संत व सेवाभावी लोग नेपथ्य में जाने लगे।
 
इस मामले में भी सारे बहस मुबाहिसे फिल्मों की ही तरह हैं। जैसे हिंदी फिल्मों में अभिव्यक्ति की आजादी तथा सेक्युलरिज्म के नाम पर जितनी आसानी से सनातन धर्म की धार्मिक आस्थाओं पर चोट करने वाले प्रसंग दिखा दिए जाते हैं, उतनी तत्परता अन्य मतावलम्बियों की कुरीतियों के प्रति नहीं दिखती। ठीक उसी तरह मीडिया में हिंदू धर्म से संबंधित कुसंतों के पकड़े जाने पर काफी हो हल्ला मचता है पर अन्य धर्मावलम्बियों के मामले आने पर चुप्पी धर ली जाती है। किसी मौलवी द्वारा लखनऊ के एक मदरसे में बच्चियों का यौन शोषण किया जाना भी उतना ही भयानक है, जितना किसी तथाकथित साधु द्वारा किया गया यौन शोषण। पर समाज का सच सबके सामने है। एक बोहरा मुसलमान द्वारा अपने समाज में महिलाओं का खतना किए जाने जैसे अमानवीय कृत्य का विरोध किसी समाचार माध्यम में बहस का मुद्दा नहीं बन पाता। अपने मुंबई प्रवास के शुरुआती दिनों में बहुत सारे कैथलिक विद्यालयों में जाना होता रहा। महिला साध्वियों की स्थिति देख कर देवदासियों की याद आ जाती थी। ‘एक बार में तीन तलाक’ कुरान शरीफ और शरीयत के अनुसार अवैध है पर बहुत कम मुसलमान बुद्धिजीवियों ने सरकार के नए कानून की प्रशंसा की।
 
कमोबेश ऐसी ही स्थिति गैर सरकारी संगठनों (NGO) के मामले में भी है। यहां भी धोखाधड़ी का गोरखधंधा धड़ल्ले से चलाया जा रहा है। वैसे तो देशभर में लगभग ३२ लाख एनजीओ कार्यरत हैं पर इनमें से केवल तीन लाख ही बैलेंस शीट फाइल करते हैं। इन पर निगरानी रखने के लिए कोई समुचित विकसित तंत्र भी नहीं पनप पाया है। जनता के पैसों की धोखाधड़ी करने वाले संगठनों का तर्क भी काफी मजबूत है कि इस तरह के कार्यों के लिए सिर्फ एनजीओ ही अकेले जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि केंद्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड, लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी परिषद, जिला एवं ब्लाक स्तर पर कार्यरत सरकारी संस्थाएं जिन्हें दाता (डोनर एजेंसी) कहा जाता है, एनजीओ के कामकाज को मानिटर करने वाले, ऑडिट करने वाले एवं एनजीओ समेत एक बहुत बड़ा नेटवर्क काम करता है जो सारे मानकों को परे रख फर्जी रिपोर्ट आगे बढ़ाता है।
 
तीसरी दुनिया के बहुत सारे बड़े एनजीओ संस्थाओं के पीछे पश्चिमी ताकतें भी काम करती हैं। इनका काम होता है जन सुविधा के कार्यों का विरोध कर उनकी लागत को बढ़ा देना ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुनाफा बढ़ाया जा सके तथा कभी-कभी देश में अस्थिरता का वातावरण बनाया जा सके। उदाहरण के तौर पर गुजरात की कथित सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ व उनके पति जावेद आनंद की सामाजिक संस्था को गृह मंत्रालय ने विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) का उल्लंघन करने के मामले में नोटिस भेजा है। संगठन को २००८-०९ से लेकर २०१३-१४ के बीच १.१८ करोड़ रुपए की विदेशी सहायता मिली है। गृह विभाग की नोटिस के अनुसार इसमें से ९५ लाख रुपए कानूनी सहायता के नाम पर खर्च किए गए जबकि एनजीओ का पंजीकरण ‘शैक्षणिक और आर्थिक कार्यों’ के लिए किया गया था। इस प्रकार एनजीओ ने एफसीआरए नियमों का उल्लंघन किया था। विदेशी चंदों के लिए खोले गए खातों से सिटी बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया को तीस्ता व जावेद के क्रेडिट कार्ड की सुविधा के एवज में १२ लाख रुपए का भुगतान भी किया गया। पीयूसीएल की बैठकों में भाग लेने के लिए किताबों एवं यात्रा पर किया खर्च, लाहौर यात्रा के लिए ली गई अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पॉलिसी भी ‘सबरंग ट्रस्ट‘ के खाते से की गई। २००२ में बर्बाद हुई अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में म्यूजियम बनाने के लिए डेढ़ करोड़ का विदेशी चंदा जमा किया गया पर उसे भी उनके द्वारा हड़प लिए जाने का आरोप है। दंगा पीड़ितों के कल्याण के लिए मिले ९.७५ करोड़ रुपए के दान में से ३.८५ करोड़ निजी कार्यों में खर्च किए जाने का भी आरोप है। इसी तरह के बहुत सारे आरोपों के घेरे में है, तीस्ता व उनके पति जावेद। विदेशी पैसे की निगरानी के लिए पहली बार १९७६ में इमरजेंसी के दौरान कड़ा कदम उठाया गया। ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’ (एफसीआरए) का मुख्य उद्देश्य विदेशी चंदे के रूप में व्यक्तिगत और संस्थाओं को मिलने वाले धन की निगरानी था, ताकि यह धन राष्ट्रीय हित के खिलाफ न हो। वर्तमान सरकार ने उन नियमों के पालन में और कड़ाई की है ताकि भ्रष्टाचार के सुराखों को समाप्त करने की दिशा में कार्य किया जा सके। गृह मंत्रालय ने २०१४ से २०१६ के बीच १०३ एनजीओ पर १.६ करोड़ का जुर्माना लगाया था। देश भर में ३२ लाख एनजीओ हैं जो स्कूलों की संख्या की अपेक्षा दुगुना तथा सरकारी अस्पतालों की संख्या का २५० गुना है। एफसीआर के तहत १९९३-९४ में १८६५ करोड़ का विदेशी धन आया था जबकि पिछले तीन सालों में ५१ हजार करोड़ की राशि आई है। कई सेवा संस्थाओं तथा एनजीओ पर तो फर्जी होने व मनी लांड्रिंग के आरोप भी लगे।
 
समय-समय पर ऐसे संगठनों की जांच तथा इस क्षेत्र में सुधार की मांग उठती रही है क्योंकि यह क्षेत्र काफी हद तक कारोबार बन चुका है। अलग-अलग नामों से रजिस्ट्रेशन करवा कर विदेशों या देश के सरकारी विभागों से अनुदान लेना, उनको कागजों में खर्च दिखा कर बंदरबांट कर ली जाती है। ऐसे लोगों के मन में सेवा के लिए कोई स्थान नहीं होता। अतः आवश्यक हो जाता है कि वहीं संस्थाएं धरातल पर दिखें जो वास्तविक अर्थों में सेवा भावना व राष्ट्रहित के तहत आगे बढ़ रही हैं। दुर्जनों पर पूरी तरह से अंकुश न लगाया गया तो समुचित कार्य करने वाली संस्थाओं तथा सेवा भावना को लेकर भी लोगों के मन में अविश्वास का वातावरण बन जाएगा, जो भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत है।

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