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चिंचवड़ ग्राम के ग्रामवासियों ने, जिनमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल थे, केवल अपनी श्रमशक्ति के बल पर बोरों से अनेक बांधों का निर्माण किया। इन बांधों से रुके हुए पानी को रेख कर सरकारी अधिकारियों ने पक्के बांध बनाने का काम प्रारंभ किया। कोकणपाडा के लोगों ने शासन से प्राप्त राशि कम होने के बावजूद अपनी आवश्यकता का काम पूर्ण किया। पुराना कुंआ, जो गिर चुका था, उसे अपनी श्रमशक्ति से पुन: बांधा। केवल सीमेंट, ईंट वगैरह खरीदने के लिए शासन से प्राप्त निधि का उपयोग किया। थोकर हट्टी गांव के लोगों ने कुएं तक जाने का मार्ग स्वत: के श्रम से ठीक किया और फिर आगे का रास्ता बनाने हेतु शासन से सहायता मांगी। काष्टीपाडा गांव के विद्यालयीन विद्यार्थियों ने सर्वे कर यह पता लगाया कि गांव में कितने लोगों के पास रोजगार गारंटी योजना के जॉब कार्ड नहीं हैं और फिर उन लोगों से ग्राम पंचायत में शिकायत करने को कहा। देवी का पाडा ग्राम की महिलाओं ने रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत सब को काम मिले, इस मांग के लिए सतत आंदोलन किया। आवेदन करने के तीन माह बाद भी काम न मिलने की दशा में, तहसीदार से बेरोजगारी भत्ते की मांग की। नौकरशाही एवं स्थानीय नेताओं के दबाव के बावजूद वे झुके नहीं एवं अंत में सतत छह हफ्ते गांव के सभी लोगों को काम मिलने के बाद उन्होंने आंदोलन वापस लिया। डोयापाडा के सभी लोगों ने एकत्रित होकर सामूहिक वन अधिकार कानून के अंतर्गत मिले हुए जंगल की रक्षा करने का काम प्रारंभ किया। जंगल की जैव विविधता को नोट किया। महुआ के वृक्षों का अभ्यासपूर्वक विवेचन कर वन विभाग को दिखाया। आश्चर्यचकित मुख्य संरक्षक ने उस गांव को महुए का तेल निकालने की घानी प्रदान की।
 
यह और इस तरह की अन्य अनेक बातें हैं। इसमें न लिखी हुई एक पंक्ति इन गांवों के लोग हमेशा कहते हैं। वे कहते हैं-हमें स्वाभिमान से जीवन जीना और अपना हक प्राप्त करना ‘वयम्’ आंदोलन ने सिखाया। यह आंदोलन किसका? यह, पूछने पर वे कहते हैं-हम इसे स्वयं चलाते हैं। इस वयम् आंदोलन ने कुछ गांवों में बच्चों को साथ लेकर काम करना प्रारंभ किया है। किसी-किसी घर पर मराठी में ‘‘बिन बुक, या शिका’’ अर्थात बिना पुस्तकों के आओ पढ़ेंे, ऐसा बोर्ड नजर आता है। उस घर में होती है एक खिलौनों की पेटी। उस पेटी के खिलौने होते हैं, उस गांव के बच्चों के। उपयोग के नियम बच्चों के बनाए हुए। इन खिलौनों को वे ही संभालते हैं। खिलौनों की तोड़फोड़ तो दूर, बच्चे उसमें स्वतः के बनाए हुए खिलौने रख कर खिलौनों की संख्या में वृद्धि करते हैं। कचरे में मिली हुई बोतलों की ट्रेन, मिट्टी एवं चप्पल से तैयार ट्रक, कुम्हड़े की बेल की बांसुरी जैसे विविध खिलौने बच्चे बना कर लाते हैं। लोकतंत्र का पाठ यहीं से प्रारंभ होता है।
 
आगे चल कर यही बच्चे अपने गांव का जंगल और पानी सम्हालने वाले हैं। कुछ हाईस्कूलों में एक आलमारी में ‘वयम् आंदोलन’ की प्रयोगशाला भी नजर आती है। इस आलमारी को ताला लगा रहता है परंतु चाबी भी बच्चों के पास होती है। माइक्रोस्कोप, परख नली, ये सब बच्चे संभालते हैं। पानी की बोतल, स्ट्रा, खेलने की गोटियां, पुरानी सी.डी. का उपयोग कर स्वत: प्रयोगशाला का साहित्य भी तैयार करते हैं। विज्ञान पढ़ने के लिए धनवान घर में जन्म लेना आवश्यक नहीं है, यह ये बच्चे अपनी कृति से हमें समझाते हैं।
 
शहर के लोगों ने उपयोग किए हुए परंतु अच्छे कपड़े दिए थे। आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने वे कपड़े कुछ महिलाओं के समूह को बेेचने हेतु दिए। महिलाओं ने वे गांवों में बेचे एवं अपने समूह हेतु पूंजी जुटाई। उन्होंने उसका कुछ हिस्सा ‘वयम्’ को भी दिया। यह हमारा आंदोलन है, हम अपना हिस्सा देंगे ही, यह कहते हुए वे कहती हैं-आंदोलन ने हमें सिखाया है कि मुफ्त में कुछ लेना नहीं है। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना है। जहां आवश्यक हो वहां मित्रों एवं शासन से मदद लेना और मिल कर आगे कदम बढ़ना है। ‘वयम्’ यानी स्वयं के विकास का आंदोलन। यह पौधा सन २००८ में मिलिंद थत्ते, दीपाली गोगटे और उनके कुछ मित्रों ने लगाया। अब जव्हार तहसील के कई आदिवासी गांव यह आंदोलन चलाते हैं।

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