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इंट्रो : जब अंतःकरण की सभी वृत्तियां शुभ कार्य में लगती हैं, तो वे सेवा के रूप में प्रकट होती हैं। भारतीय मनीषा की सभी चराचर के प्रति यही भावना रही है, अध्यात्म की वास्तविक फलश्रुति भी यही है।

 

श्रीमद्भगवद गीता के बारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने मुक्ति योग की व्याख्या करते हुए अद्भुत बात कही है, जिसका सीधा संबंध मानव कल्याण से है-
 
नियम्येंद्रिय ग्रामं सर्वत्र सम बुद्धयः।
प्राप्नुवन्ति मागेव सर्वभूतहिते रताः॥
 
अर्थात जो अपनी इन्द्रियों पर संयम रखते हुए, समान संतुलित बुद्धि से सभी सचराचर जगत के हित में अर्थात सेवा में सतत लगे रहते हैं, उन्हें मैं अर्थात परमात्मा का साक्षात्कार होता है। सेवा की इससे अधिक प्रभावी और प्रामाणिक व्याख्या और कोई नहीं हो सकती, जिसमें परमात्मा स्वयं कह रहे हैं कि यदि मेरी प्राप्ति करनी है, सत् चित् आनंद का साक्षात्कार करना है तो हे मानव! अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए, उसका नियमन करते हुए, सम्यक बुद्धि से संपूर्ण प्राणियों के हित के लिए कार्य करो, यही सब से बड़ा धर्म है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी बात को अपने ग्रंथ श्री रामचरित मानस में बड़े ही सरल ढंग से समझाया कि धर्म जानना चाहते हो तो सुनो-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥
अर्थात सब से बड़ा धर्म दूसरों का हित करना, प्राणीमात्र की सेवा करना है और इसके विपरीत दूसरों को दु:ख देना, उनके शोक का कारण बनना ही सबसे बड़ा अधर्म है। इसी प्रकार को एक और बड़ा ही धार्मिक उदाहरण श्रीमद्भागवत के सातवें स्कंध में भक्त प्रह्लाद की कथा प्रसंग में मिलता है, भक्त प्रह्लाद को नरसिंह भगवान का साक्षात्कार होता है और वे स्तुति कर रहे हैं, भगवान की, जिसमें वे अपने लिए कुछ नहीं मांग रहे हैं, वे भगवान से प्राणीमात्र के दु:ख, कष्ट तथा दुर्भाग्य को दूर करने की शक्ति की मांग कर रहे हैं, ताकि वे उनकी सेवा करके स्वयं को मुक्त कर सकें-
प्रायेण देव मुनय:स्व विमुक्त कामा
मौनं चरन्ति विजने न परार्थ निष्ठा
नैतान विहाय कृपाणान विमुमुक्षएको
नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये
पांच वर्ष का छोटा सा बालक प्रह्लाद उक्त श्लोक के माध्यम से मानवता को सेवा का महत संदेश देता है, वह कहता है-‘हे देव, हे भगवान, जो मुनि केवल अपने मोक्ष के लिए तप, यज्ञ आदि करते हैं, उनका दूसरों के हित से कुछ लेनादेना नहीं है, वे केवल अपने लिए ही तपस्या कर रहे हैं। दूसरों के भलेबुरे से उनका कुछ संबंध नहीं है किन्तु हे प्रभु! मैं ऐसा नहीं कर सकता, इस संसार में दु:ख, शोक से ग्रस्त असंख्य लोगों को उनके हाल पर छोड़ कर मैं केवल अपने मोक्ष का वरदान आपसे नहीं मांगता। आप तो मेरे पर ऐसी कृपा करो कि मैं इन शोषित, पीड़ित, दलित लोगों के कष्ट को दूर करने में अपना कुछ योगदान कर सकूं।’ भारत की मनीषा एवं संस्कृति में सेवा का अर्थ इसी प्रकार किया गया है। यही कारण है कि जब स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण भारत का भ्रमण करके यहां के लोगों के दु:ख, दारिद्र्य और दुर्दशा को देखा तो उन्होंने भारत के लोगों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘जब तक कराड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूंगा, जो उनकी कीमत पर शिक्षित हुआ है, किन्तु उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता है। वे लोग जिन्होंने गरीबों का शोषण करके धन अर्जित किया है और अब ठाठ-बाट से अकड़ कर चल रहे हैं, यदि उन करोड़ों देशवासियों के लिए जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं, कुछ नहीं करते, तो घृणा के पात्र हैं। ‘आत्मवत सवभूतेषु’ (सभी प्राणियों में अपने को देखना) क्या यह वाक्य केवल मात्र पोथी में पढ़ने के लिए है? जो लोग गरीबों को रोटी नहीं दे सकते, वे फिर मुक्ति क्या दे सकते हैं। अत: उठो, अपना पौरुष प्रकट करो। अपना ब्राम्हाणत्व दीप्त करो, श्रेष्ठता के भाव से नहीं, अंधविश्वासों तथा पूर्व-पश्चिम के सहारे पनपते विकृत अहंभाव से नहीं- बल्कि सेवा की भावना से, सेवक बन कर और दूसरों को ऊपर उठा कर।’’ स्वामी विवेकानंद आगे कहते हैं कि, ‘‘मैंने इतनी तपस्या और साधना की है, किन्तु सब का सार यही है कि प्राणीमात्र में परमात्मा का वास है, इसके अतिरिक्त ईश्वर और कुछ भी नहीं। जो जीवों की सेवा करता है, उस पर दया करता है वही ईश्वर की सच्ची साधना है और उपासना है। यदि ईश्वरोपासना के लिए मंदिर निर्माण करना चाहते हो हो तो करो किन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, महान मानव देह रूपी मंदिर तो पहले से ही मौजूद है, वह प्रत्यक्ष है, उस की सेवा करो।
अपने तन, मन और वाणी को जगत के हित के लिए अर्पित करो। तुमने पढ़ा है, मातृ देवो भव, पितृ देवो भव- अपनी माता को ईश्वर समझो, अपने पिता को ईश्वर समझो परन्तु मैं कहता हूं दरिद्र देवो भव, मूर्खदेवो भव। गरीब निरक्षर, मूर्ख और दु:खी कोे अपना ईश्वर मानो, इनकी सेवा करना परम धर्म हैं।’’धर्म की यही व्याख्या भारत का दर्शन और भारत का अध्यात्म करता है, जिसमें संपूर्ण सृष्टि को परमात्मा का व्यक्त स्वरूप मान कर उसकी आराधना-साधना-सेवा की बात कही गई है। वैसे अध्यात्म का जो अर्थ आज के संदर्भ में लिया जाता है, वह अंग्रेजी के स्पिरिचुअलिज्म के पर्यायवाची के रूप में लिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह नहीं है। वास्तव में अध्यात्म का मतलब है जो हमारे अपने भीतर है अर्थात हमारे शरीर के अन्दर है आत्मनि-अधि, जैसे हमारा स्थूल शरीर है,उसके भीतर इन्द्रियां हैं। इंन्द्रियों से सूक्ष्म मन, मन से सूक्ष्म बुद्धि और बुद्धि से भी सूक्ष्म आत्मा जिससे मानव का पूरा व्यक्तित्व बनता है। गीता में इसकी व्याख्या है।
 
इन्द्रियाणि पराण्याहु: इन्द्रियेभ्य: परं मन:,
मनसस्तु परा बुद्धि, यो बुद्धे: परतस्तु स:।
स्वं बुद्धे परं बुद्धवा, संस्तभ्यत्मानमात्मना,
जहि शत्रुं महाबाहो, काम रूपं दुरासदम॥
 
मानव शरीर तथा उसके अन्तर में स्थित मन, बुद्धि, आत्मा तथा वृत्तियां जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, उत्साह, श्रद्धा, भक्ति, दया, करुणा, सहयोग, प्रेम, समर्पण के भाव यह सभी अध्यात्म हैं। सामान्यत: जब हम अध्यात्म का विचार करते हैं तो उससे मानव के अंत:करण में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि के प्रभाव के कारण जो दोष और अवगुण उत्पन्न हो जाते हैं वे सभी वृति गुण में परिवर्तित हो जाएं अर्थात मानव के अंत:करण में प्रेम, दया, करुणा, परस्पर सहयोग, बंधुत्व के भाव जागृत हों और संपूर्ण मानवता का कल्याण करने में स्वयं का योगदान हो सके। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी भाव को श्री रामचरितमानस का समापन करते हुए बड़े ही धार्मिक ढंग से व्यक्त किया है-
 
कामिही नारि पियारि जिसि लोगहिं प्रिय जिम दाम।
तिम रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहूं मोहि राम॥
 
‘जिस प्रकार से कामी पुरुष को स्त्री प्यारी लगती है, जिस प्रकार से लोभी व्यक्ति की धन में आसक्ति होती है, उसी प्रकार से हे रामजी! आप मुझे प्रिय लगो ताकि मेरा जीवन सफल हो जाए।’यही अध्यात्म हैं। जब अंतःकरण की सभी वृत्तियां शुभ कार्य में लगती हैं, तो वे सेवा के रूप में प्रकट होती हैं। भागवत में राजा रंतिदेव की कथा आती है। महाप्रतापी राजा रंतिदेव अहंशून्यता के सुमेरु हैं। एक समय अड़तालिस दिनों तक उपवास करके वे उद्यापन करने जा रहे थे। इसी समय एक एक कर अतिथि आने लगे। पहले ब्राह्मण, फिर शूद्र, फिर चांडाल, फिर कुत्ता। सब को अपना भोजन ही नहीं, अपने पास का पानी भी दे दिया। सब कुछ देकर जब वह केवल आचमन करके उठने लगे, भगवान अपने चतुर्भुज स्वरूप में उनको दर्शन देते हैं और उनसे वर मांगने को कहते हैं। उस समय राजा रंतिदेव ने जो मांगा है, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व साहित्य में नहीं मिलता और भारत की सनातन चिंतन धारा की पराकाष्ठा है।
 
रंतिदेव प्रणत होकर प्रभु से प्रार्थना करते हैं-
न त्वहं कामये राज्यं न च जन्मं न पुजर्भवम्।
कामये दु:ख तप्तानां प्राणनामार्तिनाशनम्॥
 
अर्थात हे भगवन, न तो मुझे राज्य साम्राज्य की कामना है और न ही पुनर्जन्म या मुक्ति आदि की। मेरा तो एक ही निवेदन है कि इस सचराचर जगत में दु:ख कलेश का अंत हो और उसमें मैं काम आ सकूं।
 
आर्तिप्रपद्येऽखिलं देहभाजाम।
अन्त:स्थितो येन भवन्त्यदु:खा॥
 
मैं ही सब के हृदयस्थ आत्मा बन जाऊं और सभी प्राणियों के दुखों को सह लूं। समस्त विश्व का दु:ख मेरा ही दु:ख बन जाए।
अध्यात्म की यह सात्विक शाक्ति ही वास्तव में संपूर्ण सृष्टि का आधार है। मानव मूलभूत से शांत, सात्विक और सहिष्णु है, तथापि परिस्थितियां, साधन, संपन्नता और अधिक से अधिक संग्रह करने की लालसा उसे अधोगामी बनाती है और वह पशुवत व्यवहार करने लगता है। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति अपने सदगुणों का निरंतर विकास करने का प्रयत्न करें ताकि वह समाज में निष्काम भाव से अपना योगदान कर सके। धन, पद, विद्या और बल की प्राप्ति करके किसी भी व्यक्ति का दिमाग खराब हो सकता है और वह उसका दुरुपयोग भी समाज के शोषण के लिए करता है, जबकि दूसरी ओर एक व्यक्ति उसी धन, विद्वता,
 
पद और ताकत का सदुपयोग मानवता के लिए करता है।
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परपीडनाय।
खलस्य साधोविपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
 
वर्तनाम समय में, जब कि समाज में अधिक से अधिक बटोरने की अंधी दौड़ में सब लोग शामिल हो रहे हैं, ऐसे समय में कुछ ऐसे सत्पुरुष हैं जो इन सब से अलग सेवा के माध्यम से मानवता की एकांतिक साधना में निष्काम, निस्पृह भाव से लगे हुए हैं और सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करके समाज में आदर्श स्थापित कर रहे हैं। वास्तव में ही ऐसे ही लोग सच्चे अर्थों में
 
वैष्णव हैं और आध्यात्मिक गुणों से संपन्न हैं।
वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे॥

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