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                                                                       आश्रम की गौशाला

इंट्रो : सेवा कार्य महान कार्य है जिसके माध्यम से जीवन का स्तर तो उन्नत होता ही है, सेवाव्र्रती का जीवन धन्य होता है तथा वह जीवन की सर्वोत्तम सफलता के उच्चतर शिखर को छू लेता है। भारतीय जीवन पद्धति का अनादि काल से आधार सेवा ही रहा है।

  गोस्वामी श्री तुलसीदासजी महाराज ने श्री रामचरित मानस में सेवा के महत्व को एक चौपाई में दर्शाया है, ‘सबते सेवक धरम कठोरा’ अर्थात् सेवक (सेवा धर्म) अत्यंत कठिन है। ‘सेवा’ शब्द- शाब्दिक दृष्टि से आकार में जितना छोटा है उसका अर्थ या भाव उतना ही महान है क्योंकि सेवा शब्द की व्याप्ति बहुत बड़ी है। सेवा के माध्यम से लोगों का दुःख-दर्द समझना आसान है। जब तक व्यक्ति ‘सेवा के क्षेत्र में’ नहीं उतरता वह समाज में व्याप्त अभावजन्य पीड़ा को नहीं समझ सकता। सेवा का क्षेत्र बहुत व्यापक है, उसे देश और काल की सीमा में बांधा नहीं जा सकता, संसार के किसी भी हिस्से में सेवा की अपेक्षा (आवश्यकता) होती है; क्योंकि समस्याएं सर्वत्र हैं और जहां-जहां समस्या है वहां-वहां सेवा के अवसर हैं। सेवक के मन में सेवा के माध्यम से संवेदना का संचार स्थायी आकार ग्रहण करता है और यही कारण है कि सेवक के संवेदनशील मन में सेवा की स्थायी वृत्ति सदैव विद्यमान रहती है।
 
सेवा कब और किसकी करनी है? सेवक के मन में अवसर की तलाश, सेव्यजन, सेवा विवेक हर समय जागृत रहता है। सेवा में व्यक्ति के मनोयोग का अत्यधिक महत्व है। सेवा के आधार भी बहुत हैं यथा-परिस्थिति, आवश्यकता, अभाव, पीड़ा, अस्वस्थता, दुर्घटना, प्राकृतिक प्रकोप ये सभी सेवा के आधार और अवसर हैं। ऐसा भी नहीं कि सेवा मात्र मनुष्य की ही की जाए; सेवा के लिए मनुष्येतर प्राणी भी सेवा की परिधि में आ जाते हैं। मनुष्य तो अपनी अभावग्रस्तता, आवश्यकता, पीड़ा बोल कर भी व्यक्त कर सकता है किन्तु इस चित्र-विचित्रात्मक सृष्टि में मूक प्राणी भी हैं, जिनकी पीड़ा को मनुष्य का संवेदनशील मन अनुभव कर सकता है। मूक प्राणी बोल नहीं सकते, पशु-पक्षी; उनकी पीड़ा का अनुभव मानव ही कर सकता है।
मनुष्य और अन्य प्राणियों की दैनंदिन की आवश्यकता और जीवनयापन के लिए आवश्यक संसाधनों का अभाव ही उन सब की पीड़ा का सब से बड़ा कारण है, इस अभाव को कम कर देना या उसे दूर कर देना अथवा उसे समाप्त कर देना, ‘सेवा का सब से बड़ा कार्य है। उदाहरण के रूप में- एक व्यक्ति रोगी है, उसे औषधोपचार की आवश्यकता है। व्यक्ति के पास वस्त्रों का अभाव है, उसे कपड़ों की आवश्यकता है। एक व्यक्ति भूखा है, उसे भूख मिटाने भोजन की आवश्यकता है। व्यक्ति या व्यक्ति समूह आवासहीन है, उसे आवासीय कुटीर (पर्ण कुटी, छोटा सा मकान) अपेक्षित है। प्यासे व्यक्ति के सूखे कण्ठ को पानी की आवश्यकता है। यह सब समर्थ या सक्षम व्यक्ति या किसी समाज सेवी संगठन द्वारा सम्बंधितों को उपलब्ध करा देना, सेवा के दायरे में ही आता है।
 
भगवान् श्रीराम ने अपने कुलगुरु श्री वशिष्ठजी महाराज से सत्संग में एक बार ईश्वर पूजन का प्रकार जानना चाहा, गुरु वशिष्ठजी ने श्रीराम को बताया कि-
 
येन-केन -प्रकारेणयस्य कस्यापि प्राणिनः्।
सन्तोषं जनयेद् राम!तदेवेश्वर पूजनम्॥
 
‘जिस किसी भी प्रकार से जरूरतमंद प्राणी को अपने पुरुषार्थ की कमाई में हिस्सेदार बना कर उसे सहायता पहुंचा कर संतोष प्रदान करना अर्थात् भूखे को अन्न देकर, प्यासे को जल देकर, नग्न व्यक्ति को वस्त्र देकर, रोगी को औषधि देकर, आवासहीन को आवास (कुटीर) उपलब्ध करा कर, अज्ञानी को विद्या देकर, अशिक्षित को अक्षरज्ञान करा कर, अभावग्रस्तों को अभाव से मुक्ति दिला कर संतोष प्रदान करना ही प्रकारांतर से ईश्वर का पूजन ही है।’
 
हमारे भारतीय धर्म ग्रंथों में ‘सेवा’ के संबंध में बहुत उल्लेख मिलता है। सेवा से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। सेवाभावी, (सेवाव्र्रती) को संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। विद्यालय, चिकित्सालय, पुस्तकालय, वाचनालय, छात्रावास, गोशाला, धर्मशाला, अन्नक्षेत्र, सत्संग भवन, कूप निर्माण, सरोवर निर्माण, बाल संस्कार केंद्र ये सब सेवा के विविध आयाम हैं। इसी प्रकार अन्य उपक्रमों द्वारा सेवा के विभिन्न आकारों का विस्तार किया जाना युगानुकूल, समय-सापेक्ष्य और आवश्यक है (समय अनुसार नवाचार विधि द्वारा भी सेवा कार्यों का विस्तार किया जा सकता है)।
 
जब चिंतन सेवा का हो रहा हो तो भारतीय ऋषि प्रणीत उपनिषदों का एवं उनमें वर्णित सेवा प्रसंगों का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। उपनिषदों में नैतिक शिक्षा के अंतर्गत मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथिदेवो भव तथा स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यम् जैसे उपदेशात्मक नीतिगत वाक्य मिलते हैं, जो सेवा के अर्थों का एवं उसमें छिपी गहन सेवा भावनाओं का अर्थबोध कराते हैं। उपनिषद् में उद्दालक ऋषि के शिष्य आरुणि की गुरुसेवा (गुरुभक्ति) रेखांकित करने योग्य है। महर्षि वेदव्यास प्रणीत पुराणों में तो सेवा के अनेक दृष्टांत उपलब्ध हैं, श्रवण कुमार की मातृ-पितृ भक्ति सेवा का अनूठा उदाहरण है; इसी प्रकार महाराज शिवि, रंतिदेव, महर्षि दधीचि के समर्पण सेवा कार्यों का उल्लेख सेवा के महत्व को रेखांकित करता है।
 
त्रेतायुग में भगवान् श्री राम अपने अन्य तीनों भाइयों सहित सेवा के दायित्व का निर्वहन करते हैं। गुरु विश्वामित्र जी के साथ वनाच्छादित आश्रम में यज्ञ की रक्षा और जंगल में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों की सुरक्षा श्रीराम और लक्ष्मण करते हैं, यह भी सेवा का अनुपम कार्य है। रात्रि विश्राम के समय लक्ष्मण और श्रीराम दोनों गुरु के चरणों की सेवा करते हैं। ‘लगे चरण चांपन दो भाई’ गुरुभक्ति (गुरुसेवा) का सर्वोत्तम आदर्श श्रीराम और लक्ष्मण ने प्रस्तुत कर सेवा के महत्व को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वनवास के समय चित्रकूट में कोल, भील, वनवासी समुदाय द्वारा यह कहा जाना कि-‘नाथ हमार यहै सेवकाई -लेहिं न वासन -वसन चुराई’ सेवा का ही एक प्रकार है। लंका में युद्धकाल में लक्ष्मण का मूर्च्छित हो जाना और लगभग मरणासन्न स्थिति निर्मित हो जाने और श्री हनुमान जी का लक्ष्मण के स्वास्थ्य लाभ हेतु सुखेन वैद्य को लाना, हिमालय पर्वत पर जाकर वहां से संजीवनी बूटी लाना, लक्ष्मण को स्वस्थ कराना सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है। पूरे युद्धकाल में युद्ध का प्रबंधन श्रीहनुमान जी का पराक्रम, शौर्य, वीरता के साथ सेवा के उत्कृष्ट भाव की पुष्टि करता है।
 
द्वापर युग में महाभारत युद्ध समाप्ति के पश्चात् महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के बृहद् आयोजन में द्वापर के महानायक भगवान् श्रीकृष्ण ने तो ‘सेवा प्रबंधन’ का अद्भुत परिचय दिया। राजसूय यज्ञ के विभिन्न पक्षों में अनेक प्रकार की सेवाओं का विभाजन तथा पाण्डवों (चारों भाइयों) में सेवा के दायित्वों का आवंटन जिसकी जैसी रुचि, योग्यता और दक्षता के अनुसार दिया और स्वयं पादत्राणों (जूते-चप्पलों) की रखवाली तथा भोजनोपरांत सभी की जूठी पत्तलों को उठाना और उचित स्थान पर उन्हें रखना (फेंकना), यह सेवा कार्य उन्होंने स्वयं स्वेच्छया स्वीकार किया।
 
वर्तमान समय में अनेक संस्थाएं सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे सृजित अनेक सेवा संस्थाएं समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा के कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। अस्तु- भारतीय जीवन पद्धति का मूल आधार सेवा है, यह कथन एवं लेखन में यत्किञ्चित् भी संकोच नहीं है। सेवा कार्य महान कार्य है जिसके माध्यम से जीवन का स्तर तो उन्नत होता ही है, सेवाव्र्रती का जीवन धन्य होता है तथा वह जीवन की सर्वोत्तम सफलता के उच्चतर शिखर को छू लेता है। सर्वत्र यशस्विता का सुपात्र हो जाता है। उसका अंतःकरण पवित्र हो जाता है।
                                                                                                          लेखक प्रख्यात आध्यात्मिक गुरू तथा प्रवचनकर्ता हैं।

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