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2019 लोकसभा के चुनाव परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुनामी के साथ घोषित हो गया। भाजपा नीत राजग ने जिस तरह से इस चुनाव में प्रदर्शन किया है उससे यह साबित हो गया है कि अब देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद का कोई नेता नहीं है। वे इस समय देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता है एवं राजग को मिली शानदार सफलता के असली हकदार वे ही है। उन्होंने अपने करिश्माई नेतृत्व से जिस तरह 2014 में भाजपा को प्रचंड बहुमत से जिताया था मौजूदा चुनाव में उसमे उसमे उन्होंने बढ़ोतरी ही की है। अब यु कहा जा सकता है अब जब तक दिल्ली की सत्ता मोदी के हाथ में तब तक किसी भी विपक्षी दल को दिल्ली की सत्ता का स्वप्न नहीं देखना चाहिए।
इस पुरे चुनाव के दौरान विपक्ष को यह खुशफहमी थी कि यह चुनाव मोदी की विदाई का चुनाव है और वे प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आ रहे है ,लेकिन परिणामों के बाद विपक्ष की जैसी पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई है। उन्हें अपनी इस तरह की हार का बिलकुल भी अहसास नहीं था। चुनाव में विपक्ष जिस तरह से हारा है ,उसे देखकर उन्हें अब अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता होने लगी है। मोदी के पैर दिल्ली की सत्ता में अंगद  की तरह जम गए है ,जिसे उखाड़ना मुश्किल हो रहा है। मोदी की इस जीत के बाद अब विपक्ष को चाहिए की वे अपनी पराजय के के लिए ईवीएम को दोष न देकर जनता के फैसले को शालीनता से स्वीकार करे।
मौजूदा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति वही बनी है जो पिछले चुनाव में थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन पांच सालों में पार्टी के लिए तो छोड़िए अपने संसदीय क्षेत्र में भी जनता का इतना समर्थन नहीं जुटा पाए कि वे कम से कम अपनी सीट अमेठी में तो जीत हासिल कर पाते । अगर वे केरल की वायनाड सीट से चुनाव नहीं लड़े होते तो उनका लोकसभा में प्रवेश करना भी मुश्किल हो जाता। वे कभी दावा करते थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे 15 मिनट भी बहस नहीं कर सकते है ,उनसे आँख नहीं मिला सकते। आज उनकी स्थिति यह हो गई है कि वे स्वयं 15 मिनट अब उनसे आँख नहीं मिला सकते। राफेल सौदे को लेकर उन्होंने जिस तरह “चौकीदार चोर है” का नारा बुलंद किया था, वह उन पर ही भारी पड़ गया। उन्हें तो इस नारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में माफ़ी मांगनी पड़ी। अब सवाल यह भी उठता है कि मतदाताओं के द्वारा उन्हें एवं उनके नारे को ठुकरा दिए जाने के बाद क्या अब वे मतदाताओं से भी माफ़ी मागने का साहस दिखा पाएंगे। दरअसल चौकीदार चोर है वाला नारा ही कांग्रेस की पराजय का सबसे बड़ा कारण बना है।
इस चुनाव में कांग्रेस की पराजय ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर दिए है। राहुल अब तक के सभी कांग्रेस अध्यक्षों में सबसे असफल अध्यक्ष साबित हुए है। दरअसल मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में मिली जीत से कांग्रेस ने यह खुशफहमी पाल ली थी ,उन्हें ऐसा समर्थन लोकसभा चुनाव में भी मिलेगा ,परन्तु इन तीनं राज्यों की जनता ने ही  कांग्रेस को इस तरह ठुकरा दिया है कि भविष्य में मध्यप्रदेश एवं राजस्थान की सरकारों के सफर पर भी संकट के बादल छा सकते है। कांग्रेस को किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे पर छल करने की कीमत ज्यादा चुकानी पड़ी है । पार्टी को सर्वाधिक सदमा तो छत्तीसगढ़ में लगा है ,जहां कुछ माह पहले ही विधानसभा के चुनाव में उसने भाजपा को एक बड़ी पराजय  झेलने पर विवश कर दिया था। राजस्थान में सत्ता में लौटी पार्टी का एकदम सूफड़ा साफ़ होना भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। एक तरह से कहे तो राज्य की जनता ने “रानी तेरी खैर नहीं पर मोदी तुझसे बैर नहीं” नारे को जैसे सच कर दिखाया है। कांग्रेस की लाज यदि कही बची है तो वह पंजाब और तमिलनाडु में । यदि इन राज्यों में भी कांग्रेस को नुकसान होता तो वह अपनी पिछली बार की 44 सीटों से भी कम पर रह जाती। पार्टी को कुछ हद तक पंजाब सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बयानों से भी नुकसान उठाना पड़ा है। सिद्धू के बयानों ने पार्टी को पंजाब में उतना नुक़सान नहीं पहुंचाया ,लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में पार्टी ने इसकी कीमत जरूर चुकाई है। अब पार्टी को तय करना होगा कि सिद्धू की मंत्रिपद से विदाई जल्द होगी या इसमें और विलम्ब की आवश्यकता है।
उत्तरप्रदेश में भाजपा के सामने बहुजन समाज पार्टी ,समाजवादी पार्टी एवं लोकदल के गठबंधन को एक बड़ी चुनौती के रूप देखा जा रहा था ,लेकिन परिणामों न केवल मायावती एवं अखिलेश यादव को ही नहीं बल्कि कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष को हक्का बक्का कर दिया है। पिछले चुनाव में अमित शाह के रणनीतिक कौशल से मिली जीत को इस बार मोदी के करिश्मे ने दोहराया है। इधर गठबंधन की जरूर हार हुई है ,लेकिन पिछले परिणामों को देखे तो इस बार वास्तविक फायदा सपा की बजाए बसपा को मिला है। सपा पिछले चुनाव में 5 सीटे जीतने में सफल हुई थी ,लेकिन बसपा तो खाता भी नहीं खोल पाई थी। उधर प्रदेश में कांग्रेस की असफलता के लिए वे स्वयं जिम्मेदार है। प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनाव के दो माह पहले पार्टी महासचिव बनाकर तुरुप इक्के के रूप में पूर्वी उत्तरप्रदेश में भेजने की रणनीति असफल साबित हुई। प्रियंका ने जब सक्रीय राजनीति में आने का मन बनाया, तब तक देर हो चुकी थी। इसके बाद खूब शोर के बाद वाराणसी में प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस न दिखाकर उन्होंने कार्यकर्ताओं के मनोबल को कमजोर ही  किया। उत्तरप्रदेश में मिली हार के बाद अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रियंका आगे भी  राहुल गांधी की ढाल बने रहना पसंद करेगी या नेपथ्य में जाने का विकल्प चुनेगी।
भाजपा को इस चुनाव में किसी राज्य में सबसे धमाकेदार जीत अगर मिली है तो वह राज्य है पश्चिम बंगाल ,जहां तणमूल कांग्रेस की चूलें हिल गई है। पीएम मोदी के विरुद्ध अपशब्दों के इस्तेमाल में किसी भी हद तक जाने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि चुनाव में भाजपा उन्हें नाकों चले चबाने पर विवश कर देगी। बंगाल में पिछले पांच वर्षों में भाजपा के कार्यकर्ताओं की मेहनत एवं नेताओं की कुशल रणनीति ने इस तरह पैर जमा लिए है कि तृणमूल की जमीन खिसकने की स्थिति आ गई है। पीएम मोदी को एक  एक्सपायरी  प्राइम मिनिस्टर बताकर मजाक उड़ाने वाली ममता को अब यह चिंता सता रही है कि 2021 में होने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा उन्हें एक्सपायरी चीफ मिनिस्टर की स्थिति में पहुंचाने में सफल न हो जाए। तृणमूल  कार्यकर्ताओं ने अपनी आसन्न पराजय को देखते हुए जिस तरह से हिंसा का सहारा लेने से भी परहेज नहीं किया ,उसकी कीमत ही उन्हें हार के रूप में चुकानी पड़ी।
इस जीत के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले की तुलना में और अधिक ताकतवर नेता के रूप में उभरकर सामने आए है। वे अब देश की कोटि कोटि जनता के हृदय सम्राट बन चुके है। उनका आत्मविश्वास भी पिछले कार्यकाल की तुलना में बड़ा हुआ दिखाई देगा। वे पिछले कार्यकाल में कई कठोर फैसले लेने में असमर्थ हुए थे लेकिन अब वे संसद में पूरी मजबूती के साथ खड़े दिखाई देंगे। वे अब कठोर फैसले लेने में पूरी तरह समर्थ होंगे। वे अब युवाओं के रोजगार से लेकर किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए अधिक इच्छशक्ति प्रदर्शित  कर सकते है। आर्थिक मैचों पर भी मोदी सरकार कड़े फैसले लेने से भी वे परहेज नहीं करेगी । अब अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी उनकी स्वीकार्यता पहले से और अधिक मजबूत हो जाएगी। पड़ौसी पाकिस्तान को भी अब भारत से संबंध सुधारने को विवश होना ही पड़ेगा। चीन का सरकारी मीडिया तो चुनाव के  दौरान ही यह कह चूका था कि भारत में यदि प्रधानमंत्री पद की बागडौर एक बार फिर मोदी के हाथों में आती है तो ,इससे चीन सरकार को प्रसन्नता ही होगी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सबका साथ सबका विकास देने वाली मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में देश को सही दिशा देने में पूरी तरह कामयाब रहेगी ऐसी आशा की जा सकती है।
(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

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